-Friday World 27 Aug 2026
दुश्मन मजहब में फर्क नहीं करता, वो सिर्फ फूट चाहता है - हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी (AS) हरम के संरक्षक का पैगाम-ए-वहदत
इस्लामी इतिहास में कुछ मौके ऐसे आते हैं जो सिर्फ जश्न नहीं, बल्कि पूरी उम्मत के लिए आइना बन जाते हैं। एकता सप्ताह उन्हीं में से एक है। तेहरान में हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी (अ.स.) हरम और इमाम रज़ा (अ.स.) हरम के संरक्षक हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन काज़ी अस्कर ने हौज़ा न्यूज़ एजेंसी से बात करते हुए एक ऐसी हकीकत को उजागर किया है जिसे आज हर मुसलमान को समझने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, “एकता सप्ताह शिया-सुन्नी एकता को मजबूत करने का सबसे सुनहरा मौका है। दुश्मन शिया और सुन्नी में कोई फर्क नहीं करता, वो सिर्फ मुसलमानों के बीच इख्तेलाफ पैदा करके इस्लामी दुनिया को कमजोर करना चाहता है।”
एकता सप्ताह की तारीख का राज क्या है?
हम सब जानते हैं कि सुन्नी मुसलमान 12 रबी-उल-अव्वल को और शिया मुसलमान 17 रबी-उल-अव्वल को पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.) का यौमे विलादत मानते हैं। इमाम खुमैनी (र.अ.) ने अपनी दूरअंदेशी से इन दोनों तारीखों के बीच के 5 दिनों को “हफ्ता-ए-वहदत” यानी एकता सप्ताह घोषित किया।
इसका मकसद ये नहीं था कि कौन सी तारीख सही है और कौन सी गलत। इसका मकसद ये था कि जिस नबी के नाम पर हम सब एक हैं, उसी नबी की विलादत के बहाने हम एक मंच पर जमा हों। यह एक फिकही इख्तेलाफ को इत्तेहाद की ताकत में बदलने का इस्लामी इंकलाब का सबसे बड़ा तोहफा था।
कुरान का पैगाम: अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थाम लो
हुज्जतुल इस्लाम काज़ी अस्कर ने पवित्र कुरान की उस आयत की तरफ इशारा किया जो आज के दौर में सबसे ज्यादा जरूरी है:
“वअतसिमू बिहबलिल्लाहि जमीअं वला तफर्रकू - और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थामे रहो और टुकड़ों में मत बंटो।” (सूरह आले इमरान: 103)
उन्होंने कहा कि इस्लाम ने हमेशा वहदत का दर्स दिया है। कुरान साफ कहता है कि आपसी लड़ाई, नफरत और फिरकावारियत मुसलमानों की ताकत, शोहरत और रौब को खत्म कर देती है।
आज देखिए, जब मुसलमान आपस में लड़ते हैं तो फायदा किसका होता है? फिलिस्तीन में, यमन में, इराक और सीरिया में खून किसका बहता है? दुश्मन कभी नहीं पूछता कि तुम शिया हो या सुन्नी, वो सिर्फ मुसलमान को निशाना बनाता है।
एकता का मतलब क्या है और क्या नहीं है?
यहाँ एक बहुत बड़ी गलतफहमी को दूर करना जरूरी है, जिसे काज़ी अस्कर साहब ने बहुत खूबसूरती से समझाया।
एकता का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि शिया अपने अकीदे को छोड़कर सुन्नी बन जाए या सुन्नी अपना अकीदा छोड़कर शिया बन जाए। यह न मुमकिन है, न इस्लाम ने इसका हुक्म दिया है।
एकता का मतलब है “मुश्तरकात पर इत्तेहाद”। हमारे बीच इख्तेलाफ से ज्यादा इत्तेफाक है:
- हमारा अल्लाह एक है
- हमारा रसूल एक है - हज़रत मुहम्मद मुस्तफा (स.अ.व.)
- हमारी किताब एक है - कुरान-ए-मजीद
- हमारा किबला एक है - खाने काबा
- हमारा नमाज़, रोज़ा, हज, जकात सब एक है
जब बुनियाद एक है तो इमारत को अलग क्यों किया जाए? हम अपने फिकही इख्तेलाफ को अपनी जगह रखते हुए, दुश्मन के मुकाबले में एक दीवार बन सकते हैं।
मुकद्दस मकामात की बेहुरमती - दुश्मन की सबसे बड़ी साजिश
इस मौके पर हरम के संरक्षक ने एक बहुत ही अहम और नाजुक मुद्दे पर बात की - मुकद्दस मकामात की बेअदबी।
उन्होंने कहा कि कुछ जाहिल और मुनाफिक लोग जानबूझकर सहाबा-ए-किराम या अहलुल बैत (अ.स.) या अज़वाजे मुतह्हरात की शान में गुस्ताखी करते हैं और फिर उस वीडियो को वायरल करके कहते हैं कि देखो ये शिया ने किया या ये सुन्नी ने किया।
याद रखिए, ये लोग न शिया हैं न सुन्नी, ये दुश्मन के एजेंट हैं।
इमाम खुमैनी (र.अ.) और अहलुल बैत (अ.स.) के मकतब ने हमेशा इसकी सख्त मुखालफत की है। खुद कुरान कहता है: “और (ऐ ईमान वालो) तुम उन लोगों को गाली मत दो जिन्हें वो अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, कि वो भी हद से गुजरकर जिहालत की वजह से अल्लाह को गाली देने लगें।” (सूरह अनआम: 108)
जब गैर-मुस्लिमों के माबूदों को भी गाली देने से मना किया गया है तो फिर मुसलमानों के मुकद्दसात की बेअदबी कैसे जायज़ हो सकती है? पवित्र स्थानों का सम्मान करना ही असल इस्लाम है।
ISIS जैसे तकफीरी ग्रुप - इस्लाम के नाम पर इस्लाम के दुश्मन
काज़ी अस्कर ने ISIS और दूसरे तकफीरी गिरोहों का जिक्र करते हुए कहा कि इनका चेहरा सबके सामने आ चुका है।
इन लोगों ने सीरिया और इराक में क्या किया? क्या उन्होंने सिर्फ शिया मस्जिदों को उड़ाया? नहीं। उन्होंने सुन्नी मस्जिदों को भी शहीद किया, चर्चों को भी तबाह किया। उन्होंने शिया को भी बेरहमी से कत्ल किया और सुन्नी क़बीलों को भी।
इससे साबित होता है कि तकफीरियत का कोई मज़हब नहीं होता। ये इस्लाम के लिबास में इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन हैं, जिन्हें आलमी ताकतों ने सिर्फ मुसलमानों को बदनाम और कमजोर करने के लिए बनाया है।
आज की जरूरत - दिलों की एकता
आज जब पूरी दुनिया में इस्लामोफोबिया बढ़ रहा है, जब कुरान को जलाया जा रहा है, जब पैगंबर-ए-इस्लाम के कार्टून बनाए जा रहे हैं, तो क्या ये वक्त आपस में लड़ने का है?
हरगिज़ नहीं। ये वक्त है कि तेहरान से लेकर काहिरा तक, इस्तांबुल से लेकर जकार्ता तक, लखनऊ से लेकर लाहौर तक एक आवाज़ बुलंद हो - “हम सब एक हैं।”
एकता सप्ताह हमें यही सिखाता है कि हम अपने छोटे-छोटे मतभेदों को भुलाकर बड़ी-बड़ी मुश्तरकात पर जमा हों। अगर आज 2 अरब मुसलमान एक हो जाएं तो दुनिया की कोई ताकत हमारे सामने खड़ी नहीं हो सकती।
आइए, इस एकता सप्ताह पर हम सब अहद करें कि हम किसी भी ऐसी बात, ऐसी पोस्ट, ऐसी तकरीर का हिस्सा नहीं बनेंगे जो शिया-सुन्नी के बीच नफरत पैदा करे। हम वहदत के दाई बनेंगे, नफरत के नहीं। क्योंकि यही पैगंबर (स.अ.व.) की सीरत है और यही कुरान का हुक्म है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 27 Aug 2026
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