लेबनान, 1 दिसंबर 2025– मध्य पूर्व के तनावपूर्ण परिदृश्य में एक अनोखा संवाद उभर रहा है। लेबनान का प्रभावशाली शिया संगठन हिज़्बुल्लाह, जो अक्सर वैश्विक विवादों के केंद्र में रहता है, ने पोप लियो चौदहवें को एक औपचारिक पत्र लिखकर न केवल उनका स्वागत किया है, बल्कि लेबनान को इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच 'एक सभ्यतागत पुल' के रूप में चित्रित किया है।
यह पत्र पोप की लेबनान यात्रा से ठीक पहले जारी हुआ, जो तुर्की से शुरू होकर आज रविवार को लेबनान पहुंचने वाली है। हिज़्बुल्लाह ने सह-अस्तित्व, प्रतिरोध और इज़राइल की आक्रामकता के खिलाफ एकजुटता पर जोर देते हुए, वैश्विक संकटों के बीच शांति का संदेश दिया है। हिज़्बुल्लाह का यह कदम लेबनान की धार्मिक विविधता को रेखांकित करता है, जहां मुसलमानों और ईसाइयों की सदियों पुरानी सह-अस्तित्व की मिसालें मौजूद हैं। पत्र में संगठन ने पोप जॉन पॉल द्वितीय के प्रसिद्ध कथन का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने लेबनान को "केवल एक देश नहीं, बल्कि एक संदेश" कहा था। यह संदेश विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और विचारधाराओं के बीच सेतु निर्माण की भूमिका पर केंद्रित था।
हिज़्बुल्लाह ने इसे दोहराते हुए कहा कि लेबनान न केवल भौगोलिक सीमाओं में बंधा है, बल्कि यह एक जीवंत पुल है जो पूर्व और पश्चिम, इस्लाम और ईसाई धर्म को जोड़ता है। "लेबनान इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच एक पुल है," पत्र में स्पष्ट शब्दों में कहा गया, जो धार्मिक सद्भाव की दुर्लभ मिसाल पेश करता है।
पत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वैश्विक मानवाधिकार संकट पर केंद्रित है। हिज़्बुल्लाह ने चेतावनी दी कि मानवाधिकारों के सम्मान में कमी ने दुनिया भर में वर्चस्व और हिंसा को जन्म दिया है। यह उपेक्षा न केवल स्थानीय संघर्षों को बढ़ावा देती है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता को भी खतरे में डालती है। संगठन ने सहमति-आधारित लोकतंत्र, आंतरिक सुरक्षा और बाहरी हस्तक्षेपों के खिलाफ प्रतिबद्धता दोहराई, जो लेबनान की स्वतंत्रता के लिए खतरा हैं। विशेष रूप से, हिज़्बुल्लाह ने फिलिस्तीन और लेबनान की वर्तमान स्थिति पर गहरा शोक व्यक्त किया। ग़ाज़ा में हो रही त्रासदी को "स्पष्ट नरसंहार" करार देते हुए, उन्होंने इज़राइल की कार्रवाइयों को "अस्वीकार्य आक्रमण" बताया। इन समस्याओं की जड़ को ज़ायोनी शासन की संसाधनों और भूमि पर नियंत्रण की लालसा में खोजा गया। "इज़राइल को बड़ी शक्तियों का समर्थन क्षेत्र के लोगों के अधिकारों की स्पष्ट अवहेलना है," पत्र में कहा गया, जो इज़राइल-हिज़्बुल्लाह संघर्ष के बीच एक राजनीतिक बयान के रूप में देखा जा रहा है।
हिज़्बुल्लाह ने मुसलमानों और ईसाइयों के बीच समानताओं पर विशेष जोर दिया। ईसा मसीह के अनुयायियों को "प्यार के दूत और मानवाधिकारों के रक्षक" के रूप में चित्रित करते हुए, संगठन ने पोप से अपील की कि वह लेबनान यात्रा के दौरान इज़राइल की "अन्यायपूर्ण आक्रमणों" को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करें। "लेबनान के लोगों के साथ अपनी एकजुटता दिखाएं," यह अनुरोध न केवल धार्मिक नेतृत्व को आमंत्रित करता है, बल्कि वैश्विक मंच पर न्याय की मांग करता है। यह संदेश हिज़्बुल्लाह की छवि को नरम करने का प्रयास भी प्रतीत होता है, जो अक्सर सैन्य प्रतिरोध के लिए जाना जाता है।
पत्र का समापन भावुक शब्दों में होता है: "यही वह बात है जो हम आपकी यात्रा के दौरान आपको सौंपते हैं; एक ऐसी यात्रा जिसमें आप सभी लेबनानियों के प्रति अपनी चिंता, प्यार और एकजुटता व्यक्त करते हैं। हम आपके लिए आराम और सुरक्षा की कामना करते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह दुनिया भर के अत्याचारों को न्याय, सुरक्षा और आराम प्रदान करे। शुभकामनाओं के साथ।"
पोप लियो चौदहवें की यह यात्रा लेबनान के लिए महत्वपूर्ण है, जहां धार्मिक विविधता राजनीतिक स्थिरता की कुंजी है। हिज़्बुल्लाह का यह पत्र न केवल पोप का स्वागत करता है, बल्कि मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया में एक नया अध्याय खोल सकता है। क्या यह संवाद इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष को हल करने की दिशा में कदम साबित होगा? या यह केवल एक कूटनीतिक चाल है? समय ही बताएगा, लेकिन लेबनान का 'पुल' आज फिर से विश्व का ध्यान आकर्षित कर रहा है।
✒️सज्जाद अली नायाणी