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Tuesday, 18 August 2026

E20 पेट्रोल का संकट: पुरानी गाड़ियां खतरे में, खाद्य महंगाई का नया खतरा!

E20 पेट्रोल का संकट: पुरानी गाड़ियां खतरे में, खाद्य महंगाई का नया खतरा!
-Friday World 20 Aug 2026
भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के लक्ष्य को समय से पहले हासिल कर लिया है। कच्चे तेल के आयात पर अरबों रुपये बचाने वाली यह उपलब्धि एक तरफ गर्व की बात है, लेकिन दूसरी तरफ एक नया संकट भी पैदा कर रही है। मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने हाल ही में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में अपने लेख के माध्यम से इस मुद्दे पर गंभीर चेतावनी दी है। उनका कहना है कि E20 पेट्रोल (20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित) पुरानी गाड़ियों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। देश में करीब 8 करोड़ पुराने टू-व्हीलर्स इस खतरे की चपेट में हैं।

पुरानी गाड़ियों पर E20 का असर
देश भर में करोड़ों बाइक और स्कूटर आज भी पुरानी कार्बोरेटर तकनीक पर चल रहे हैं। ये वाहन BS-IV मानकों के आने से पहले बनाए गए थे। नई इलेक्ट्रॉनिक फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम वाली गाड़ियां E20 को आसानी से हैंडल कर लेती हैं, लेकिन पुरानी गाड़ियां नहीं।

एथेनॉल में ऑक्सीजन की मात्रा ज्यादा होती है। पुराने कार्बोरेटर वाले इंजन हवा और ईंधन के इस नए मिश्रण को अपने आप एडजस्ट नहीं कर पाते। नतीजा यह होता है कि इंजन जरूरत से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसके अलावा, एथेनॉल रबर के पाइप, सील और अन्य पार्ट्स को धीरे-धीरे गला या खराब कर सकता है। लंबे समय तक इस्तेमाल से मरम्मत का खर्च बढ़ जाता है और गाड़ी की उम्र भी कम हो सकती है।

नागेश्वरन का स्पष्ट सुझाव है कि जब तक इन 8 करोड़ पुरानी गाड़ियों में जरूरी मॉडिफिकेशन नहीं हो जाता, तब तक पेट्रोल पंपों पर E10 (10 प्रतिशत एथेनॉल) की बिक्री जारी रखनी चाहिए। इससे आम लोगों को राहत मिलेगी और उनके वाहन खराब होने से बचेंगे।

खाद्य फसलों से एथेनॉल: महंगाई का नया रास्ता
एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल करने के लिए गन्ना, मक्का और चावल जैसी खाद्य फसलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। मक्का मुख्य रूप से पोल्ट्री और पशु चारे के लिए इस्तेमाल होता है। अगर एथेनॉल कंपनियां ज्यादा दाम देकर मक्का खरीदने लगें, तो चारे की कीमतें बढ़ जाएंगी। इसका सीधा असर अंडे, चिकन और दूध के दामों पर पड़ेगा। यानी रसोई का बजट और महंगा हो जाएगा।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस सीजन में देश के कुल सालाना चीनी उत्पादन का करीब 10 प्रतिशत (लगभग 30 लाख टन) एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हो चुका है। इसी वजह से सरकार अगले सीजन में गन्ने से एथेनॉल बनाने पर अंकुश लगाने पर विचार कर रही है, ताकि चीनी की कमी न हो और उसके दाम बेकाबू न हों।

 ऊर्जा सुरक्षा बनाम खाद्य सुरक्षा
एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी मुद्रा बचत के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन जब खाद्य फसलें ईंधन बनने लगें, तो खाद्य सुरक्षा और महंगाई दोनों प्रभावित होते हैं। पानी की खपत भी बढ़ती है, क्योंकि गन्ना जैसी फसलें पानी की भारी मात्रा मांगती हैं।

सरकार को संतुलन बनाना होगा। एक तरफ पुरानी गाड़ियों के मालिकों को राहत देनी होगी, दूसरी तरफ एथेनॉल उत्पादन को गैर-खाद्य स्रोतों (जैसे कृषि अवशेष, बैगासे या अन्य बायोमास) की ओर तेजी से मोड़ना होगा। साथ ही, वाहन निर्माताओं को पुरानी गाड़ियों के लिए सस्ते और आसान मॉडिफिकेशन किट उपलब्ध कराने चाहिए।

नागेश्वरन की चेतावनी समय पर आई है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो करोड़ों आम नागरिकों को इंजन खराब होने, मरम्मत के खर्च और खाद्य पदार्थों की महंगाई का दोहरा झटका लग सकता है। E20 की ओर बढ़ना जरूरी है, लेकिन पुरानी गाड़ियों और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए।

सरकार को चाहिए कि वह E10 की उपलब्धता सुनिश्चित करे, एथेनॉल के लिए वैकल्पिक फीडस्टॉक को बढ़ावा दे और आम लोगों की जेब तथा वाहनों की सुरक्षा दोनों का ख्याल रखे। तभी यह हरित ऊर्जा कार्यक्रम सही मायनों में सफल और समावेशी बनेगा।
Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 20 Aug 2026

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