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Tuesday, 22 September 2026

जब सिस्टम VIP का नाम नहीं जोड़ पा रहा, तो फुटपाथ वाले से निर्दोष कागजों की उम्मीद कैसा न्याय है?

जब सिस्टम VIP का नाम नहीं जोड़ पा रहा, तो फुटपाथ वाले से निर्दोष कागजों की उम्मीद कैसा न्याय है?
-Friday World September 22,2026 
SIR: जब चुनाव आयुक्त का ही रिकॉर्ड नहीं मिलता, तो गरीब अपना अस्तित्व कैसे साबित करे?


चुनाव आयोग कहता है - SIR यानी Special Intensive Revision के जरिए मतदाता सूची को "साफ" किया जा रहा है। मकसद अच्छा बताया जा रहा है - मृत, डुप्लीकेट और स्थायी रूप से पलायन कर चुके नाम हटें।

लेकिन असली सवाल सफाई का नहीं, सफाई के तरीके का है। क्या इस सफाई में गरीब, अनपढ़, प्रवासी मजदूर, दलित, आदिवासी, घुमंतू समुदाय, बेघर और अकेली महिलाएँ ही लोकतंत्र से बाहर कर दी जाएंगी?

VIP को भी नोटिस, तो गरीब का क्या होगा?

दिल्ली में SIR के दौरान जो हुआ, उसने पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी। पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, निर्वाचन आयुक्त एस.एस. संधू, विदेश सचिव विक्रम मिस्री, कपिल सिब्बल, मनीष सिसोदिया जैसे सबसे प्रभावशाली लोगों को भी रिकॉर्ड में विसंगति के कारण नोटिस मिल गए।

दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा - नोटिस का मतलब नाम कटना नहीं, सिर्फ सत्यापन है। बात सही है।

पर सवाल नोटिस का नहीं, सिस्टम का है। जब देश का चुनाव आयुक्त, विदेश मंत्री और पूर्व उप-प्रधानमंत्री तक का नाम, पता और पारिवारिक विवरण चुनाव आयोग पुराने रिकॉर्ड से नहीं मिला पा रहा, तो एक दिहाड़ी मजदूर, किराए पर रहने वाले परिवार, घरेलू कामगार, फुटपाथ निवासी या बुलडोजर से बार-बार उजाड़े गए परिवार से कागजों की पूरी और निर्दोष श्रृंखला की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

आडवाणी जी और जयशंकर जी को नोटिस मिला तो उनके पास जवाब देने के लिए पूरा सचिवालय, सरकारी कर्मचारी, वकील और दस्तावेजों की फाइलें हैं।

गाँव की एक निरक्षर दलित महिला के पास कौन सा सचिवालय है? गुजरात में काम कर रहे बिहार के प्रवासी मजदूर के पास कौन सा वकील है?

कागज माँगने वाले, जमीनी हकीकत देखो

बिहार में SIR पर हुए एक मैदानी अध्ययन ने सच्चाई सामने रख दी। 45 साल से ज्यादा उम्र की 77% महिलाएँ अपना SIR फॉर्म खुद पढ़ भी नहीं पा रही थीं। दलित महिलाओं में यह आंकड़ा 91% था। लोगों को फॉर्म भरवाने के लिए 50 से 200 रुपये तक देने पड़े।

जो अपना नाम तक नहीं लिख सकता, उससे आप डिजिटल अपलोड, अंग्रेजी में आए SMS और दस्तावेजी विसंगति का ऑनलाइन जवाब माँग रहे हैं। किस आधार पर?

आप जन्म प्रमाणपत्र माँगते हैं, जबकि देश के करोड़ों गरीबों का जन्म कभी सरकारी रजिस्टर में दर्ज ही नहीं हुआ। उनकी दाई माँ घर में जन्म कराती थी, नगर निगम में नहीं।

आप स्कूल सर्टिफिकेट माँगते हैं, जबकि वे कभी स्कूल गए ही नहीं।

आप कहते हैं पुरानी वोटर लिस्ट से लिंक जोड़ो, जबकि महिला का शादी के बाद नाम और पूरा पता ही बदल गया। प्रवासी मजदूर 15 साल से दिल्ली-मुंबई में है, उसका गाँव वाला पता कैसे मैच करेगा? घुमंतू और बंजारा समुदाय का तो कोई स्थायी पता ही नहीं है।

मतलब साफ है - सरकार ने जिसका रिकॉर्ड बनाया ही नहीं, आज उसी से कहा जा रहा है कि पहले साबित करो कि तुम मौजूद हो!

एक दिन की मजदूरी बनाम एक नोटिस

बड़े व्यक्ति के लिए SIR का नोटिस एक फोन कॉल है। गरीब के लिए यह एक हफ्ते की भूख है।

सुनवाई केंद्र तक जाने के लिए उसे एक दिन की दिहाड़ी छोड़नी पड़ती है। 400-500 रुपये की मजदूरी जाना सिर्फ नुकसान नहीं है, उस दिन चूल्हा नहीं जलेगा। उसके ऊपर फोटो, फोटोकॉपी, ऑनलाइन फॉर्म, आने-जाने का भाड़ा अलग।

मोबाइल पर अंग्रेजी में आया SMS उसके लिए सूचना नहीं, डर है। वह व्यक्ति जो हिंदी भी नहीं पढ़ सकता, वह अंग्रेजी नोटिस का क्या करेगा? ऑनलाइन पोर्टल उस नागरिक की मदद कैसे करेगा जिसके पास स्मार्टफोन ही नहीं, इंटरनेट नहीं, और अगर नंबर है तो हर 6 महीने में बदल जाता है।

कागज आग, बाढ़, दंगे, पलायन या बुलडोजर में नष्ट हो जाए तो अमीर के पास दूसरी कॉपी निकल आती है। गरीब केवल घर नहीं खोता, वह सरकारी रिकॉर्ड में अपना अस्तित्व ही खो देता है।

शुद्धता जरूरी है, अन्याय नहीं

हम मानते हैं मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है। फर्जी नाम हटने चाहिए। लेकिन शुद्धता का मतलब यह नहीं कि राज्य अपनी रिकॉर्ड रखने की विफलता का पूरा बोझ सबसे कमजोर नागरिक पर डाल दे।

मताधिकार सरकार की कृपा या खैरात नहीं है। यह संविधान की बुनियाद है। बाबा साहेब ने वोट का अधिकार इसलिए दिया था ताकि गरीब भी प्रधानमंत्री से बराबरी से सवाल कर सके।

अगर चुनाव आयुक्त के नाम में भी mismatch हो सकता है, तो किसी मजदूर की स्पेलिंग मिस्टेक या पिता के नाम की छोटी गलती को उसकी नागरिकता और मताधिकार के खिलाफ सबूत कैसे बनाया जा सकता है?

अंतिम सवाल

सवाल बहुत सीधा है - क्या भारत का लोकतंत्र केवल उनके लिए बचा है जिनके पास जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, पुराना स्कूल रिकॉर्ड, स्मार्टफोन, स्थायी पता और वकील है?

जिस नागरिक को सरकार आज तक पक्का घर, शिक्षा और पक्का रिकॉर्ड नहीं दे पाई, उसी से कागज माँगकर उसका वोट संदिग्ध बना देना प्रशासन नहीं, अन्याय है।

अगर SIR सच में सफाई है, तो उसकी पहली जिम्मेदारी हर पात्र नागरिक का नाम बचाना होनी चाहिए, न कि गरीब को कागजों में गायब कर देना।

यह सिर्फ वोटर लिस्ट का मामला नहीं है। यह गरीब के अस्तित्व, उसकी नागरिक बराबरी और उसके संवैधानिक अधिकार की लड़ाई है। इस पर चुप रहना, लोकतंत्र से गरीबों को चुपचाप बाहर जाते हुए देखना है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 22,2026 

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