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Thursday, 4 December 2025

भीमा कोरेगांव केस में राहत: 5 साल जेल काटने के बाद पूर्व DU प्रोफेसर हनी बाबू को बॉम्बे हाईकोर्ट से मिली ज़मानत!

भीमा कोरेगांव केस में राहत: 5 साल जेल काटने के बाद पूर्व DU प्रोफेसर हनी बाबू को बॉम्बे हाईकोर्ट से मिली ज़मानत!
मुंबई – लंबे इंतज़ार के बाद एक बड़ी न्यायिक जीत! बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार (4 दिसंबर 2025) को दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर हनी बाबू को एल्गार परिषद-भीमा कोरेगांव केस में ज़मानत दे दी। 2020 से जेल में बंद हनी बाबू ने 5 साल से ज़्यादा (करीब 1,955 दिन) की कैद काटी है, और अब उन्हें ₹1 लाख के पर्सनल बॉन्ड और इतनी ही राशि के दो सुप्रीम पर ज़मानत पर रिहा किया जाएगा।

 यह फैसला जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस रणजीतसिंह भोंसले की डिवीजन बेंच ने सुनाया, जो अक्टूबर में सुनवाई पूरी कर चुकी थी। कोर्ट ने NIA की स्टे ऑन रिलीज़ की गुज़ारिश को ख़ारिज करते हुए कहा कि हनी बाबू की लंबी कैद और ट्रायल में देरी को देखते हुए ज़मानत जायज़ है। लिखित आदेश अभी अपलोड नहीं हुआ है, लेकिन वकील युग मोहित चौधरी ने इसे "संविधानिक अधिकारों की जीत" बताया। 

केस का बैकग्राउंड: क्या है विवाद? भीमा कोरेगांव केस 2018 का वो काला अध्याय है, जब पुणे के शनिवारवाड़ा में 31 दिसंबर 2017 को एल्गार परिषद का आयोजन हुआ। यह कार्यक्रम भीमा कोरेगांव की 200वीं वर्षगांठ पर दलित और आदिवासी अधिकारों पर केंद्रित था। पुलिस का दावा है कि वहाँ दिए गए "भड़काऊ भाषणों" ने अगले दिन (1 जनवरी 2018) कोरेगांव भीमा युद्ध स्मारक के पास जातीय हिंसा भड़का दी, जिसमें एक व्यक्ति की मौत और कई घायल हुए।

 हनी बाबू सहित 15 से ज़्यादा एक्टिविस्ट, शिक्षाविदों और वकीलों पर यूएपीए (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत "आतंकवाद" के गंभीर आरोप लगे। NIA ने उन्हें प्रतिबंधित CPI (माओवादी) से जुड़ा बताया, जिसमें PM नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश, रेवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट (RDF) से लिंक और "सेक्रेसी हैंडबुक" जैसी किताबों का प्रचार शामिल है। हनी बाबू पर आरोप है कि वे GN सैबा जैसे माओवादी समर्थकों की मदद करते थे। 

लंबी कानूनी लड़ाई: कई बार नाकामी, अब उम्मीद हनी बाबू को 28 जुलाई 2020 को NIA ने गिरफ्तार किया था। 2022 में स्पेशल NIA कोर्ट और हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी। मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट में SLP वापस लेकर उन्होंने हाईकोर्ट में नई अपील की, दलील दी कि 8 अन्य आरोपी (जैसे रونا विल्सन, सुधीर धावड़े, वर्नन गोंसाल्वेस) को पहले ही ज़मानत मिल चुकी है।

 उन्होंने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हवाला दिया, कहा कि बिना ट्रायल के लंबी कैद "असंवैधानिक" है। NIA ने विरोध किया, दावा किया कि हनी बाबू "गहरे माओवादी कनेक्शन" वाले हैं, लेकिन कोर्ट ने देरी को प्राथमिकता दी। 

हनी बाबू की साथी और DU की प्रोफेसर जेनी रोविना ने जेल में उनकी आँखों के इलाज की कमी पर USCIRF रिपोर्ट का हवाला दिया था। अब रिहाई के बाद वे परिवार से मिल सकेंगे। 

क्या असर पड़ेगा केस पर? यह ज़मानत केस को नई दिशा दे सकती है। NIA सुप्रीम कोर्ट जा सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रायल की धीमी गति (चार्जशीट दाखिल होने में ही सालों लगे) से और आरोपी लाभान्वित हो सकते हैं। मानवाधिकार संगठन इसे "UAPA के दुरुपयोग" के ख़िलाफ़ जीत बता रहे हैं। हनी बाबू की रिहाई दलित-आदिवासी आंदोलनों को बूस्ट देगी, लेकिन राजनीतिक बहस तेज़ हो सकती है। 

भीमा कोरेगांव केस अब भी न्याय की जंग है – क्या यह फैसला बाकी 10+ आरोपी (जैसे स्टैन स्वामी, जिनकी जेल में मौत हो चुकी) के लिए दरवाज़ा खोलेगा? इंतज़ार है अगले कदम का।