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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Monday, 19 January 2026

January 19, 2026

तमिलनाडु में बड़ा राजनीतिक ड्रामा: राज्यपाल आर.एन. रवि ने विधानसभा में भाषण देने से इनकार किया, माइक्रोफोन बंद करने का आरोप, राजभवन ने जारी किया 13 पॉइंट्स का तीखा बयान!

तमिलनाडु में बड़ा राजनीतिक ड्रामा: राज्यपाल आर.एन. रवि ने विधानसभा में भाषण देने से इनकार किया, माइक्रोफोन बंद करने का आरोप, राजभवन ने जारी किया 13 पॉइंट्स का तीखा बयान!
-Friday World January 20,2026 
चेन्नई। तमिलनाडु विधानसभा में मंगलवार को एक ऐतिहासिक और विवादास्पद घटना घटी, जब राज्यपाल आर.एन. रवि ने डीएमके सरकार द्वारा तैयार किए गए अभिभाषण को पढ़ने से साफ इनकार कर दिया। पारंपरिक रूप से राज्यपाल द्वारा विधानसभा सत्र के उद्घाटन पर दिया जाने वाला भाषण बिना बोले ही वे सदन से बाहर चले गए। इस घटना ने राज्य की राजनीति में तूफान मचा दिया है और केंद्र-राज्य संबंधों पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। 

घटना के कुछ ही मिनट बाद राजभवन (लोक भवन) ने एक विस्तृत प्रेस बयान जारी किया, जिसमें 13 बिंदुओं में स्पष्ट किया गया कि राज्यपाल ने भाषण क्यों नहीं पढ़ा। राजभवन ने सीधे-सीधे आरोप लगाया कि राज्यपाल का माइक्रोफोन बार-बार बंद किया गया और उन्हें बोलने नहीं दिया गया। बयान में कहा गया, “राज्यपाल को सदन में अपमानित करने की कोशिश की गई। माइक्रोफोन जानबूझकर बंद किए गए, जिससे वे अपना अभिभाषण नहीं पढ़ पाए।”

 राजभवन ने सरकार द्वारा तैयार किए गए अभिभाषण की कड़ी आलोचना की और इसे “भ्रामक, अप्रमाणित दावों से भरा” बताया। बयान के अनुसार, भाषण में कई महत्वपूर्ण मुद्दों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है, जबकि कुछ दावे पूरी तरह से गलत और अतिशयोक्तिपूर्ण हैं। 

 मुख्य आरोप और तथ्य जो राजभवन ने गिनाए 

1. निवेश के झूठे दावे सरकार ने दावा किया कि राज्य में 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आया है। राजभवन ने इसे झूठा करार दिया। बयान में कहा गया कि अधिकांश एमओयू सिर्फ कागजी हैं, वास्तविक निवेश इसका बहुत छोटा हिस्सा है। चार साल पहले तमिलनाडु विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) में चौथे स्थान पर था, लेकिन अब वह छठे स्थान पर बने रहने के लिए संघर्ष कर रहा है। 


2. दलितों पर अत्याचार में वृद्धि राज्य में दलितों पर अत्याचार और दलित महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, लेकिन अभिभाषण में इस गंभीर मुद्दे का जिक्र तक नहीं किया गया।

 3. कानून-व्यवस्था का बिगड़ता हाल महिलाओं के खिलाफ अपराध, विशेषकर सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले बढ़े हैं। अभिभाषण में इन पर चुप्पी साधी गई।

 4. शिक्षा और स्वास्थ्य में पिछड़ापन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, अस्पतालों में दवाइयों और उपकरणों की कमी जैसे मुद्दों को नजरअंदाज किया गया। 

5. औद्योगिक क्षेत्र में गिरावट कई बड़े उद्योग राज्य छोड़कर जा रहे हैं। निवेशकों का भरोसा टूट रहा है। 

राजभवन ने इसे “लोगों को गुमराह करने की कोशिश” करार दिया और कहा कि राज्यपाल ने ऐसे भ्रामक दस्तावेज को सदन में पढ़ने से इनकार कर सही कदम उठाया। 

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और विवाद डीएमके सरकार ने इस घटना को “संवैधानिक संकट” करार दिया। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने कहा कि राज्यपाल ने विधानसभा की गरिमा को ठेस पहुंचाई है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्यपाल केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं और लगातार राज्य सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। 

विपक्षी दलों, खासकर AIADMK और BJP ने इस घटना पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। AIADMK ने सरकार पर निशाना साधा कि अभिभाषण में विकास के दावे अतिरंजित थे, जबकि BJP ने राज्यपाल के कदम का समर्थन किया। 

 क्या है आगे का रास्ता? संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यपाल का अभिभाषण न पढ़ना असामान्य है, लेकिन अगर दस्तावेज में गलतियां या भ्रामक तथ्य हैं तो वे इसे पढ़ने से इनकार कर सकते हैं। हालांकि, माइक्रोफोन बंद करने का आरोप अगर साबित हुआ तो यह विधानसभा की कार्यवाही पर गंभीर सवाल उठाएगा।

 राजभवन ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल का यह कदम किसी व्यक्तिगत विवाद का नहीं, बल्कि संवैधानिक गरिमा और सत्य की रक्षा का है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि राज्यपाल ने सदन की परंपरा तोड़ी है और अब सुप्रीम कोर्ट में मामला जा सकता है।

 यह घटना तमिलनाडु की राजनीति में केंद्र-राज्य टकराव का नया अध्याय जोड़ रही है। आने वाले दिनों में दोनों पक्षों की ओर से और तीखे बयान आने की संभावना है। राज्य की जनता अब इंतजार कर रही है कि इस संवैधानिक विवाद का हल कैसे निकलता है और विकास के असली मुद्दों पर कब चर्चा होगी। 

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World January 20,2026 
January 19, 2026

ट्रंप की ग्रीनलैंड धमकी पर यूरोप का करारा जवाब: 7 देशों के सैनिक पहुंचे, ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस शुरू – इटली बोला, "ये तो मजाक है!"

ट्रंप की ग्रीनलैंड धमकी पर यूरोप का करारा जवाब: 7 देशों के सैनिक पहुंचे, ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस शुरू – इटली बोला, "ये तो मजाक है!"
-Friday World January 20,2026 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की लगातार धमकियों ने पूरे यूरोप को हिला दिया है। ट्रंप ने बार-बार दावा किया है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है और इसे किसी भी कीमत पर हासिल किया जाएगा। इन धमकियों के जवाब में डेनमार्क (जिसके अधीन ग्रीनलैंड एक स्वायत्त क्षेत्र है) ने अपने नाटो सहयोगी देशों के साथ मिलकर ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस नाम से एक संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया है। इस अभ्यास के तहत कई यूरोपीय देशों ने अपने सैनिक ग्रीनलैंड भेजे हैं, जो एक मजबूत राजनीतिक और सैन्य संदेश दे रहा है – ग्रीनलैंड अकेला नहीं है! 

फ्रांस ने 15 सैनिक भेजे हैं, जो 27वीं माउंटेन इन्फैंट्री ब्रिगेड से हैं। जर्मनी ने 13 सैनिकों की एक टोही टीम तैनात की है। ब्रिटेन ने सिर्फ 1 सैन्य अधिकारी को शामिल किया है। नॉर्वे, नीदरलैंड्स और फिनलैंड ने भी अपने-अपने सैनिक भेजे हैं, जबकि स्वीडन ने सैनिकों की तैनाती की पुष्टि की है, हालांकि संख्या अभी सार्वजनिक नहीं की गई। कुल मिलाकर, इन यूरोपीय देशों से लगभग 35-40 सैनिक ग्रीनलैंड पहुंच चुके हैं। डेनमार्क पहले से ही वहां लगभग 200 सैनिक तैनात कर चुका है, साथ ही 14 सदस्यीय सीरियस डॉग स्लेज पेट्रोल टीम भी मौजूद है, जो आर्कटिक क्षेत्र में गश्त करती है। 

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट कहा है कि आने वाले दिनों में ग्रीनलैंड में जमीनी, हवाई और समुद्री ताकत को और मजबूत किया जाएगा। उन्होंने इसे नाटो की एकजुटता का प्रतीक बताया और कहा कि यह छोटी संख्या भले ही कम लगे, लेकिन इसका मकसद राजनीतिक संदेश देना है – नाटो एक साथ खड़ा है। डेनमार्क के नेतृत्व में चल रहा यह अभ्यास आर्कटिक क्षेत्र में सहयोगी देशों के बीच तालमेल और ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि अगर भविष्य में ग्रीनलैंड में बड़ी संख्या में सैनिक तैनात करने की जरूरत पड़ी, तो तैयारी कैसी होगी।

 डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह अभ्यास आर्कटिक में बढ़ती चुनौतियों (रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी सहित) का जवाब है। भविष्य में इससे बड़ा मिशन ऑपरेशन आर्कटिक सेंचुरी शुरू करने की योजना है, जो एक पूर्ण नाटो मिशन होगा। इसका लक्ष्य ग्रीनलैंड और आसपास के क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाना और किसी भी खतरे का सैन्य जवाब देने की क्षमता मजबूत करना है। हालांकि, जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस के अनुसार, यह बड़ा मिशन अभी कई महीनों दूर है। फिलहाल, यह तैयारी और योजना का चरण है, कोई बड़ा नया सैन्य अभियान नहीं शुरू हुआ है। 

दूसरी ओर, इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेट्टो ने इस पूरे मामले पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने यूरोपीय देशों की छोटी-छोटी तैनाती को "मजाक" करार दिया। उन्होंने कहा, "100, 200 या 300 सैनिक क्या कर लेंगे? 15 इटालियन, 15 फ्रेंच, 15 जर्मन – ये तो मजाक की शुरुआत लगती है!" इटली ने स्पष्ट रूप से कोई सैनिक भेजने से इनकार कर दिया है और इसे रणनीतिक रूप से बेमानी बताया है। उनका मानना है कि नाटो को सामूहिक और ठोस तरीके से काम करना चाहिए, न कि ऐसे छोटे-छोटे इशारों से। 

ट्रंप की धमकियों ने नाटो के अंदर गहरी दरार पैदा कर दी है। अमेरिका ने इन देशों पर 10% टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिसे बाद में बढ़ाकर 25% करने की बात कही गई है। यूरोपीय देशों ने इसे "ट्रांसएटलांटिक संबंधों को कमजोर करने वाला" कदम बताया और चेतावनी दी कि इससे खतरनाक downward spiral शुरू हो सकता है। ग्रीनलैंड के लोग भी ट्रंप की धमकियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और स्पष्ट कह रहे हैं कि उनका द्वीप बिकाऊ नहीं है।

 यह घटनाक्रम आर्कटिक क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव को नया रूप दे रहा है। ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत (खनिज संसाधन, सैन्य बेस और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव) के कारण यह विवाद सिर्फ एक द्वीप का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का मुद्दा बन गया है। यूरोप की एकजुटता और ट्रंप की आक्रामक नीति के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है, जिसका असर नाटो की एकता पर पड़ सकता है। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World January 20,2026 
January 19, 2026

ચોટીલામાં પોલીસનું મેગા 'ડે-કોમ્બિંગ' ઓપરેશન: બુટલેગરોના ઘરે દરોડા, 1.31 કરોડનો વીજદંડ, 7 હોટલો પર તપાસ – અસામાજિક તત્વોમાં ફફડાટ!

ચોટીલામાં પોલીસનું મેગા 'ડે-કોમ્બિંગ' ઓપરેશન: બુટલેગરોના ઘરે દરોડા, 1.31 કરોડનો વીજદંડ, 7 હોટલો પર તપાસ – અસામાજિક તત્વોમાં ફફડાટ!
-Friday World January 20,2026 
સુરેન્દ્રનગર જિલ્લાના ચોટીલા વિસ્તારમાં ગુજરાત પોલીસે એક ધમાકેદાર અને સંયુક્ત ઓપરેશન દ્વારા અસામાજિક તત્વો અને પ્રોહિબિશનના આરોપીઓ પર કડક કાર્યવાહી કરી છે. જિલ્લા પોલીસ અધિક્ષક શ્રી પ્રેમસુખ ડેલૂ (IPS)ના સીધા માર્ગદર્શન અને નેતૃત્વ હેઠળ ચોટીલા પોલીસ સ્ટેશન વિસ્તારમાં 'ડે-કોમ્બિંગ' નામનું આ મોટું ઓપરેશન હાથ ધરવામાં આવ્યું હતું. આ કાર્યવાહીમાં પોલીસે માત્ર દારૂબંધીના ગુનાઓ પર જ નહીં, પરંતુ વીજળીની ચોરી અને અન્ય અસામાજિક પ્રવૃત્તિઓ પર પણ સખત હાથ રાખ્યો છે, જેનાથી આખા વિસ્તારમાં અસામાજિક તત્વોમાં ભારે ખળભળાટ મચી ગયો છે. 

આ ઓપરેશનની વિશેષતા એ હતી કે પોલીસે પસંદગીની 43 ટીમો સાથે PGVCL (પશ્ચિમ ગુજરાત વીજ કંપની લિમિટેડ)ના અધિકારીઓ અને કર્મચારીઓને જોડીને મોટા પાયે વીજ ચેકિંગ કર્યું. નાની મોલડી, જાની વડલ, જાની વડલા, કાંધાસર અને ચોટીલા ટાઉન જેવા વિસ્તારોમાં બુટલેગરો અને અસામાજિક તત્વોના રહેઠાણો પર દરોડા પાડવામાં આવ્યા. આ તપાસ દરમિયાન ગેરકાયદેસર વીજ વપરાશના અનેક કેસ ઝડપાયા, જેના પરિણામે રૂ. 1,30,90,000 (એક કરોડ ત્રીસ લાખ નેવું હજાર)નો વીજદંડ ફટકારવામાં આવ્યો. આ ઉપરાંત, ઓપરેશન દરમિયાન 6 વાહનો ડિટેઈન કરવામાં આવ્યા અને સ્થળ પર જ રૂ. 9,300 નો દંડ વસૂલ કરવામાં આવ્યો. 

પોલીસે જેમના ઘરે તપાસ કરી અને વીજદંડ ફટકાર્યો તેમાં મુખ્ય આરોપીઓમાં પ્રતાપભાઈ રામભાઈ બસીયા (નાની મોલડી), ભરતભાઈ રામભાઈ બસીયા, ઉમેશ જેઠસૂરભાઈ ખાચર (જાની વડલા) અને સંજયભાઈ ભુપતભાઈ ખાચર (કાંધાસર) જેવા નામો સામેલ છે. આ તમામ વ્યક્તિઓ અગાઉ પ્રોહિબિશન, હત્યાના પ્રયાસ (IPC કલમ 307), રાયોટિંગ અને અન્ય ગંભીર ગુનાઓમાં સંડોવાયેલા હોવાનું જાણવા મળ્યું છે. આવા તત્વોને લાંબા સમયથી કાયદાની બહાર રહેવાની તક મળી રહી હતી, પરંતુ આ ઓપરેશને તેમને સીધો સંદેશ આપ્યો છે કે કાયદો કોઈને બક્ષતો નથી. 

નેશનલ હાઈવે પર આવેલી 7 શંકાસ્પદ હોટલો માં પણ પોલીસે સઘન તપાસ હાથ ધરી. આ હોટલોમાં અસામાજિક પ્રવૃત્તિઓ, પ્રોહિબિશન સાથે જોડાયેલી ગતિવિધિઓ અને અન્ય ગેરકાયદેસર કામો ચાલતા હોવાની શંકા હતી. તપાસ દરમિયાન કાયદેસરની જરૂરી કાર્યવાહી કરવામાં આવી અને આવા સ્થળો પર પણ નજર રાખવાની વ્યવસ્થા કરવામાં આવી છે.

 આ સમગ્ર ઓપરેશનમાં ઇન્ચાર્જ નાયબ પોલીસ અધિક્ષક વી.એમ. રબારી, સુરેન્દ્રનગર એલ.સી.બી. ટીમ, ચોટીલા ડિવિઝન અને લીંબડી ડિવિઝનના અધિકારીઓ તથા કર્મચારીઓની અલગ-અલગ ટીમો સક્રિય રહી. આ કાર્યવાહીએ જિલ્લામાં કાયદા-વ્યવસ્થાને મજબૂત કરવાનો સંદેશ આપ્યો છે. પોલીસ અધિકારીઓએ સ્પષ્ટ જણાવ્યું છે કે આવી કડક કાર્યવાહી આગામી દિવસોમાં પણ નિયમિત રીતે ચાલુ રહેશે, જેથી અસામાજિક તત્વોને કોઈ રાહત ન મળે. 

ચોટીલા અને આજુબાજુના વિસ્તારોના નાગરિકોમાં આ ઓપરેશનને લઈને સકારાત્મક પ્રતિસાદ મળી રહ્યો છે. લોકો માને છે કે આવા પગલાંથી સમાજમાં શાંતિ, સુરક્ષા અને કાયદાનું શાસન વધુ મજબૂત બનશે. જિલ્લા વાસીઓને અપીલ કરવામાં આવી છે કે તેઓ આવી અસામાજિક પ્રવૃત્તિઓ વિશે તાત્કાલિક માહિતી પોલીસને આપે, જેથી વધુ અસરકારક કાર્યવાહી થઈ શકે. 

આ ઓપરેશન ગુજરાત પોલીસની પ્રોહિબિશન નીતિને અમલમાં મૂકવા અને કાયદા-વ્યવસ્થા જાળવવાની પ્રતિબદ્ધતાનું ઉત્તમ ઉદાહરણ છે. આવી કાર્યવાહીઓથી જિલ્લામાં સકારાત્મક વાતાવરણ સર્જાઈ રહ્યું છે અને નાગરિકોમાં વિશ્વાસ વધી રહ્યો છે.
Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World January 20,2026 
January 19, 2026

ગુજરાત મા દાદાનુ બુલડોઝર ધીમી પણ મક્કમ ગતિએ ચાલુ છે: વટવાના વાંદરવટ તળાવને મળશે નવું જીવન!

ગુજરાત મા દાદાનુ બુલડોઝર ધીમી પણ મક્કમ ગતિએ ચાલુ છે: વટવાના વાંદરવટ તળાવને મળશે નવું જીવન!
-Friday World January 20,2026
અમદાવાદ શહેરના હૃદયમાં વસેલા પ્રાચીન તળાવોને પુનઃજીવિત કરવાની મહાઝુંબેશ આજે નવી ઊંચાઈએ પહોંચી છે. ચંડોળા અને ઈસનપુર તળાવો પછી હવે વટવા વિસ્તારના વાંદરવટ તળાવ પર અમદાવાદ મ્યુનિસિપલ કોર્પોરેશન (AMC) દ્વારા મેગા ડિમોલિશન ડ્રાઈવ શરૂ થઈ ગઈ છે. 20 જાન્યુઆરી, 2026ની વહેલી સવારથી જ બુલડોઝર અને જેસીબીની ગર્જના ગુંજી ઉઠી છે, જે શહેરના પર્યાવરણ અને જળસંગ્રહને નવું આયામ આપવાનું વચન આપી રહી છે. 

મેગા ઓપરેશનની વિગતો: 400+ દબાણો પર કાર્યવાહી વાંદરવટ તળાવ અને તેની આસપાસના વિસ્તારમાં વર્ષોથી ખડકાયેલા આશરે 400 ગેરકાયદેસર દબાણો ને હટાવવાનું કામ ધીમી પણ અત્યંત મક્કમ ગતિએ ચાલુ છે. આ કાર્યવાહીમાં 10 હિટાચી મશીનો, 5 જેસીબી અને મોટી સંખ્યામાં મજૂરોની ટીમો કામે લાગી છે. AMCના એસ્ટેટ વિભાગની 10 ટીમો આ ઓપરેશનને સંચાલિત કરી રહી છે.

 સુરક્ષાને લઈને કોઈ જ કસર છોડવામાં આવી નથી. ઝોન-6 પોલીસ સ્ટેશન ના આશરે 500 પોલીસ જવાનો તહેનાત કરવામાં આવ્યા છે, જ્યારે AMCના 300થી વધુ અધિકારીઓ-કર્મચારીઓ સ્થળ પર સતત મોનિટરિંગ કરી રહ્યા છે. આખું વિસ્તાર પોલીસ બંદોબસ્ત હેઠળ છે, જેથી કોઈ અનિચ્છનીય ઘટના ન બને. 

પહેલાં નોટિસ, પછી કાર્યવાહી AMCએ આ પહેલાં તમામ દબાણકર્તાઓને કાયદેસર નોટિસ જારી કરી હતી અને સ્વેચ્છાએ જગ્યા ખાલી કરવાની તક આપી હતી. જોકે, કેટલાક રહીશો દ્વારા બાંધકામો દૂર ન કરાતા તંત્રને આ અંતિમ પગલું ભરવું પડ્યું. આ કાર્યવાહી ચાર તબક્કામાં (ફેઝ) હાથ ધરવામાં આવી રહી છે. પ્રારંભ નૈયા મયંક સીઝનેબલ સ્ટોર પાસેથી કરવામાં આવ્યો હતો. ફિરદોસ મસ્જિદ સહિતના બે મુખ્ય ધાર્મિક સ્થળોને બાકાત રાખીને અન્ય તમામ ગેરકાયદેસર બાંધકામોને જમીનદોસ્ત કરવામાં આવી રહ્યા છે. 

ઘર વિહોણા થનારા પરિવારો માટે માનવીય વ્યવસ્થા આ ઝુંબેશમાં સૌથી વધુ ધ્યાન આપવામાં આવ્યું છે એ છે – પ્રભાવિત પરિવારોની સુરક્ષા અને પુનર્વસન. AMCએ ખાસ વ્યવસ્થા કરી છે: 

- રહીશોને તેમનો સામાન ખસેડવા માટે AMTS બસો સ્ટેન્ડ-બાય રાખવામાં આવી છે. 

- જે પરિવારો પાસે વૈકલ્પિક રહેઠાણ નથી, તેમને મ્યુનિસિપલ શેલ્ટર હોમ માં સ્થાનાંતરિત કરવાની સુવિધા આપવામાં આવી છે.

 આ પગલું દર્શાવે છે કે તંત્ર માત્ર દબાણ હટાવવા માટે જ નહીં, પરંતુ માનવીય સંવેદનશીલતા સાથે આગળ વધી રહ્યું છે. 

 તળાવ પુનઃજીવનના ફાયદા: પર્યાવરણ અને રહેવાસીઓ માટે આશીર્વાદ આ મેગા ઓપરેશન પૂર્ણ થતાં વાંદરવટ તળાવની જળસંગ્રહ ક્ષમતા માં નોંધપાત્ર વધારો થશે. આસપાસના વિસ્તારોમાં જળબંબાકાર ની સમસ્યા ઘટશે અને ભૂગર્ભ જળસ્તર માં સુધારો આવશે. તળાવને સરકારી પ્રોજેક્ટ હેઠળ ડેવલપ કરવામાં આવશે, જેથી રહેવાસીઓને સુંદર, હરિયાળું અને પર્યાવરણને અનુકૂળ વિસ્તાર મળશે. 

આ ઝુંબેશ અમદાવાદને વધુ સ્વચ્છ, ટકાઉ અને જળસંરક્ષણમાં અગ્રેસર બનાવવાનું પ્રતીક છે. દાદાનો બુલડોઝર ધીમો ચાલે છે, પણ રોકાયો નથી – કારણ કે શહેરનું ભવિષ્ય અને પર્યાવરણનું રક્ષણ તેના હાથમાં છે! 
Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World January 20,2026 
January 19, 2026

पश्चिमी अपराधों की काली सच्चाई: बगराम जेल – अमेरिकी मानवाधिकार उल्लंघनों का सबसे कुख्यात प्रतीक

पश्चिमी अपराधों की काली सच्चाई: बगराम जेल – अमेरिकी मानवाधिकार उल्लंघनों का सबसे कुख्यात प्रतीक -Friday World January 19,2026
2001 में 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और "आतंक के खिलाफ युद्ध" की शुरुआत की। इसी युद्ध के दौरान बगराम एयर बेस पर स्थापित बगराम जेल (Bagram Theater Internment Facility) अमेरिकी सेना और CIA के लिए एक प्रमुख डिटेंशन सेंटर बन गई। इसे अक्सर "अफगानिस्तान की ग्वांतानामो" कहा जाता है, जहां हजारों अफगानों को बिना ट्रायल, बिना कानूनी सहायता और बिना परिवार की जानकारी के रखा गया। यह जेल न केवल संदिग्ध आतंकवादियों की हिरासत का केंद्र थी, बल्कि व्यवस्थित यातना, अमानवीय व्यवहार और मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन का प्रतीक भी बन गई। 

 बगराम जेल की स्थापना और संरचना काबुल से लगभग 50 किलोमीटर उत्तर में स्थित बगराम एयर बेस पर 2002 में यह जेल बनाई गई। इसमें 120 से अधिक सेल थे और क्षमता 5,000-6,000 कैदियों की थी। शुरू में इसे हथियारबंद समूहों से जुड़े संदिग्धों के लिए बनाया गया था, लेकिन जल्द ही यह एक ऐसी जगह बन गई जहां पारदर्शिता, कानूनी निगरानी और मानवीय मानकों का पूरी तरह उल्लंघन हुआ। Human Rights Watch और Amnesty International जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इसे "काला स्थान" करार दिया, जहां CIA और अमेरिकी सेना द्वारा यातना के तरीके अपनाए गए। 

अमानवीय यातना और शारीरिक शोषण के तरीके बगराम में कैदियों के साथ व्यवहार क्रूर और व्यवस्थित था। रिपोर्ट्स के अनुसार: 

- कैदियों को छत से चेन से बांधकर लटकाया जाता था। 

- ठंडे कमरों में रखा जाता, नींद से वंचित किया जाता (स्लीप डिप्रिवेशन), तेज रोशनी और आवाजों से परेशान किया जाता। 

- "पेरोनियल स्ट्राइक्स" जैसे तरीकों से पैरों पर बार-बार मारपीट की जाती, जिससे गंभीर चोटें लगतीं। 

- कुछ मामलों में इलेक्ट्रिक शॉक, कुत्तों से धमकाना, अपमानजनक स्थिति में रखना और यौन शोषण जैसी घटनाएं भी दर्ज हुईं।

 ये तरीके जानकारी निकालने के नाम पर अपनाए जाते थे, लेकिन वास्तव में ये यातना के क्लासिक उदाहरण थे, जो अंतरराष्ट्रीय कानून (जैसे जेनेवा कन्वेंशन्स) का उल्लंघन थे। 

सबसे कुख्यात मामले: दिलावर और मुल्ला हबीबुल्लाह की मौतें 2002 दिसंबर में दो अफगान कैदियों – मुल्ला हबीबुल्लाह (एक धार्मिक नेता) और दिलावर (22 वर्षीय टैक्सी ड्राइवर और किसान) – की मौत ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। 

दोनों को छत से चेन से बांधकर रखा गया और कई दिनों तक क्रूर मारपीट की गई। ऑटोप्सी रिपोर्ट्स में मौत को हॉमिसाइड (हत्या) घोषित किया गया – ब्लंट फोर्स ट्रॉमा के कारण। दिलावर के पैरों पर इतनी गंभीर चोटें थीं कि उन्हें "बस से कुचले जाने" जैसी बताया गया। मुल्ला हबीबुल्लाह की मौत भी इसी तरह की यातना से हुई। 

Human Rights Watch और New York Times की जांच में पता चला कि ये मौतें अमेरिकी सैनिकों द्वारा की गई व्यवस्थित यातना का नतीजा थीं। सात सैनिकों पर आरोप लगे, लेकिन सजा हल्की रही – कुछ महीनों की जेल, पदावनति या जुर्माना। कोई भी हत्या के लिए सीधे दोषी नहीं ठहराया गया। 

कानूनी पारदर्शिता की कमी और अंतरराष्ट्रीय आलोचना बगराम में कैदियों को बिना ट्रायल महीनों- सालों तक रखा जाता था। परिवारों को जानकारी नहीं दी जाती, वकीलों तक पहुंच नहीं थी। ग्वांतानामो की तुलना में बगराम ज्यादा "अंधेरे में" रहा, जिससे यातना की खबरें देर से आईं। 

Human Rights Watch (2004 रिपोर्ट "Enduring Freedom") और Amnesty International ने व्यवस्थित यातना की पुष्टि की। अफगान सरकार की जांच समिति (2002) ने भी बड़े पैमाने पर अपराधों का खुलासा किया। संयुक्त राष्ट्र और अन्य संगठनों ने इसे "क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार" करार दिया। 

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बगराम की यातनाओं ने अफगान लोगों में अमेरिकी सेनाओं के प्रति गहरा अविश्वास पैदा किया। कई अफगानों ने इसे विदेशी ताकतों का सामान्य व्यवहार माना, जिससे विद्रोह और तनाव बढ़ा। यह "आतंक के खिलाफ युद्ध" की नैतिक विफलता का प्रतीक बन गया। 

सुधारों की कोशिश और अंतिम हस्तांतरण दबाव बढ़ने पर अमेरिका ने कुछ सुधार किए, लेकिन जेल की बदनामी नहीं मिटी। 2014-2015 में अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान से निकलने के बाद जेल अफगान सरकार को सौंपी गई। लेकिन बगराम की यादें आज भी मानवाधिकार उल्लंघनों की एक काली सच्चाई के रूप में बनी हुई हैं।

बगराम जेल सिर्फ एक जेल की कहानी नहीं है – यह युद्ध के दौरान सत्ता के दुरुपयोग, निगरानी की कमी और मानवाधिकारों से भटकने का जीवंत उदाहरण है। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, ने "लोकतंत्र और मानवाधिकार" के नाम पर जो अपराध किए, वे आज भी सवाल उठाते हैं: क्या शक्ति के नशे में इंसानियत की कीमत चुकानी पड़ती है? 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World January 19,2026
January 19, 2026

ट्रंप के 'ग्रीनलैंड कब्जा' प्लान के खिलाफ बर्फीले सड़कों पर उबाल: हजारों लोग चिल्लाए - "हम बिकाऊ नहीं!"

ट्रंप के 'ग्रीनलैंड कब्जा' प्लान के खिलाफ बर्फीले सड़कों पर उबाल: हजारों लोग चिल्लाए - "हम बिकाऊ नहीं!"
-Friday World January 19,2026 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विवादास्पद महत्वाकांक्षा ने फिर से दुनिया को हिला दिया है। ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की अपनी पुरानी जिद को नया रूप दिया है और अब इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए धमकी भरे कदम उठा रहे हैं। शनिवार को ग्रीनलैंड की राजधानी नूक और डेनमार्क के कई बड़े शहरों जैसे कोपेनहेगन, आरहूस, आल्बोर्ग और ओडेंस में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। ये प्रदर्शन इतने बड़े पैमाने पर थे कि इन्हें इन इलाकों के इतिहास का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन कहा जा रहा है। लोग बर्फीली ठंड में भी नहीं थके, बल्कि उन्होंने ट्रंप को कड़ी चेतावनी दी - "ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है!" 

 ट्रंप की नई धमकी: टैरिफ का हथियार ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक लंबा पोस्ट लिखकर आठ यूरोपीय देशों - डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स और फिनलैंड - पर 1 फरवरी से 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर जून तक ग्रीनलैंड की "पूरी और पूर्ण खरीद" का समझौता नहीं हुआ तो यह टैरिफ 25% तक बढ़ जाएगा। ट्रंप का दावा है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है, खासकर चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ। लेकिन इस धमकी ने NATO सहयोगियों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। यूरोपीय नेताओं ने इसे "ब्लैकमेल" करार दिया और कहा कि इससे ट्रांसअटलांटिक संबंधों में खतरनाक गिरावट आ सकती है। 

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिक्सन ने साफ शब्दों में कहा, "यूरोप ब्लैकमेल नहीं सहेगा।" ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नील्सन ने भी विरोध प्रदर्शन में शामिल होकर कहा, "हम दबाव में नहीं आएंगे। ग्रीनलैंड का भविष्य ग्रीनलैंडवासी तय करेंगे, कोई और नहीं।" 

प्रदर्शन की खास बातें: "Make America Go Away" टोपी और नारे प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप के प्रसिद्ध MAGA (Make America Great Again) कैप्स का मजाक उड़ाया। हजारों लोगों ने लाल रंग की टोपियां पहनीं, जिन पर लिखा था "Make America Go Away" - यानी "अमेरिका चला जाए!"। कुछ टोपियों पर डेनिश-ग्रीनलैंडिक प्ले भी था - "Nu det NUUK!" (अब बस बहुत हो गया, जहां NUUK ग्रीनलैंड की राजधानी है)। नारे गूंज रहे थे: 

- "Greenland is not for sale!" (ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है!)

 - "Hands off Greenland!" (ग्रीनलैंड से हाथ हटाओ!) 

- "No means No!" 

कोपेनहेगन में करीब 10,000 लोग सिटी हॉल से अमेरिकी दूतावास तक मार्च निकाले। नूक में भी बड़ी संख्या में लोग जमा हुए, जहां प्रदर्शनकारियों ने ग्रीनलैंड का लाल-सफेद झंडा लहराया और ट्रंप की नीतियों को "उपनिवेशवादी" बताया। एक 57 साल के डेनिश वेटरन, जो पहली बार विरोध में शामिल हुए थे, ने कहा, "हमने इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका के साथ लड़ते हुए जानें गंवाईं। अब क्या ये सब बेकार था?" 

ग्रीनलैंड क्यों इतना महत्वपूर्ण? ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। यहां की आबादी महज 56,000 है, लेकिन इसकी सामरिक अहमियत बहुत ज्यादा है। यहां अमेरिका का पहले से थुले एयर बेस है। ट्रंप का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से आर्कटिक में नए रास्ते खुल रहे हैं और ग्रीनलैंड रूस-चीन के खिलाफ सुरक्षा के लिए जरूरी है। लेकिन ग्रीनलैंडवासी इसे साफ इनकार करते हैं। सर्वे बताते हैं कि 85-95% लोग अमेरिका में शामिल होने के खिलाफ हैं। 

दुनिया की प्रतिक्रिया और आगे क्या? यूरोपीय संघ ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है। कई देश "ट्रेड बाजूका" (प्रतिबंधात्मक उपाय) की तैयारी कर रहे हैं। ट्रंप की यह जिद न सिर्फ यूरोप-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि NATO में भी दरार डाल रही है। 

यह घटना दिखाती है कि शक्ति का इस्तेमाल कितना खतरनाक हो सकता है। ग्रीनलैंड के लोग अपनी स्वतंत्रता और गरिमा के लिए लड़ रहे हैं। दुनिया देख रही है 
- क्या ट्रंप अपनी धमकी पूरी करेंगे या यह सिर्फ एक और विवादास्पद बयान साबित होगा? 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World January 19,2026 
January 19, 2026

ટ્રમ્પના ૫૦% ટેરિફથી સુરતના હીરા ઉદ્યોગની ચમક ઝાંખી, સ્કુલ મા ક્લાસરૂમમાં ખાલી બેન્ચોની સંખ્યા વધી વિદ્યાર્થી ડ્રૉપઆઉટ વધ્યો

ટ્રમ્પના ૫૦% ટેરિફથી સુરતના હીરા ઉદ્યોગની ચમક ઝાંખી, સ્કુલ મા ક્લાસરૂમમાં ખાલી બેન્ચોની સંખ્યા વધી વિદ્યાર્થી ડ્રૉપઆઉટ વધ્યો
-Friday World January 19,2026 
અમેરિકાના રાષ્ટ્રપતિ ડોનાલ્ડ ટ્રમ્પે ભારતીય નિકાસ પર લાદેલા ૫૦ ટકા ટેરિફે ગુજરાતના 'ડાયમંડ સિટી' સુરતને ગંભીર આઘાત આપ્યો છે. આ ટેરિફ મુખ્યત્વે ભારતના રશિયન તેલના ખરીદીને કારણે લાદવામાં આવ્યો હતો, જે જુલાઈ ૨૦૨૫માં ૨૫ ટકાથી શરૂ થઈને ઓગસ્ટમાં ૫૦ ટકા સુધી વધારાયો. આની સીધી અસર હીરા ઉદ્યોગ પર પડી છે, જે સુરતમાં વિશ્વના ૯૦ ટકા હીરાનું કટિંગ અને પોલિશિંગ કરે છે. નિકાસમાં તીવ્ર ઘટાડો થતાં લાખો કારીગરોની રોજગારી ખતરામાં મુકાઈ છે અને આની લહેર હવે સ્કૂલોના ક્લાસરૂમ સુધી પહોંચી ગઈ છે. 

સુરતના હીરા ઉદ્યોગમાં આશરે ૭ થી ૮ લાખ લોકો સીધા કામ કરે છે, જેમાં મોટા ભાગના માઈગ્રન્ટ વર્કર્સ છે. ટેરિફને કારણે અમેરિકામાં હીરાની માંગ ઘટી છે, ઓર્ડર્સ બંધ થયા છે અને ફેક્ટરીઓમાં લેઓફ અને વેતનમાં ઘટાડો થયો છે. અગાઉ ૩૦-૩૫ હજાર રૂપિયા મહિને કમાતા કારીગરોનો પગાર હવે ૨૦-૨૨ હજાર રૂપિયા સુધી ઘટી ગયો છે. આ આર્થિક સંકટને કારણે હજારો પરિવારો મોંઘી ખાનગી સ્કૂલોની ફી ભરવામાં અસમર્થ બન્યા છે. પરિણામે, વાલીઓએ પોતાના બાળકોને ખાનગી સ્કૂલોમાંથી ઉપાડીને સસ્તી સરકારી સ્કૂલોમાં દાખલ કરાવ્યા છે અથવા તો સંપૂર્ણ શિક્ષણ અટકાવી દીધું છે. ઘણા કારીગરો પોતાના ગામડે પરત ફરી ગયા છે, જેનાથી સુરતમાં મિડ-સેશન ડ્રોપઆઉટનું પ્રમાણ અચાનક વધ્યું છે.

 લોકસભાના વિન્ટર સેશનમાં રજૂ કરાયેલા રિપોર્ટ અનુસાર, ૨૦૨૫-૨૬માં ગુજરાતમાં ૨.૪૦ લાખ વિદ્યાર્થીઓએ સ્કૂલ છોડી દીધી છે, જે ૨૦૨૪-૨૫ના ૫૪,૫૪૧ની સરખામણીએ ૩૪૧ ટકાનો ભયાનક વધારો દર્શાવે છે.

 એકલા સુરતમાં સુરત મ્યુનિસિપલ કોર્પોરેશનની ૨૪ સ્કૂલોમાં ૬૦૦થી વધુ વિદ્યાર્થીઓએ અધવચ્ચે અભ્યાસ છોડ્યો છે. પ્રાઇવેટ અને અન્ય સ્કૂલોમાં આ આંકડો વધુ હોઈ શકે છે. આ ડ્રોપઆઉટની વધારે માત્રા ૨૦૨૫ના બીજા અર્ધભાગમાં જોવા મળી છે, જ્યારે ટેરિફની અસર સૌથી વધુ અનુભવાઈ. 

આ સંકટ માત્ર આર્થિક નથી, પરંતુ સામાજિક પણ છે. હીરા ઉદ્યોગે દાયકાઓથી ગામડાના લોકોને શહેરમાં સારી કમાણી અને બાળકોને સારું શિક્ષણ આપવાની તક આપી હતી. પરંતુ હવે બેરોજગારી, વેતન ઘટાડો અને પરિવારોની આર્થિક તંગીએ બાળકોના ભવિષ્યને અંધારું કરી દીધું છે. ઘણા પરિવારોમાં માતા-પિતા પોતાના સપના છોડીને બાળકોને ગામડે પરત લઈ જઈ રહ્યા છે, જ્યાં શિક્ષણની સુવિધાઓ પણ મર્યાદિત છે. 

આર્થિક નિષ્ણાતો અને ઉદ્યોગ સંગઠનો જણાવે છે કે ટેરિફને કારણે હીરા નિકાસમાં ૪૦-૫૦ ટકા ઘટાડો થયો છે, જેનાથી ૫૦,૦૦૦થી વધુ નોકરીઓ સીધી અસરગ્રસ્ત થઈ છે. ઉદ્યોગને નવા બજારો જેવા કે યુરોપ, આફ્રિકા અને એશિયા તરફ વળવાની જરૂર છે, પરંતુ તેમાં સમય લાગશે. આ દરમિયાન સરકાર પાસેથી રાહત પેકેજ, ક્રેડિટ સુવિધા અને વેપાર વાટાઘાટોની અપેક્ષા વધી છે. 

સુરતના હીરા ઉદ્યોગની આ ચમક ફરીથી ઝળહળે તે માટે ઝડપી હસ્તક્ષેપ જરૂરી છે. નહીં તો આ ટેરિફની આગ ન માત્ર ફેક્ટરીઓને, પરંતુ હજારો બાળકોના સ્વપ્નોને પણ ભસ્મ કરી નાખશે. 

આજે ક્લાસરૂમમાં ખાલી બેન્ચો એક મોટી ચેતવણી છે – આર્થિક નીતિઓની અસર સીધી સામાન્ય માણસના ઘર સુધી પહોંચે છે!  
Sajjadali Nayani ✍
 Friday World January 19,2026