कब्ज़े वाले पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) में फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ़ चल रही हिंसा और विस्थापन की लहर ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चिंतित कर दिया है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2025 में शुरू हुई इज़राइली सैन्य कार्रवाई "ऑपरेशन आयरन वॉल" के तहत उत्तरी रिफ्यूजी कैंपों – जेनिन, तुलकरम, नूर शम्स और अल-फारा – से हजारों फ़िलिस्तीनी परिवारों को जबरन निकाला गया। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी UNRWA के अनुसार, इस वर्ष लगभग 40,000 फ़िलिस्तीनी विस्थापित हुए हैं, जो 1967 के बाद सबसे बड़ा विस्थापन है। ह्यूमन राइट्स वॉच ने इसे युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ़ अपराध करार दिया है।
फ़िलिस्तीनी रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई अस्थायी सैन्य अभियान नहीं, बल्कि जनसांख्यिकी संरचना बदलने की सुनियोजित नीति है। पिछले वर्षों में इज़राइली कब्ज़ाधारियों ने गैरकानूनी बस्तियों का विस्तार किया, बजट बढ़ाया और अब सड़क नेटवर्क के ज़रिए पश्चिमी तट को अलग-अलग हिस्सों में बाँट रहे हैं। प्रमुख सड़कें जैसे रूट 90 (जॉर्डन सीमा के साथ), रूट 60 (उत्तर-दक्षिण को अलग करने वाली) और रूट 1 (पूर्वी हिस्से को यरुशलम से तेल अवीव तक जोड़ने वाली) फ़िलिस्तीनियों की आवाजाही को नियंत्रित करती हैं। इनसे पश्चिमी तट छोटे-छोटे अलग-थलग "द्वीपों" में बदल गया है, जहाँ फ़िलिस्तीनियों की पहुंच सीमित हो गई है।
इस नीति का उद्देश्य हिंसा, विध्वंस और प्रतिबंधों के ज़रिए फ़िलिस्तीनी आबादी को कम करना है। UNRWA ने चेतावनी दी है कि बार-बार के अभियानों ने इन कैंपों को रहने लायक नहीं छोड़ा, जिससे निवासी चक्रीय विस्थापन के शिकार हो रहे हैं। हालिया डेमोलिशन ऑर्डर्स से नूर शम्स कैंप में सैकड़ों परिवार प्रभावित होंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह 1948 और 1967 के नकबा जैसे खुले विस्थापन से अलग है – अब यह "शांतिपूर्ण जबरन निष्कासन" है, बिना आधिकारिक घोषणा के, धीरे-धीरे फ़िलिस्तीनियों को जॉर्डन की ओर धकेलने की रणनीति। खास तौर पर उन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है जहाँ फ़िलिस्तीनी जॉर्डनियन पासपोर्ट धारक हैं।
इज़राइली सरकार ने 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर बस्तियाँ बढ़ाईं – 19 नई बस्तियाँ मंजूर कीं, हजारों यूनिट्स के प्लान पास किए। यह सब फ़िलिस्तीनी राज्य की संभावना को खत्म करने के लिए है। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बस्तियाँ अवैध हैं, लेकिन इज़राइली मंत्री खुलेआम कहते हैं कि यह फ़िलिस्तीनी राज्य को रोकने का तरीका है।
यह विस्थापन सिर्फ घरों का नुकसान नहीं, बल्कि फ़िलिस्तीनी पहचान और अधिकारों पर हमला है। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठन इसे जातीय सफ़ाई की संज्ञा दे रहे हैं। फ़िलिस्तीनियों को अपनी ज़मीन से बेदखल कर नई भौगोलिक वास्तविकता थोपी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील है कि इस नीति को रोका जाए, वरना पश्चिमी तट में फ़िलिस्तीनी अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। सहिष्णुता और न्याय की ज़रूरत है, ताकि शांति की कोई उम्मीद बाकी रहे।
सज्जाद अली नायाणी✍🏼