Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Wednesday, 31 December 2025

दो घटनाएं, दो संदेश: अपराध और इंसानियत के बीच की सच्चाई "बुर्के का भेष बनाकर अपराध, और मुसीबत में बुर्के से परे इंसानियत"

दो घटनाएं, दो संदेश: अपराध और इंसानियत के बीच की सच्चाई "बुर्के का भेष बनाकर अपराध, और मुसीबत में बुर्के से परे इंसानियत"
– जब समाज धर्म के चश्मे से देखता है, तो सच्चाई छिप जाती है 

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में हर दिन ऐसी घटनाएं होती हैं जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं—क्या खतरा किसी धर्म से है, या अपराधी की मानसिकता से? क्या इंसानियत धर्म की दीवारों से ऊपर उठ सकती है? दिसंबर 2025 की दो घटनाएं इस सवाल का सबसे मार्मिक जवाब देती हैं। एक तरफ राजस्थान के धौलपुर में एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म कर फरार हुए आरोपी का बुर्का पहनकर छिपना, और दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के बरेली में एक हिंदू महिला के घर में घुसे चोर को रोकने वाला एक मुस्लिम कबाड़ी वाला—जिसे 'मुल्ला जी' या 'चाचा' कहकर पुकारा जाता था। ये दो कहानियां एक ही समय में समाज के अंधेरे और उजाले दोनों को उजागर करती हैं। 

पहली घटना: धौलपुर का शर्मनाक कांड – अपराधी ने बुर्के का सहारा लिया

 15 दिसंबर 2025 को राजस्थान के धौलपुर जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र में पोखर कॉलोनी में एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ। आरोपी 50 वर्षीय रामभरोसे उर्फ राजेंद्र सिसोदिया, जो पहले राजस्थान सशस्त्र पुलिस (RAC) में तैनात था लेकिन पूर्व में POCSO एक्ट के तहत मामले के कारण बर्खास्त किया जा चुका था, ने पीड़िता और उसके भाई को रेलवे पुलिस में नौकरी दिलाने का झांसा देकर घर बुलाया। 

घटना के बाद आरोपी फरार हो गया। पुलिस ने कई जगहों—आगरा, लखनऊ, ग्वालियर—पर उसका सुराग पाया, लेकिन वह बार-बार भेष बदलता रहा। कभी ट्रैक्सूट पहनकर खुद को उच्च अधिकारी बताता, तो कभी अन्य तरीकों से छिपता। आखिरकार 30 दिसंबर 2025 को उत्तर प्रदेश के वृंदावन में उसे गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के समय वह बुर्का पहने हुए था, होठों पर लिपस्टिक लगाई हुई थी, और खुद को मुस्लिम महिला के रूप में छिपा रहा था। 

पुलिस ने उसे बुर्के में ही धौलपुर लाकर बाजारों में पैदल जुलूस निकाला—एक ऐसा दृश्य जो समाज को झकझोरने वाला था। आरोपी के खिलाफ पहले से 5 मामले दर्ज थे, ज्यादातर महिलाओं से जुड़े। यह घटना दिखाती है कि अपराधी किसी भी धर्म, जाति या वर्ग का हो सकता है। यहां बुर्का सिर्फ एक भेष था

—अपराध छिपाने का साधन। यह कोई 'धर्म' का मुद्दा नहीं, बल्कि एक क्रिमिनल की चालाकी थी। 

सवाल उठता है: क्या अपराधी के भेष बदलने से किसी समुदाय को दोषी ठहराना उचित है? निश्चित रूप से नहीं। अपराधी की पहचान उसका कर्म है, न कि वह जिस भेष में छिपा हो। 

 दूसरी घटना: बरेली का दिल छू लेने वाला किस्सा – इंसानियत ने जीत हासिल की 
बरेली की रहने वाली शालिनी अग्रवाल अरोरा (जो पशु प्रेमी और समाजसेवी के रूप में जानी जाती हैं) के घर में रात के समय चोर घुस आए। उनके वफादार कुत्ते 'कोको' ने चोर को पकड़ लिया, लेकिन चोर ने शालिनी जी और उनकी परिचारिका पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। दोनों महिलाएं चिल्ला-चिल्लाकर मदद मांगती रहीं, लेकिन हिंदू बहुल कॉलोनी में कोई बाहर नहीं निकला। पड़ोसी सिर्फ खिड़कियों से झांकते रहे—डर, संकोच या उदासीनता के कारण। 

तभी मुसीबत में देवदूत बनकर आए—एक मुस्लिम कबाड़ा (फेरी वाला) चाचा, जिन्हें शालिनी जी प्यार से 'मुल्ला जी' या 'चाचा' कहकर बुलाती थीं। ईंटें खाने, मुंह नोचवाने और जान जोखिम में डालकर भी उन्होंने चोर को नहीं छोड़ा। वे डटे रहे जब तक शालिनी जी के कर्मचारी नहीं पहुंचे। उन्होंने न सिर्फ शालिनी जी और परिचारिका की, बल्कि कुत्ते कोको की भी जान बचाई।

 यह घटना दिल को छू जाती है। मुसीबत के वक्त वे लोग साथ नहीं देते जिनसे उम्मीद होती है—पड़ोसी, सहायक, समाज। लेकिन इंसानियत के नाम पर एक अजनबी, जिसे सिर्फ धर्म के चश्मे से देखा जाता है, वहां खड़ा मिला। चाचा ने साबित किया कि नफरत के बावजूद इंसानियत पहले आती है। 

खतरा अपराध से है, न कि किसी धर्म से ये दो घटनाएं एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

 - एक तरफ अपराधी ने बुर्के का इस्तेमाल अपनी बदनीयती छिपाने के लिए किया—यह अपराध की गहराई दिखाता है, न कि किसी समुदाय की।

 - दूसरी तरफ एक साधारण मुस्लिम फेरीवाले ने अपनी जान जोखिम में डालकर एक हिंदू परिवार की रक्षा की—यह इंसानियत की जीत है। 

सवाल यह नहीं कि "हिंदू को मुस्लिम से खतरा है या मुस्लिम को हिंदू से"। सवाल यह है कि अपराधी हर धर्म में हो सकता है, और इंसानियत भी हर धर्म में पाई जाती है।

 जब हम अपराध को धर्म से जोड़ते हैं, तो असली अपराधी छिप जाता है। जब हम इंसानियत को देखते हैं, तो समाज मजबूत होता है। 

चाचा को दिल से सलाम। और राजेंद्र जैसे अपराधियों को सजा—क्योंकि कानून सबके लिए बराबर है। इंसानियत पहले। बाकी सब बाद में। 

सज्जाद अली नायाणी ✍🏼
फ्राइडे वर्ल्ड 31,12,2025