ये आदमी एक नया फोटो अपलोड कर देता है...
केरल की राजनीति में हाल ही में संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों (2025) ने एक बार फिर साबित किया कि वोटर की नजर नेताओं की हर हरकत पर रहती है। कांग्रेस-नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने राज्य स्तर पर शानदार प्रदर्शन किया, अधिकांश पंचायतों, नगर पालिकाओं और चार कॉर्पोरेशनों (कोल्लम, कोच्चि, त्रिशूर और कन्नूर) पर कब्जा जमाया। लेकिन तिरुवनंतपुरम (त्रिवेंद्रम) कॉर्पोरेशन में अप्रत्याशित हार ने पार्टी के भीतर हलचल मचा दी। यहां भाजपा-नीत एनडीए ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की, 45 साल पुरानी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) की सत्ता को उखाड़ फेंका और पहली बार कॉर्पोरेशन पर नियंत्रण हासिल किया। कांग्रेस के दिग्गज नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने इस जीत को 'केरल की राजनीति में उल्लेखनीय बदलाव' बताया, लेकिन क्या यह उनकी अपनी प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है? आखिर क्यों थरूर के गढ़ में पार्टी को झटका लगा, जबकि पूरे केरल में UDF का जलवा रहा? इस हार के पीछे कई कारक हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा थरूर की प्राथमिकताओं पर हो रही है। चुनावी मौसम में जब कार्यकर्ताओं को मजबूत नेतृत्व की जरूरत थी, तब थरूर अंतरराष्ट्रीय मंचों और ग्लैमरस इवेंट्स में व्यस्त नजर आए। हाल ही में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा (दिसंबर 2025) के दौरान राष्ट्रपति भवन में आयोजित राजकीय भोज में थरूर की उपस्थिति ने कांग्रेस के भीतर तूफान खड़ा कर दिया।
इस भोज में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को आमंत्रित नहीं किया गया, जिसे कई लोगों ने कांग्रेस को 'साइडलाइन' करने का स्पष्ट संदेश माना। फिर भी थरूर ने निमंत्रण स्वीकार किया, वहां मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाईं और 'गर्मजोशी भरे माहौल' का जिक्र किया। पार्टी के कुछ नेताओं ने इसे 'आश्चर्यजनक' बताया, जबकि सोशल मीडिया पर ट्रोल्स ने उन्हें 'बीजेपी जॉइन करने' की सलाह दी। थरूर ने बाद में कहा कि वे विरोधी नेताओं को न बुलाए जाने पर 'खेद' जताते हैं, लेकिन क्या यह पर्याप्त था?
चुनावी रणनीति के लिहाज से देखें तो स्थानीय निकाय चुनावों में ग्राउंड लेवल का काम बेहद महत्वपूर्ण होता है। तिरुवनंतपुरम में भाजपा ने विकास, बुनियादी ढांचे और एंटी-इनकंबेंसी पर फोकस किया, जिसका नेतृत्व पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर जैसे नेताओं ने किया। वहीं, थरूर की अनुपस्थिति ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में निराशा पैदा की। पिछले कुछ महीनों में थरूर ने कई महत्वपूर्ण पार्टी मीटिंग्स छोड़ीं, जिनमें राहुल गांधी की अध्यक्षता वाली लोकसभा सांसदों की बैठक भी शामिल है। उन्होंने इसका कारण पूर्व निर्धारित कार्यक्रम या व्यक्तिगत वजहें बताईं, लेकिन यह पैटर्न सवाल खड़े करता है। क्या थरूर की वैश्विक छवि, डिप्लोमैटिक कमिटमेंट्स और 'हनीमून जैसे आकर्षक फोटोज' उनकी स्थानीय राजनीति पर भारी पड़ रहे हैं?
थरूर की राजनीतिक यात्रा हमेशा विवादों से घिरी रही है। कांग्रेस ने उन्हें चार बार सांसद बनाया, दो बार मंत्री पद दिया और वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज बनने का अवसर दिया। लेकिन हाल के महीनों में उनकी कुछ टिप्पणियां पार्टी लाइन से अलग नजर आईं। जैसे, नवंबर 2025 में रामनाथ गोयनका लेक्चर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की तारीफ करना – इसे 'सांस्कृतिक कॉल टू एक्शन' बताना और 'भावनात्मक मोड' में होने की सराहना करना। थरूर ने सर्दी-खांसी के बावजूद इवेंट अटेंड किया और मोदी की 'रचनात्मक अधीरता' और भारत की सांस्कृतिक गौरव पर जोर देने की प्रशंसा की। इससे कांग्रेस में नई दरार उभरी, पार्टी ने उन्हें 'सीसी' (कारण बताओ नोटिस) तक जारी किया। थरूर ने सफाई दी कि वे मोदी की नीतियों की नहीं, बल्कि भाषण की तारीफ कर रहे थे, लेकिन क्या यह बार-बार की प्रशंसा संयोग है?
केरल के वोटर, खासकर तिरुवनंतपुरम में, स्थानीय मुद्दों जैसे रोजगार, विकास और बुनियादी सुविधाओं पर फोकस करते हैं। भाजपा की जीत इसी का नतीजा है। थरूर ने चुनाव परिणामों पर UDF की राज्यव्यापी जीत की सराहना की और भाजपा की सफलता को 'ऐतिहासिक' बताया। लेकिन यह भी साफ है कि अगर थरूर ने अधिक समय ग्राउंड पर बिताया होता, तो शायद नतीजे अलग होते। चुनाव जमीन से लड़े जाते हैं, डिनर टेबल या कैमरों से नहीं।
यह घटनाक्रम थरूर के लिए सबक है। इतिहास उन नेताओं को याद रखता है जो अपने लोगों के साथ खड़े रहते हैं, न कि ग्लैमर की दुनिया में खो जाते हैं। केरल के युवा एक दिन पूछ सकते हैं कि थरूर कहां थे – मतदाताओं के साथ या डिनर गेस्ट की भूमिका में? अगर थरूर अपनी प्राथमिकताओं को संतुलित नहीं करते, तो 2026 के विधानसभा चुनावों में और बड़े झटके लग सकते हैं। राजनीति में वफादारी और जुड़ाव ही असली ताकत है, और थरूर जैसे करिश्माई नेता को इसे कभी भूलना नहीं चाहिए।
सज्जाद अली नायाणी✍