मध्यप्रदेश के छतरपुर में सरकारी ‘हनक’ का खौफनाक चेहरा बेनकाब छतरपुर। खाद की कतार में रोती-बिलखती एक गरीब किसान की बेटी को सिर्फ इसलिए जोरदार थप्पड़ मार दिया गया क्योंकि वो लाइन में आगे बढ़ने की गुहार लगा रही थी। थप्पड़ मारने वाली कोई और नहीं, खुद नायब तहसीलदार ऋतु सिंह थीं। वीडियो वायरल हो चुका है – एक तरफ सत्ता की हनक, दूसरी तरफ बेबस आंसू।
लड़की चिल्ला रही थी, “मैडम, पापा खेत में इंतज़ार कर रहे हैं, खाद नहीं मिली तो फसल बर्बाद हो जाएगी…” बस इतना कहते ही नायब तहसीलदार ने हाथ उठा दिया। थप्पड़ की आवाज़ पूरे इलाके में गूंज गई। भीड़ देखती रह गई, किसी की हिम्मत नहीं हुई कि आवाज़ उठाए। क्योंकि सामने थी “सरकार”।
ये पहला मामला नहीं है। मध्यप्रदेश में पिछले दो सालों में अधिकारियों द्वारा आम जनता को पीटने की दर्जनों घटनाएं सामने आ चुकी हैं। थप्पड़ मारो, जूते से पीटो, कुर्सी से मारो – सब जायज है, क्योंकि गुनहगार “आम आदमी” है और अपराधी “सरकारी वर्दी” में है।
अगर वही किसान की बेटी गुस्से में हाथ उठा देती तो इस वक्त जेल में होती।
कइ सारी धारा ए लगती (गाली-गलौज और धमकी) – सारी धाराएं लग जातीं। जमानत मिलना मुश्किल। लेकिन जब थप्पड़ सरकारी अफसर मारता है तो मामला “दुर्भाग्यपूर्ण” कहकर दबा दिया जाता है। दो मिनट में जांच कमेटी बनती है, फिर फाइल बंद।
क्यों? क्योंकि सत्ता के गलियारों में यही नियम है – अधिकारी का हाथ उठना “अनुशासन” है, गरीब का रोना “राजकार्य में बाधा” है।
आज छतरपुर की उस बेटी के गाल पर पड़ा थप्पड़ पूरे मध्यप्रदेश के गरीबों के गाल पर पड़ा है। सवाल सिर्फ ऋतु सिंह से नहीं,
सवाल उस पूरी व्यवस्था से है जो वर्दी को लाइसेंस देती है और गरीब को सिर्फ सहने का हक।
कब तक चलेगा ये अन्याय? कब तक एक थप्पड़ पर अफसर का सिर्फ ट्रांसफर होगा और गरीब की बेइज्जती होती रहेगी?
ये थप्पड़ सिर्फ एक लड़की के गाल पर नहीं, ये लोकतंत्र के गाल पर पड़ा है।