-Friday World September 20,2026
जंतर-मंतर। नाम सुनते ही दिल्ली के लोकतंत्र की धड़कन सुनाई देती है। पिछले हफ्ते यहीं पर जेन-जी ने जो नजारा दिखाया, उसने पूरे देश को चौंका दिया। हाथ में तख्तियां, आंखों में सवाल और जुबान पर एक ही मांग - छात्र राजनीति में पारदर्शिता, रोजगारपरक शिक्षा और कैंपस लोकतंत्र की वापसी। हजारों छात्रों की उस भीड़ में कोई बैनर नहीं था, कोई पार्टी का झंडा नहीं था। सिर्फ एक जेनरेशन थी जो कह रही थी - हमें सुनो।
इस धरना प्रदर्शन के बाद माहौल बिल्कुल सकारात्मक था। सोशल मीडिया से लेकर नॉर्थ कैंपस की चाय की टपरी तक, हर जगह चर्चा थी कि अब DU के छात्र संघ चुनाव में कुछ नया होगा। छात्र अब मुद्दों पर वोट करेंगे, चेहरे पर नहीं। लेकिन जब DUSU 2025 के नतीजे आए, तो इसी सकारात्मक लहर के बावजूद एक बड़ा धड़ा चुनाव हार गया। कारण? गलत प्रत्याशियों का चयन।
लहर थी, नाव ही कमजोर निकली
जंतर-मंतर पर जेन-जी ने जो माहौल बनाया, वह किसी एक संगठन का नहीं था। वह एंटी-इस्टैब्लिशमेंट नहीं, प्रो-स्टूडेंट माहौल था। छात्रों ने साफ कहा था - हमें लग्जरी गाड़ियों से प्रचार करने वाले नहीं, लाइब्रेरी की सीट बढ़ाने वाले चाहिए। हमें बाहुबली नहीं, पढ़ने वाला प्रतिनिधि चाहिए।
इस लहर का सबसे ज्यादा फायदा उन छात्र संगठनों को मिलना था जो खुद को वैकल्पिक राजनीति का चेहरा बताते हैं। लेकिन हुआ उल्टा। जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर, ऊपर से थोपे गए प्रत्याशी मैदान में उतार दिए गए।
उदाहरण के लिए, अध्यक्ष पद पर एक ऐसा चेहरा दिया गया जो कैंपस में कभी आंदोलन में दिखा ही नहीं, जिसका जुड़ाव विभागों से नहीं था। सोशल मीडिया फॉलोइंग को जमीनी पकड़ समझ लिया गया। जबकि ABVP ने ठीक इसके उलट किया - आर्यन मान जैसा चेहरा, जो लाइब्रेरी साइंस विभाग से आता है, लगातार 5 साल से कैंपस में सक्रिय है। परिणाम सामने है - आर्यन मान को 28,841 वोट मिले, जबकि NSUI की प्रत्याशी जोस्लिन नंदिता चौधरी को मात्र 12,645 वोट। 16,196 वोटों का अंतर सिर्फ हार नहीं, रणनीतिक चूक का प्रमाण है।
देश भर में गूंज से क्या होगा, जब घर ही हार जाओ?
एक तरफ आप जंतर-मंतर से लेकर पटना, लखनऊ, हैदराबाद तक छात्रों की गूंज करने की बात करते हो। प्रेस कॉन्फ्रेंस, ट्विटर ट्रेंड, रील और हैशटैग। लेकिन छात्र राजनीति का पहला नियम है - आपका अपना किला मजबूत होना चाहिए।
DU, JNU, इलाहाबाद, BHU - ये सिर्फ विश्वविद्यालय नहीं, छात्र आंदोलन की प्रयोगशालाएं हैं। अगर आप यहां गलत टिकट बंटवारे, गुटबाजी और जातीय-समीकरण में उलझ कर चुनाव हार रहे हैं, तो देश भर की गूंज का कोई लाभ नहीं होगा। छात्र बहुत समझदार है। वह जंतर-मंतर पर आपके साथ खड़ा होगा क्योंकि मुद्दा उसका है, लेकिन वोट वह उसी को देगा जिसे वह रोज कैंटीन में देखता है, जो उसकी क्लास के बाहर उसके लिए खड़ा होता है।
तीन बड़ी गलतियां जो हार की वजह बनीं:
1. सर्वे नहीं, सिफारिश: उम्मीदवार चयन के लिए कोई ओपन सर्वे, कोई कैंपस फीडबैक नहीं लिया गया। दिल्ली से बाहर बैठे नेताओं ने नाम तय कर दिए।
2. मुद्दों से भटकाव: जेन-जी ने फीस वृद्धि, हॉस्टल, प्लेसमेंट, लड़कियों की सुरक्षा जैसे मुद्दे उठाए। लेकिन प्रत्याशियों ने अपने भाषणों में राष्ट्रीय राजनीति के बड़े-बड़े नैरेटिव परोस दिए, जो DU के वोटर को कनेक्ट नहीं कर पाए।
3. महिला वोट की अनदेखी: इस बार DU में 7 महिला उम्मीदवार थीं। महिला वोटर निर्णायक है। लेकिन जिन महिला चेहरों को उतारा गया, उनकी तैयारी अधूरी थी, जबकि विरोधी खेमे की दीपिका झा ने जॉइंट सेक्रेटरी पद 21,825 वोट लेकर जीत लिया।
अब आगे क्या?
जेन-जी आंदोलन ने साबित कर दिया है कि छात्र अब जागरूक है, वह भीड़ नहीं, भागीदारी चाहता है। DUSU चुनाव की हार एक सबक है - लहर से ज्यादा जरूरी है नाव।
अगर वाकई छात्र राजनीति को बदलना है तो करना यह होगा:
कॉलेज-स्तर पर पैनल बनाओ, नाम ऊपर से मत थोपो। टिकट से पहले 3 महीने कैंपस में काम अनिवार्य करो। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नहीं, लाइब्रेरी एक्टिविस्ट को आगे लाओ।
जंतर-मंतर की गूंज बेकार नहीं गई, उसने माहौल दिया। लेकिन माहौल को वोट में बदलने के लिए सही चेहरा चाहिए। वरना हर साल यही होगा - जंतर-मंतर पर तालियां, और नॉर्थ कैंपस में सन्नाटा।
छात्र आंदोलन नारों से नहीं, सही नेतृत्व से जीते जाते हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 20,2026
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