फ्राइडे वर्ल्ड 31,12,2025
यह वह दिन था जब ईरानी जनता ने अपनी अटूट एकता, धार्मिक जागरूकता और इस्लामी क्रांति के प्रति निष्ठा का ऐसा प्रदर्शन किया कि विदेशी शक्तियों की जटिल साजिशें चकनाचूर हो गईं। यह दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि ईरानी राष्ट्र की राजनीतिक परिपक्वता, सामाजिक चेतना और विलायत-ए-फ़कीह के सिद्धांत से गहरे जुड़ाव का जीवंत प्रतीक बन गया।
फितने 1388 का पृष्ठभूमि और विदेशी हस्तक्षेप 2009 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद, कुछ हारने वाले उम्मीदवारों ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाकर देश में अशांति फैलाई।
यह विरोध प्रदर्शन, जिसे "फितने 88" या "ग्रीन मूवमेंट" कहा जाता है, जल्द ही हिंसक रूप धारण कर लिया। विरोधियों ने न केवल राजनीतिक स्थिरता को चुनौती दी, बल्कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले कदम भी उठाए। तासुआ और आशूरा (5-6 दी 1388) के दौरान, कुछ तत्वों ने इमाम हुसैन (अ.) की याद में हतकर्म किया—खिमे को जलाया, ध्वज अपमानित किए और पवित्र स्थलों पर हमला किया। यह घटना ईरानी जनता के धार्मिक आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचाने वाली थी।
विदेशी शक्तियां, विशेष रूप से पश्चिमी खुफिया एजेंसियां और उनके आंतरिक सहयोगी, इस अशांति को भुनाकर इस्लामी गणराज्य को अस्थिर करना चाहते थे।
उनका उद्देश्य था—लोगों और नेतृत्व के बीच दरार डालना, विलायत-ए-फ़कीह को कमजोर करना और अंततः क्रांति को उखाड़ फेंकना। लेकिन वे इस बात से अनजान थे कि ईरानी जनता की बसीरत (दूरदर्शिता) और धार्मिक जज्बा इतना मजबूत है कि कोई भी साजिश उसे हिला नहीं सकती।
9 दी: जनता का स्वाभाविक और भव्य उभार आशूरा की हतकर्म के मात्र तीन दिन बाद, 9 दी को ईरानी जनता ने पूरे देश में लाखों-करोड़ों की संख्या में सड़कों पर उतरकर जवाब दिया। तेहरान से लेकर तबरेज, इस्फहान, शीराज, मशहद और क़ुम तक—हर शहर में विशाल रैलियां निकलीं।
यह प्रदर्शन सरकारी तंत्र द्वारा नहीं, बल्कि जनता की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। लोग बिना किसी औपचारिक आह्वान के मैदान में उतरे, क्योंकि उनका दिल इमाम हुसैन (अ.) की याद और विलायत-ए-फ़कीह के प्रति प्रेम से भरा था। रैलियों में नारे गूंजे:
- "लश्कर-ए-हुसैनी, तैयार है!" - "मौत बार फितने-गर!"
- "हम विलायत के साथ हैं, दुश्मनों के मुंह पर तमाचा!" यह उपस्थिति केवल भीड़ का प्रदर्शन नहीं थी
—यह राष्ट्रीय एकता, धार्मिक गरिमा और क्रांतिकारी मूल्यों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण थी। लाखों लोग एक सुर में घोषित कर रहे थे कि ईरान कभी भी विदेशी साजिशों का शिकार नहीं बनेगा।
इस्लामी क्रांति की मजबूती का आधार 9 दी ने साबित कर दिया कि इस्लामी क्रांति का सबसे बड़ा सहारा जनता की बसीरत और विलायत-निष्ठा है।
जब दुश्मन ने सोचा कि फितने से लोग और नेतृत्व अलग हो जाएंगे, तब ईरानी जनता ने एकजुट होकर जवाब दिया। यह दिन निर्णायक मोड़ पर जनता की समयबोध और दुश्मन की चालों को पहचानने की क्षमता का प्रमाण था।
नेतृत्व और जनता के बीच यह नई बैअत (वफादारी) क्रांति की जीवित आत्मा का स्पष्ट संकेत थी। इसी जन-समर्थन के बल पर इस्लामी गणराज्य ने हर दबाव, प्रतिबंध और साजिश का सामना किया और मजबूती से आगे बढ़ता रहा। 9 दी ने दुश्मनों को साफ संदेश दिया: ईरानी जनता कभी भी अपनी आस्था, स्वतंत्रता और क्रांति से समझौता नहीं करेगी।
स्थायी सबक और भविष्य की राह 9 दी केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक स्थायी रणनीतिक सच्चाई है।
यह ईरानी राष्ट्र की धार्मिक आस्था, राजनीतिक सूझ-बूझ और सामाजिक उत्तरदायित्व का संगम है। यह दिन सिखाता है कि जब भी देश की सुरक्षा, एकता या स्वतंत्रता पर खतरा मंडराएगा, ईरानी जनता जागरूकता और सूझ-बूझ के साथ मैदान में उतरेगी।
यह क्रांति के मित्रों के लिए प्रेरणा और शत्रुओं के लिए चेतावनी है।
9 दी ने इतिहास को तोड़-मरोड़ने, भुलाने या लापरवाही से बचाया। आज भी, जब क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियां बढ़ रही हैं, 9 दी की भावना ईरान को हर साजिश के सामने अडिग रखती है। ईरानी जनता ने 9 दी को अमर बना दिया
—एक ऐसा तमाचा जो विदेशी साजिशों के चेहरे पर आज भी गूंजता है। यह दिन सदा याद दिलाता रहेगा: जब जनता एकजुट होती है, तो कोई ताकत उसे हरा नहीं सकती।
सज्जाद अली नायाणी✍🏼
फ्राइडे वर्ल्ड 31,12,2025