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Thursday, 11 December 2025

गंगा ज़हरीली, दिल्ली जहरीली, पर बहस सिर्फ़ वंदे मातरम पर लेकिन वंदेमातरम का सही मतलब से पूरा सदन दुर सरकार भी ओर विपक्ष भी

गंगा ज़हरीली, दिल्ली जहरीली, पर बहस सिर्फ़ वंदे मातरम पर लेकिन वंदेमातरम का सही मतलब से पूरा सदन दुर सरकार भी ओर विपक्ष भी
नई दिल्ली। टीवी खोला तो लगा जैसे कोई पुराना रिकॉर्ड बज रहा हो – बस नाम बदल गया है। पूरा सदन “वंदे मातरम” चिल्ला रहा है, लेकिन असल गीत की एक भी पंक्ति पर बात नहीं हो रही। जो गीत बंकिम बाबू ने माँ भारती की गोद में सुजला-सुफला, मलयज-शीतल हवा और शस्य-श्यामल धरती की तस्वीर खींचने के लिए लिखा था, उसी को आज संसद में जहर की स्याही से पोत दिया गया है।

 वंदे मातरम कहते हैं – “सुजलां सुफलां मातरम्” पर बहस हो रही है नेहरू और इंदिरा पर। 
गंगा-यमुना आज भी डाल-डाल जहर उगल रही हैं, कानपुर से प्रयागराज तक नदियाँ सफेद झाग उगल रही हैं,

 लेकिन किसी सांसद को सुजला (स्वच्छ जल) की याद नहीं आई। 

वंदे मातरम कहता है – “सुफलां” यानी फल-फूलों से लदी धरती। 

पर हमारे फल-सब्ज़ियों में कीटनाशक इतना है कि बच्चे कैंसर वार्ड में पहुँच रहे हैं। पंजाब के मालवा में ट्रेन को “कैंसर एक्सप्रेस” कहा जाता है। लेकिन संसद में बहस सिर्फ़ “इंदिरा ने ये किया, नेहरू ने वो किया” पर अटकी है। 

वंदे मातरम गाता है – “मलयज शीतलम्” यानी मलय पर्वत की ठंडी-ठंडी हवा।

 आज दिल्ली में साँस लेना भी ज़हरीला हो गया है। AQI 500 पार कर रहा है, बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, बुज़ुर्ग ऑक्सीजन मास्क लगाए घूम रहे हैं। पर संसद में “वंदे मातरम” के नाम पर सिर्फ़ ज़हर ही ज़हर बोला जा रहा है – राजनीतिक ज़हर। 

सच तो यह है कि आज़ादी के आंदोलन में जब क्रांतिकारी फाँसी पर चढ़ते थे तो गाते थे – “वंदे मातरम्”

 और आज सत्ता के नशे में चूर लोग उसी गीत को हथियार बना कर एक-दूसरे की छाती पर सवार हो रहे हैं।

 बंकिम बाबू ने कभी सोचा भी न था कि उनका लिखा राष्ट्र-गीतत्व एक दिन सिर्फ़ सदन में शोर मचाने और टीआरपी बटोरने का ज़रिया बन जाएगा। असली वंदे मातरम तो आज भी उन नदियों में तड़प रहा है जो प्लास्टिक और केमिकल से भरी हैं, उन खेतों में कराह रहा है जो ज़हरीली खाद से बंजर हो रहे हैं, उन फेफड़ों में दम तोड़ रहा है जो दिल्ली की हवा पीकर काले पड़ गए हैं। 

संसद में अगर सचमुच वंदे मातरम की इज़्ज़त करनी है तो बहस हो:

 - गंगा को साफ करने के नाम पर खरबों रुपए कहाँ ग़ायब हो गए? 

- पंजाब-हरियाणा में पराली क्यों जल रही, स्टबल बर्नर मशीनें क्यों नहीं पहुँचीं?

 - ज़हरीले फल-सब्ज़ियों पर बैन क्यों नहीं? 

पर नहीं। बहस सिर्फ़ नेहरू, इंदिरा और “कौन अधिक देशभक्त है” पर” हो रही है। 

यह वंदे मातरम नहीं, वंदे मातरम का मख़ौल है। यह राष्ट्र-गीत नहीं, राष्ट्र-गीत की हत्या है।

 जय हिंद। जय भारत माता। 

बस अब थोड़ी सी शर्म भी बची हो तो उसे भी ज़ाया मत कीजिए।
सज्जाद अली नायाणी✍