नई दिल्ली, 10 दिसंबर 2025। संसद में राहुल गांधी के भाषण के बाद सोशल मीडिया पर तूफान आ गया। सुबह से लोग चिल्ला रहे हैं – “राहुल गांधी को हिंदी में बोलना चाहिए था!” लेकिन ज़रा रुकिए, बात सिर्फ भाषा की नहीं है। ये है रणनीति की, ऑडियंस की और एक वैश्विक संदेश की। आइए समझते हैं कि क्यों राहुल का अंग्रेज़ी में बोलना न सिर्फ सही था, बल्कि एक स्मार्ट मूव था जो दिल्ली से वॉशिंगटन तक गूंजा।
हर भाषण की अपनी ऑडियंस होती है संसद में भाषण कोई साधारण बात नहीं। ये एक प्लेटफॉर्म है जहाँ शब्द सीधे दिलों तक पहुँचते हैं। कल गौरव गोगोई और दीपेंद्र हुड्डा ने धारदार हिंदी में बोला – क्योंकि उनका टारगेट राजनीतिक हलके थे। वो शब्द थे जो स्थानीय मुद्दों पर चोट करते थे, जनता की भाषा में। प्रियंका गांधी वाड्रा का भाषण? वो था भावनाओं का तूफान – इतिहास, देशभक्ति और जनता के ज़मीर पर सीधा वार। ये हिंदी में था, क्योंकि ये दिलों को छूने वाला था, आम आदमी से जुड़ने वाला।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने तो बीजेपी की कमजोर नस पर ही हाथ रखा – वो चोट जहाँ सबसे ज़्यादा दर्द होता है। उनकी हिंदी ने संसद को हिला दिया।
लेकिन राहुल गांधी? वो विपक्ष के नेता हैं। उनका रोल सिर्फ संसद तक सीमित नहीं। जब वो चुनाव सुधार, लोकतंत्र की रक्षा और संस्थानों की अखंडता पर बोलते हैं, तो ये आवाज़ सिर्फ भारत नहीं सुनता – पूरी दुनिया सुनती है।
अंग्रेज़ी: युवा, मीडिया और वैश्विक भारत की भाषा भारत विविधताओं का देश है। दक्षिण से पूर्वोत्तर तक, महाराष्ट्र से मेट्रो शहरों तक
– अंग्रेज़ी युवाओं की भाषा है। ये मीडिया की, डिप्लोमैट्स की और शहरी भारत की जुबान है। राहुल का भाषण सिर्फ संसद के लिए नहीं था। ये था एक रणनीतिक संदेश जो पहुँचा:
✔️ टॉप 20 शहरों के युवाओं तक – जहाँ अंग्रेज़ी रोज़मर्रा की बात है।
✔️ अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक – CNN, BBC, New York Times ने इसे रीयल टाइम में कवर किया।
✔️ विदेशी मिशनों तक – दूतावासों में ये चर्चा का विषय बना।
✔️ प्रवासी भारतीयों तक – अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले NRI इसे समझकर गर्व महसूस कर रहे हैं।
जो लोग “हिंदी में बोलते!” चिल्ला रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए – ये कोई साधारण भाषण नहीं था। ये था एक वैश्विक एड्रेस। एक लोकतंत्र की मास्टरक्लास जो भारत की छवि को मजबूत करता है। हिंदी में बोलकर वो शायद स्थानीय स्तर पर ज़्यादा तालियाँ बटोरते, लेकिन अंग्रेज़ी ने इसे ग्लोबल बना दिया।
दिल्ली से डीसी तक गूंजा संदेश राहुल गांधी का भाषण महज शब्दों का पुलिंदा नहीं था। ये था भारत के लोकतंत्र की आवाज़, जो चुनावी सुधारों की मांग कर रही थी। दुनिया भर में लोकतंत्र पर बहस चल रही है – अमेरिका से यूरोप तक। ऐसे में राहुल की अंग्रेज़ी ने भारत को उस बहस का केंद्र बना दिया। वॉशिंगटन डीसी में बैठे थिंक टैंक इसे एनालाइज कर रहे हैं, क्योंकि ये सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि एक वैश्विक सबक है।
हिंदी प्रेमी भूल जाते हैं कि भारत अब ग्लोबल पावर है। हमारे नेता सिर्फ देश नहीं, दुनिया से बात करते हैं। अगर नेहरू जी अंग्रेज़ी में बोलकर दुनिया जीत सकते थे, तो राहुल क्यों नहीं? ये भाषा का सवाल नहीं, प्रभाव का है।
अंत में: समझिए रणनीति को जो चिल्ला रहे हैं, वो शायद ये नहीं देखते कि राहुल का भाषण संसद की दीवारों से बाहर निकलकर दुनिया भर में फैल गया। ये था एक स्मार्ट चाल – जहाँ हिंदी दिल छूती है, वहाँ अंग्रेज़ी दिमाग जीतती है। अगली बार जब कोई भाषा पर बहस करे, तो याद रखिए: सही भाषा वो है जो सही ऑडियंस तक पहुँचे।
राहुल ने यही किया – और जीत लिया!
सज्जाद अली नायाणी✍️