Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Tuesday, 16 December 2025

"BJP का 'मास्टर स्ट्रोक' या संवैधानिक जुगाड़? नितिन नवीन की कार्यकारी अध्यक्षता पर मीडिया का राग और हकीकत के सवाल!"

"BJP का 'मास्टर स्ट्रोक' या संवैधानिक जुगाड़? नितिन नवीन की कार्यकारी अध्यक्षता पर मीडिया का राग और हकीकत के सवाल!"
नई दिल्ली, 16 दिसंबर 2025: भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने हाल ही में बिहार के मंत्री और पांच बार के विधायक नितिन नवीन को अपना राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। इस फैसले को मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का 'मास्टर स्ट्रोक' करार दिया जा रहा है।

 टीवी चैनलों के एंकर, BJP कवर करने वाले रिपोर्टर और राजनीतिक विश्लेषक एक सुर में इसकी तारीफ कर रहे हैं, मानो यह कोई अभूतपूर्व राजनीतिक चाल हो। लेकिन क्या वाकई यह इतना बड़ा मास्टर स्ट्रोक है, या सिर्फ मीडिया का बनाया हुआ शोर? 

 जहां कई सवाल अनुत्तरित पड़े हैं। सबसे पहले बात मीडिया के इस उत्साह की। ये वही लोग हैं जो अगर इसी पद पर किसी दलित, ब्राह्मण, राजपूत या महिला नेता को बैठाया जाता, तो उसे भी 'मास्टर स्ट्रोक' कहकर प्रचारित करते। 
उदाहरण के लिए, 2019 में जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था, तब भी यही राग अलापा गया। अब नितिन नवीन की बारी आई है, तो दावा किया जा रहा है कि इससे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगेगा। वजह? नितिन नवीन कायस्थ समुदाय से आते हैं, और बंगाल में कायस्थ वोटर BJP की ओर आकर्षित होंगे। 

क्या यह इतना सरल है? बंगाल की राजनीति जाति से कहीं ज्यादा जटिल है, जहां विकास, रोजगार और क्षेत्रीय पहचान जैसे मुद्दे ज्यादा मायने रखते हैं। कायस्थ समुदाय बंगाल में महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या एक नियुक्ति से पूरा समुदाय BJP की झोली में आ गिरेगा? यह दावा ज्यादा कल्पना जैसा लगता है, हकीकत से दूर।

 लेकिन इस चकाचौंध के बीच एक अहम सवाल दबा दिया गया है: BJP के संविधान में 'कार्यकारी अध्यक्ष' का कोई प्रावधान है ही नहीं! BJP की आधिकारिक वेबसाइट और उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है कि पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष तीन साल के लिए चुना जाता है, और चुनाव प्रक्रिया में राष्ट्रीय और राज्य परिषदों के सदस्य शामिल होते हैं।
 संविधान में अध्यक्ष के चुनाव, पद की अवधि और शक्तियों का जिक्र है, लेकिन 'कार्यकारी' या 'वर्किंग प्रेसिडेंट' जैसी कोई अंतरिम व्यवस्था नहीं बताई गई। 2019 में जेपी नड्डा को यह पद दिया गया था, जो एक परंपरा की शुरुआत थी, लेकिन संवैधानिक आधार पर नहीं। 
अब नितिन नवीन के मामले में भी यही दोहराया जा रहा है। सवाल यह है कि अगर संविधान में प्रावधान नहीं, तो यह नियुक्ति कैसे वैध है? क्या यह सिर्फ संक्रमण काल की जुगाड़ है, या पार्टी के आंतरिक नियमों की अनदेखी? 

BJP नेताओं का कहना है कि यह अंतरिम व्यवस्था है, क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव अभी पूरा नहीं हुआ। पार्टी के संविधान के मुताबिक, कम से कम आधे राज्यों में संगठनात्मक चुनाव पूरे होने चाहिए, तभी राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव हो सकता है। वर्तमान में 30 से ज्यादा राज्यों में चुनाव हो चुके हैं, लेकिन प्रक्रिया में देरी का हवाला देकर कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति की गई। बताया जा रहा है कि यह फैसला पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठक में हुआ। लेकिन यह बैठक कब हुई, कहां हुई, और कौन-कौन शामिल थे – इसकी कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं है। मीडिया में भी इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा। क्या लोकतंत्र की सबसे बड़ी पार्टी में पारदर्शिता इतनी कम है? अगर कोई पत्रकार या विपक्षी नेता यह सवाल पूछे, तो उसे 'एंटी-नेशनल' या 'विरोधी' करार दे दिया जाता है।

 नितिन नवीन की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो वे 45 साल के युवा नेता हैं, बिहार में सड़क निर्माण मंत्री हैं, और BJP के वफादार कार्यकर्ता माने जाते हैं। उनका चयन ऊपरी जाति के चेहरे को आगे बढ़ाने और बिहार की राजनीति में संतुलन बनाने का प्रयास लगता है। लेकिन क्या यह वाकई मास्टर स्ट्रोक है?
 BJP हाल के चुनावों में कुछ राज्यों में हार का सामना कर चुकी है, और संगठनात्मक कमजोरियां उजागर हुई हैं। ऐसे में एक कार्यकारी अध्यक्ष से कितना फर्क पड़ेगा? विपक्षी पार्टियां जैसे कांग्रेस और TMC इसे BJP की आंतरिक कलह का संकेत बता रही हैं, जहां मोदी-शाह की जोड़ी हर फैसले पर हावी है। 

इस नियुक्ति का एक और पहलू है – खरमास का महीना। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, 16 दिसंबर से खरमास शुरू हो रहा है, जो शुभ कार्यों के लिए अशुभ माना जाता है। इसलिए चुनाव प्रक्रिया जनवरी तक टाली गई है। लेकिन क्या पार्टी के संवैधानिक फैसले ज्योतिष पर निर्भर होने चाहिए? यह सवाल भी विचारणीय है। 

कुल मिलाकर, नितिन नवीन की नियुक्ति BJP के लिए एक रणनीतिक कदम हो सकती है, लेकिन मीडिया का अतिरंजित प्रचार और संवैधानिक खामियां इसे विवादास्पद बनाती हैं। लोकतंत्र में पारदर्शिता और नियमों का पालन जरूरी है। अगर BJP वाकई 'सबका साथ, सबका विकास' में विश्वास रखती है, तो ऐसे फैसलों पर खुली चर्चा होनी चाहिए। अन्यथा, यह सिर्फ 'मास्टर स्ट्रोक' का शोर रहेगा, हकीकत से दूर। क्या समय आएगा जब मीडिया और नेता इन सवालों का सामना करेंगे? 
सज्जाद अली नायाणी ✍