ब्रसेल्स। यूक्रेन को लगातार हथियार, गोला-बारूद और आर्थिक मदद पहुंचाने के लिए यूरोपीय संघ दिन-रात कोशिश कर रहा है, लेकिन अंदरूनी दरारें और कानूनी पेचीदगियां उसे हर कदम पर रोक रही हैं। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लेयेन के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है – पैसा है, इच्छा है, लेकिन सहमति नहीं!
ब्रिटेन ने ठुकराया 150 अरब यूरो का सैन्य फंड यूक्रेन के सबसे बड़े समर्थक ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ के महत्वाकांक्षी सैन्य फंड ‘SAFE’ में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया। 150 अरब यूरो की इस योजना में लंदन की भागीदारी लगभग तय मानी जा रही थी, पर ब्रेक्सिट के बाद के तनाव ने फिर सिर उठाया। नतीजा – बातचीत विफल, यूरोपीय एकजुटता को झटका और ब्रिटिश रक्षा उद्योग को भी नुकसान।
रूसी संपत्ति पर बेल्जियम का कड़ा विरोध बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेयर ने रूसी केंद्रीय बैंक की 140 अरब यूरो की जमा संपत्ति से यूक्रेन को ऋण देने की योजना पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका तर्क: अगर कभी रूस को ये संपत्तियां वापस करनी पड़ीं तो पूरा बोझ यूरोपीय करदाताओं पर आएगा। यूरोक्लियर (बेल्जियम में स्थित) में जमा ये संपत्तियां यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी वित्तीय ताकत हो सकती थीं, पर बेल्जियम की हरी झंडी के बिना सब ठप है।
जर्मनी की योजना भी फेल जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ट्स महीनों से रूसी संपत्ति के ब्याज से यूक्रेन को मदद देने की योजना लेकर घूम रहे हैं, लेकिन हालिया यूरोपीय शिखर सम्मेलन में बेल्जियम के विरोध ने सारी कोशिश पर पानी फेर दिया।
अंदरूनी कलह और जनता का गुस्सा - कुछ देश अनुदान देना चाहते हैं ताकि यूक्रेन पर कर्ज का बोझ न पड़े। -
कुछ देश सिर्फ ऋण या बॉन्ड के जरिए पैसा देना चाहते हैं। -
मुद्रास्फीति, बजट घाटा और घरेलू जरूरतों से जूझते देशों में जनता पूछ रही है – “हमारी अपनी जेब पहले या यूक्रेन?”
अमेरिका पीछे हटा, यूरोप पर दबाव दोगुना ट्रंप प्रशासन के आने के बाद अमेरिकी मदद में कटौती की आशंका से यूरोप पर सारा बोझ आ गया है। अब यूक्रेन की अर्थव्यवस्था और युद्ध क्षमता बचाने की जिम्मेदारी अकेले यूरोपीय संघ की है – लेकिन फैसले की गति कछुए जैसी। यूक्रेन को हर महीने अरबों यूरो चाहिए, पर यूरोपीय संघ की नौकरशाही और सदस्य देशों की आपसी खींचतान के कारण पैसा समय पर नहीं पहुंच पा रहा।
नतीजा: यूरोपीय एकता की परीक्षा का सबसे कठिन दौर चल रहा है। अगर जल्दी सहमति नहीं बनी तो रूस के सामने यूक्रेन अकेला पड़ सकता है – और यूरोपीय संघ की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे।
सज्जाद अली नायाणी✍️