असम में NRC और ‘घुसपैठिया मुक्त भारत’ के नाम पर जो अभियान चल रहा था, आम जनता समझ रही थी कि इसका निशाना सिर्फ़ मुस्लिम-बंगाली हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह चौंकाने वाली है। अब कार्रवाई का शिकार असम के मूल निवासी हिंदू-बंगाली, चाय बागान के मज़दूर और नेपाली भाषी परिवार भी हो रहे हैं।
गोलपारा, धुबरी, बारपेटा और करीमगंज ज़िलों में विदेशी न्यायाधिकरण (FT) ने सैकड़ों हिंदू-बंगाली परिवारों को “घुसपैठिया” घोषित कर दिया है। इनके पुरखों की ज़मीन ज़ब्त कर ली गई, बैंक खाते सील कर दिए गए और कई परिवारों को डिटेंशन कैंप भेजने की प्रक्रिया शुरू हो गई। हैरानी की बात यह है कि इनमें से अधिकांश लोग 1971 से पहले असम में बसे हैं, उनके पास पुराने वोटर लिस्ट, ज़मीन के कागज़ात और गाँव के सरपंच का सर्टिफ़िकेट तक मौजूद है। फिर भी FT ने एक ही लाइन में फैसला सुना दिया – “भारतीय नागरिक होने का सबूत नहीं दिया।”
जुलाई 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, असम के FT ने पिछले एक साल में 1.2 लाख से ज़्यादा लोगों को विदेशी घोषित किया है, जिनमें लगभग 38% हिंदू-बंगाली हैं। कई मामलों में तो एक ही परिवार के कुछ सदस्य भारतीय माने गए और बाकी विदेशी! इससे साफ़ है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता की भयंकर कमी है और स्थानीय प्रशासन व पुलिस का रवैया मनमाना हो गया है।
जो लोग कल तक “मिया” को कोस रहे थे, आज खुद उसी डर में जी रहे हैं। चाय बागान के मज़दूर रामप्रसाद राय कहते हैं, “हमारे बाप-दादा यहीं पैदा हुए, हमने कभी बांग्लादेश नहीं देखा। फिर भी हमारी ज़मीन नीलाम कर दी गई।”
सवाल यह है – अगर असम को सचमुच घुसपैठियों से मुक्त करना है, तो यह दोहरे मापदंड क्यों? जब हिंदू-बंगाली परिवार भी बेघर हो रहे हैं, तब भी क्या हम यही कहेंगे कि “सब ठीक चल रहा है”?
अब समय आ गया है कि “घुसपैठिया” की परिभाषा राजनीति से ऊपर उठकर सिर्फ़ कागज़ और न्याय पर टिकी हो। वरना असम का हर आम नागरिक – चाहे हिंदू हो या मुस्लिम – इसी डर के साए में जीने को मजबूर हो जाएगा।