- Friday World 24 Aug 2026
वाशिंगटन में आयोजित एक सत्र में भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ढिल्लन ने ईरान की सैन्य रणनीति पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। वे अपने नए पुस्तक ‘ऑपरेशन सिंदूर: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज डीप स्ट्राइक्स इनसाइड पाकिस्तान’ का प्रचार करने अमेरिका पहुंचे हुए थे। इस दौरान उन्होंने ओआरएफ अमेरिका के एक कार्यक्रम में कहा कि ईरान ने अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ संभावित युद्ध की तैयारी में लगभग चार दशक बिता दिए हैं। यह तैयारी सिर्फ हथियारों या बलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि शीर्ष नेतृत्व के समाप्त होने के बाद भी सैन्य तंत्र को चालू रखने की व्यवस्था तक फैली हुई थी।
जनरल ढिल्लन के अनुसार, ईरान ने ‘मोज़ेक डॉक्ट्रिन’ अपनाया। इसके तहत सेना को 31 स्वतंत्र मुख्यालयों में बांट दिया गया। ये मुख्यालय केंद्रीय नेतृत्व के नष्ट हो जाने के बावजूद स्वायत्त रूप से काम करने में सक्षम थे। विकेंद्रीकृत सैन्य ढांचे ने ईरान को भारी नुकसान के बावजूद पूरी तरह नष्ट होने से बचाया। एक कमजोर ताकत भी ज्यादा मजबूत दुश्मन के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष जारी रख सकती है—यह क्षमता एट्रिशन वॉरफेयर (शत्रु को धीरे-धीरे कमजोर करने वाली रणनीति) के रूप में ईरान के पास मौजूद थी।
भौगोलिक स्थिति भी ईरान के पक्ष में काम करती है। चारों ओर फैले पर्वतीय क्षेत्र जमीनी आक्रमण को बेहद कठिन बना देते हैं। अंदरूनी इलाकों में भीषण गर्मी अतिरिक्त चुनौती पैदा करती है। पारंपरिक शक्तिशाली वायुसेना या विमानवाहक पोत बनाने के बजाय ईरान ने मिसाइलों, वायु रक्षा प्रणालियों और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया।
जनरल ढिल्लन ने इस संघर्ष से सैन्य योजनाकारों के लिए महत्वपूर्ण सबक भी बताए। उन्होंने कहा कि किसी भी देश को युद्ध में प्रवेश करने से पहले स्पष्ट राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए। युद्ध समाप्त करने की सटीक रणनीति और विजय के मापदंड भी पहले से तय होने चाहिए। प्रभावशाली रणनीति तैयार करने के साथ तनाव को नियंत्रित रखना जरूरी है—खासकर अमेरिका और इज़राइल जैसे शक्तिशाली विरोधियों का सामना करते समय।
यह विश्लेषण सिर्फ ईरान-अमेरिका-इज़राइल समीकरण तक सीमित नहीं है। यह उन देशों के लिए भी प्रासंगिक है जो विषम शक्ति संतुलन में खुद को पाते हैं। विकेंद्रीकृत कमान, भूगोल का अधिकतम उपयोग, मिसाइल और वायु रक्षा पर जोर तथा लंबे संघर्ष की क्षमता—ये तत्व आधुनिक युद्ध योजना में नए आयाम जोड़ते हैं। जनरल ढिल्लन का यह वक्तव्य सैन्य रणनीति, भू-राजनीति और भविष्य के संभावित संघर्षों पर चर्चा को नया आधार देता है।
ईरान की यह दीर्घकालिक तैयारी दिखाती है कि सैन्य शक्ति सिर्फ टैंकों, विमानों या जहाजों की संख्या से नहीं मापी जाती। नेतृत्व के विनाश के बाद भी संचालन जारी रखने की क्षमता, स्थानीय भूगोल का लाभ उठाना और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर नियंत्रण—ये कारक निर्णायक साबित हो सकते हैं। होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण मार्ग की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करना वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करने की क्षमता भी दर्शाता है।
सैन्य विशेषज्ञों के लिए यह उदाहरण एट्रिशन वॉरफेयर की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। जहां एक पक्ष तेज और निर्णायक जीत चाहता है, वहीं दूसरा पक्ष लंबे संघर्ष के जरिए विरोधी की इच्छाशक्ति और संसाधनों को धीरे-धीरे खत्म करने की रणनीति अपना सकता है। पर्वतीय इलाके और कठोर जलवायु परिस्थितियां इस रणनीति को और मजबूत बनाती हैं।
जनरल ढिल्लन ने साफ कहा कि युद्ध में प्रवेश से पहले राष्ट्रीय लक्ष्य, निकास रणनीति और सफलता के मापदंड स्पष्ट होने चाहिए। तनाव नियंत्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शक्तिशाली विरोधियों के खिलाफ बिना स्पष्ट योजना के आगे बढ़ना जोखिम भरा हो सकता है। ये बातें सिर्फ ईरान के संदर्भ में नहीं, बल्कि वैश्विक सैन्य सोच के लिए भी उपयोगी हैं।
कुल मिलाकर, लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ढिल्लन का यह विश्लेषण ईरान की चार दशक लंबी सैन्य तैयारी को एक नए नजरिए से प्रस्तुत करता है। विकेंद्रीकृत ढांचा, भूगोल का लाभ, मिसाइल केंद्रित क्षमता और एट्रिशन रणनीति—इन तत्वों ने ईरान को संभावित संघर्ष में टिके रहने की क्षमता दी। यह चर्चा सैन्य योजनाकारों, रणनीतिकारों और नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण सबक लेकर आई है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 24 Aug 2026
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