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Thursday, 18 December 2025

हिजाब विवाद: एक डॉक्टर की आहत गरिमा और टूटा सपना बिहार में महिलाओं की धार्मिक स्वतंत्रता और सम्मान पर उठे गंभीर सवाल

हिजाब विवाद: एक डॉक्टर की आहत गरिमा और टूटा सपना बिहार में महिलाओं की धार्मिक स्वतंत्रता और सम्मान पर उठे गंभीर सवाल
पटना, 19 दिसंबर 2025: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा 15 दिसंबर को एक सरकारी कार्यक्रम में नवनियुक्त आयुष डॉक्टर नुसरत परवीन का हिजाब (नकाब) सार्वजनिक रूप से खींचे जाने की घटना ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया है। यह घटना मुख्यमंत्री सचिवालय के 'संवाद' हॉल में आयुष डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र वितरण के दौरान हुई, जहां नीतीश कुमार ने नुसरत को पत्र सौंपते हुए उनके चेहरे पर पड़े नकाब की ओर इशारा किया और खुद उसे नीचे खींच दिया। वीडियो में साफ दिखता है कि नीतीश कुमार ने नाराजगी जताते हुए कहा, "ये क्या है?" और फिर नकाब हटा दिया। 

इस घटना से गहरी आहत नुसरत परवीन ने अगले ही दिन बिहार छोड़ दिया और कोलकाता स्थित अपने परिवार के पास लौट गईं। पढ़ाई में अव्वल रहने वाली नुसरत का सपना डॉक्टर बनकर समाज सेवा करना था। वे यूनानी चिकित्सा की डॉक्टर हैं और बिहार सरकार में नियुक्ति मिलने पर बेहद खुश थीं। लेकिन इस सार्वजनिक अपमान ने उन्हें इतना सदमा पहुंचाया कि वे अब सरकारी नौकरी जॉइन करने के मूड में नहीं हैं। 

नुसरत के भाई, जो कोलकाता में एक सरकारी लॉ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं, ने बताया कि घटना के बाद नुसरत फोन पर रोते हुए सब कुछ बताया। वे मानसिक ट्रॉमा में हैं और परिवार बार-बार समझाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन नुसरत अभी बिहार लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हैं। नुसरत ने खुद कहा, "मैं यह नहीं कह रही कि मुख्यमंत्री ने जानबूझकर ऐसा किया, लेकिन वहां इतने लोग थे, कुछ हंस भी रहे थे। एक लड़की के लिए यह बेहद अपमानजनक था। मैं स्कूल से कॉलेज तक हिजाब पहनकर पढ़ी हूं, हर जगह हिजाब में गई हूं।" 

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि महिलाओं की व्यक्तिगत आस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और गरिमा का है। संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को अपनी धार्मिक प्रथाओं का पालन करने का अधिकार है। हिजाब या नकाब पहनना मुस्लिम महिलाओं की व्यक्तिगत पसंद और आस्था का प्रतीक है। सार्वजनिक मंच पर किसी महिला के पहनावे पर हाथ डालना न केवल उनकी निजता का उल्लंघन है, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा की भावना भी पैदा करता है।

 विपक्षी दलों ने इसकी कड़ी निंदा की है। कांग्रेस और राजद ने नीतीश कुमार से इस्तीफे की मांग की, जबकि एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे महिला की गरिमा पर हमला बताया। जावेद अख्तर और ओमार अब्दुल्लाह जैसे सार्वजनिक हस्तियों ने भी बिना शर्त माफी की मांग की। दूसरी ओर, कुछ मंत्री इसे "पितातुल्य स्नेह" बता रहे हैं, जो और विवाद पैदा कर रहा है। 

यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है: क्या राज्य के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति ञकर सकता है? अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल कितना महत्वपूर्ण है? सम्मान, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकार कभी समझौते का विषय नहीं हो सकते।

 नुसरत जैसे मेधावी युवाओं का सपना टूटना न केवल व्यक्तिगत क्षति है, बल्कि समाज के लिए भी चेतावनी। उम्मीद है कि यह घटना बड़े सबक देगी और महिलाओं की गरिमा को प्राथमिकता मिलेगी।