आज एयरपोर्ट पर दो घंटे की देरी हुई तो पूरा सोशल मीडिया रो पड़ा।
“अत्याचार है! सिस्टम फेल है! हमारे अधिकार छीने जा रहे हैं!” कैमरे ऑन, लाइव शुरू, आंसू तैयार।
पांच साल पहले लॉकडाउन में लाखों मज़दूर सड़कों पर थे। नंगे पाँव, भूखे पेट, बच्चे कंधों पर, बीवी का हाथ थामे। सैकड़ों किलोमीटर चलते रहे।
बसें रुक गईं, ट्रेनें बंद हो गईं, पानी तक नहीं था। कई बच्चे रास्ते में सो गए — हमेशा के लिए।
कई माँओं के आँचल सूख गए। रेल की पटरी पर छोटी-सी लाश मिली थी एक दिन — लोगों ने फोटो खींची, स्टोरी लगाई और थाली बजाने चले गए।
उसी शाम बालकनी में खड़े होकर लोग ताली बजा रहे थे। “हम वॉरियर्स हैं, हम कोरोना हरा रहे हैं!”
फ्रीज़ भरा था, नेटफ्लिक्स चल रहा था, AC पूरा ठंडा था।
दीया जलाया, मोमबत्ती जलाई, सेल्फी ली — देश बच गया।
मज़दूर का नाम कोई नहीं लेता था। उसके बच्चों की भूख कोई प्राइम टाइम नहीं थी। उसकी माँ की चीख कोई वायरल नहीं हुई।
आज फ्लाइट कैंसिल हुई तो वही लोग चिल्ला रहे हैं। “हम इंसान हैं! हमें इज़्ज़त से जीने दो!” अरे भाई, वो मज़दूर भी इंसान था। उसकी बच्ची भी तुम्हारी बच्ची जैसी थी। उसकी माँ भी किसी की माँ थी। पर उसका दर्द तुम्हारे AC के दायरे में नहीं घुसा था ना, इसलिए वो दर्द नहीं था।
वो तो बस “बैकग्राउंड नॉइज़” था। जब तक दर्द तुम्हारे विंडो सीट तक नहीं पहुँचता, तब तक वो दर्द नहीं, सिर्फ ख़बर है।
जब तक भूख तुम्हारे फ्रीज़ तक नहीं पहुँचती, तब तक वो भूख नहीं, सिर्फ स्टेटिस्टिक है। देशभक्ति दो तरह की होती है एक जो बालकनी में थाली बजाती है, दूसरी जो सड़क पर मज़दूर के साथ पैदल चलती है। एक जो फ्लाइट लेट होने पर रोती है, दूसरी जो बच्चे की लाश पटरी पर देखकर भी चुप रहती है।
तुम बताओ, तुम्हारी देशभक्ति किस तरह की है? जब तक हम मज़दूर के पाँव के छालों को अपना दर्द नहीं मानेंगे, तब तक हमारा गुस्सा सिर्फ़ अपना आराम खोने का गुस्सा है। और हमारी देशभक्ति? बस एक महँगा शौक।
मज़दूर अभी भी चल रहा है।
तुम्हारी फ्लाइट पहुँच जाएगी। उसका घर शायद कभी न पहुँचे।
फिर भी थाली तैयार रखना। कभी न कभी तो बजानी ही पड़ेगी।
सज्जाद अली नायाणी✍️