-Friday World Oct 2,2026
आज के दौर में जब एक छोटा सा पद मिलते ही लोग अपने परिवार के लिए पूरी व्यवस्था बदलवा देते हैं, तब 60 साल पहले देश के प्रधानमंत्री रहे एक शख्स की कहानी हमें आईना दिखाती है। नाम था लाल बहादुर शास्त्री। उनके लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी, परिवार के लिए सुविधा लेने का जरिया नहीं, बल्कि देश की सेवा का सबसे बड़ा दायित्व थी।
इस बात की सबसे सुंदर झलक उनके बेटे अनिल शास्त्री से जुड़े दो किस्सों में मिलती है, जो आज भी हर युवा और हर नेता के लिए पाठशाला है।
पहला किस्सा: St. Stephen's College में एडमिशन और 'Government Servant' वाला फॉर्म
बात 1960 के दशक की है। अनिल शास्त्री दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में एडमिशन लेने पहुंचे। घर से निकलते वक्त पिता ने एक ही हिदायत दी थी - _"ऐसा कुछ मत करना जिससे लगे कि तुम बाकी छात्रों से अलग हो।"_
अनिल ने फॉर्म भरा। पिता के नाम वाले कॉलम में सिर्फ लिखा - L.B. Shastri", और occupation में लिखा - "Government Servant"। पता था - 10 जनपथ, जो उस समय प्रधानमंत्री आवास था।
जब वह फॉर्म जमा करने क्लर्क के पास पहुंचे, तो क्लर्क ने पता देखा और चौंक गया। पूछा - "10 जनपथ? ये तो PM हाउस है, आपके पिता वहां क्या काम करते हैं? सेक्रेटरी हैं? सिक्योरिटी में हैं?" अनिल पहले झिझके, फिर धीरे से बोले - "He is the Prime Minister."
इतना सुनते ही क्लर्क खड़ा हो गया। उनका हाथ पकड़कर सीधा प्रिंसिपल के कमरे में ले गया। प्रिंसिपल ने गर्मजोशी से स्वागत किया, चाय पूछी और फॉर्म तुरंत स्वीकार कर लिया।
अनिल खुशी-खुशी घर आए और सोचा पिता शाबाशी देंगे। लेकिन हुआ उल्टा। शास्त्री जी ने शांत स्वर में सिर्फ एक सवाल पूछा - "क्या बाकी बच्चों के साथ भी ऐसा हुआ था?"
अनिल ने कहा - नहीं।
शास्त्री जी बोले - "फिर ये नहीं होना चाहिए था। सब बच्चे बराबर होते हैं। किसी को ये महसूस नहीं होना चाहिए कि तुम प्रधानमंत्री के बेटे हो।"
अनिल शास्त्री बताते हैं कि उनके साथ एक सिक्योरिटी गार्ड ठाकुर जी कॉलेज तक जाते थे, लेकिन वह उन्हें गेट के बाहर ही रोक देते थे। कहते थे - बाकी छात्रों के साथ सिक्योरिटी नहीं जाती, तो मेरे साथ क्यों?
दूसरा किस्सा: प्रमोशन मिला तो पिता ने ही ऑर्डर रद्द करवा दिया
एक बार अनिल शास्त्री को उनकी नौकरी में नियमों से हटकर, थोड़ा जल्दी प्रमोशन दे दिया गया। किसी ने सोचा प्रधानमंत्री का बेटा है, तो उपकार कर दें।
जब ये बात लाल बहादुर शास्त्री जी को पता चली, तो उन्होंने अपने बेटे के पक्ष में पद का इस्तेमाल नहीं किया। उल्टा उन्होंने संबंधित मंत्रालय में फोन करके उस प्रमोशन ऑर्डर को ही रद्द करवा दिया। उन्होंने कहा कि प्रमोशन योग्यता से होना चाहिए, सिफारिश से नहीं।
इस घटना का जिक्र Lal Bahadur Shastri Institute of Management की जीवनी और कई पुस्तकों में मिलता है।
क्या सीख मिलती है?
इन दोनों घटनाओं में एक ही सूत्र है - ईमानदारी भाषणों में नहीं, घर से शुरू होती है।
आज जब हम गांधी जयंती (2 अक्टूबर) और शास्त्री जयंती एक साथ मनाते हैं, तो ये किस्सा और प्रासंगिक हो जाता है। महात्मा गांधी ने कहा था - "सादगी में ही असली सुंदरता है।" शास्त्री जी उसी सादगी के जीते-जागते उदाहरण थे। एक फटा कुर्ता, धोती, और कर्ज लेकर खरीदी गई Fiat कार - यही थी एक प्रधानमंत्री की संपत्ति।
शास्त्री जी ने अपने बच्चों को सिखाया कि पद का मतलब VIP बनना नहीं, बल्कि जनता के बीच एक आम इंसान की तरह रहना है। उन्होंने अपने बेटे को भीड़ से अलग नहीं, भीड़ के बराबर रखा।
आज के नेताओं के लिए यह सबसे बड़ा संदेश है - अगर आप चाहते हैं कि देश ईमानदार बने, तो शुरुआत अपने घर से करनी होगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 2,2026
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