गुजरात के भावनगर जिले में स्थित छोटे से कस्बे घोघा की -बारवाड़ा मस्जिद (जानी जाती है जूनी मस्जिद के नाम से) एक अनोखी ऐतिहासिक धरोहर है। यह भारत की सबसे प्राचीन मस्जिदों में गिनी जाती है और दुनिया की एकमात्र जीवित मस्जिद मानी जाती है जिसका मीहराब मक्का की बजाय यरुशलम (बैतुल मुकद्दस) की दिशा में है – वह दिशा जो इस्लाम के शुरुआती दौर में किब्ला थी।
इस्लाम के आदि काल में (610 से 623-624 ईस्वी तक) मुसलमान नमाज़ यरुशलम की ओर मुख करके अदा करते थे।
पैगंबर मुहम्मद (स.) ने मदीना में हिजरत के बाद कुछ समय तक इसी दिशा का पालन किया। फिर 624 ईस्वी में किब्ला बदलकर काबा (मक्का) की ओर कर दिया गया। उसके बाद दुनिया भर में बनी मस्जिदें मक्का की ओर मुखातिब हुईं, लेकिन घोघा की यह छोटी-सी मस्जिद (मात्र 15x40 फीट) पुरानी दिशा में बनी रही।
सातवीं शताब्दी की शुरुआत में अरब व्यापारियों ने खंभात की खाड़ी के प्राचीन बंदरगाह घोघा में यह मस्जिद बनवाई। घोघा उस समय अरब, फारस और भारत के बीच व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था। अरब व्यापारी यहां मसालों, कपड़ों और घोड़ों का कारोबार करते थे। इन विदेशी (बारवाड़ा) व्यापारियों ने अपनी पूजा के लिए यह मस्जिद बनाई, जिसका नाम भी 'बारवाड़ा मस्जिद' पड़ा – गुजराती में 'बारवाड़ा' का मतलब विदेशी या बाहर के लोग।
मस्जिद की दीवार पर प्राचीन अरबी शिलालेख और छोटे गुंबद इसकी पुरातनता के साक्षी हैं। मीहराब की दिशा मक्का से लगभग 20 डिग्री उत्तर की ओर है, जो यरुशलम की ओर इशारा करती है। इतिहासकार प्रोफेसर मेहबूब देसाई जैसे विद्वानों का मानना है कि किब्ला बदलने की खबर अरब व्यापारियों तक तेजी से पहुंचती थी, इसलिए उसके बाद यरुशलम की ओर मस्जिद बनाना असंभव था। इससे यह मस्जिद चेरामन जुमा मस्जिद (केरल) से भी पुरानी साबित होती है।
आज यह मस्जिद जीर्ण-शीर्ण हालत में है। छत का बड़ा हिस्सा गिर चुका है, स्तंभों को सहारे की जरूरत है। किब्ला पुरानी दिशा में होने से यहां नियमित नमाज़ नहीं होती। दरवाजे पर बोर्ड लगा है कि यहां नमाज़ अदा न करें। यह स्मारक नहीं होने से सरकारी संरक्षण भी नहीं मिला। फिर भी, यह इस्लाम के भारत पहुंचने और प्राचीन अरब-भारतीय व्यापारिक संबंधों का जीवंत प्रमाण है।
यह अनोखी मस्जिद हमें याद दिलाती है कि सदियों पहले समुद्री रास्तों से धर्म, संस्कृति और व्यापार कैसे जुड़े थे। इसे संरक्षित करने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस इतिहास को देख सकें।
सज्जाद अली नायाणी ✍