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19 अगस्त 1953 को ईरान के इतिहास में एक ऐसा दिन था, जिसने न सिर्फ़ एक लोकतांत्रिक सरकार को खत्म किया, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। सिर्फ़ चार दिनों के भीतर अमेरिका की CIA और ब्रिटेन की MI6 ने मिलकर निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग की सरकार को तख्तापलट कर दिया। इस ऑपरेशन का नाम था Operation Ajax (अमेरिका) और Operation Boot (ब्रिटेन)। लेकिन सवाल यह है – इस पूरी साजिश में ईरान के शाह **मोहम्मद रजा पहलवी** की क्या भूमिका थी? क्या वे सिर्फ़ कठपुतली थे या सक्रिय साजिशकर्ता?
पृष्ठभूमि: तेल की भूख और राष्ट्रवाद का टकराव 1951 में मोहम्मद मोसद्देग ईरान के प्रधानमंत्री बने। वे एक राष्ट्रवादी नेता थे, जिन्होंने ब्रिटिश कंपनी एंग्लो-ईरानी ऑयल कंपनी (बाद में BP) के तहत ईरान के विशाल तेल भंडारों के राष्ट्रीयकरण का ऐतिहासिक फैसला लिया। दशकों से ब्रिटेन ईरान के तेल से अरबों कमाता था, लेकिन ईरान को महज नाममात्र का हिस्सा मिलता था। मोसद्देग का यह कदम ब्रिटेन के लिए बड़ा झटका था।
ब्रिटेन ने आर्थिक बहिष्कार शुरू किया, लेकिन मोसद्देग नहीं झुके। डर था कि ईरान सोवियत संघ की ओर झुक सकता है (हालांकि मोसद्देग खुद कम्युनिस्ट विरोधी थे)।
ब्रिटेन अकेले कुछ नहीं कर पाया, तो उसने अमेरिका को साथ मिलाया। 1953 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने हामी भरी। CIA के केर्मिट रूजवेल्ट (राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट के पोते) को ऑपरेशन सौंपा गया।
चार दिनों की सनसनीखेज साजिश: 15 से 19 अगस्त 1953
- 15 अगस्त: पहला प्रयास। शाह ने फरमान जारी कर मोसद्देग को बर्खास्त करने की कोशिश की। लेकिन मोसद्देग के समर्थकों ने विरोध किया, शाह डरकर रोम भाग गए। पहला प्रयास नाकाम।
- 16-18 अगस्त: CIA और MI6 ने लाखों डॉलर खर्च कर भाड़े के गुंडे, पत्रकारों और सैनिकों को खरीदा। फर्जी कम्युनिस्ट प्रदर्शन करवाए, ताकि मोसद्देग कमजोर दिखें। प्रचार किया गया कि मोसद्देग सोवियत एजेंट हैं।
- 19 अगस्त: निर्णायक दिन। सड़कों पर बड़े पैमाने पर प्रो-शाह प्रदर्शन हुए (जिन्हें CIA ने फंडेड किया)। सेना ने मोसद्देग के घर पर हमला किया। लगभग 300 लोग मारे गए। मोसद्देग गिरफ्तार हो गए। जनरल फजलोल्लाह ज़ाहेदी नए प्रधानमंत्री बने। शाह रोम से लौटकर दोबारा सत्ता संभाले।
यह ऑपरेशन इतना तेज़ था कि दुनिया हैरान रह गई। सिर्फ़ चार दिनों में एक लोकतांत्रिक सरकार खत्म!
शाह मोहम्मद रजा पहलवी की भूमिका: कठपुतली या साजिशकर्ता? शाह इस पूरे खेल के केंद्र में थे, लेकिन उनकी भूमिका जटिल थी।
- वे युवा, अनिश्चित और डरपोक थे। शुरू में उन्होंने फरमान पर हस्ताक्षर करने से हिचकिचाहट दिखाई, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर मोसद्देग के समर्थक जीत गए तो उनका तख्ता पलट जाएगा।
- CIA ने उन्हें दबाव डाला, धमकाया और आश्वासन दिया कि ऑपरेशन सफल होगा। शाह ने आखिरकार हस्ताक्षर किए।
- वे जानते थे कि मोसद्देग उनकी शक्तियों को सीमित कर रहे थे। मोसद्देग शाह को महज संवैधानिक राजा बनाना चाहते थे, जबकि शाह पूर्ण सत्ता चाहते थे।
- सफलता के बाद शाह ने अमेरिका को धन्यवाद दिया और कहा कि "ईरानी जनता मुझे चाहती है"। लेकिन असल में यह CIA की साजिश थी, जिसमें शाह सहमत हुए।
शाह ने इस तख्तापलट से अपनी सत्ता मजबूत की। अगले 26 साल तक वे सत्ता में रहे, अमेरिकी हथियारों और आर्थिक मदद से। लेकिन यह कदम ईरान में अमेरिका-विरोध की जड़ बना। 1979 की इस्लामिक क्रांति में इसी 1953 के तख्तापलट को याद कर शाह को सत्ता से बेदखल किया गया।
दीर्घकालिक परिणाम: आज तक की दुश्मनी की जड़ इस तख्तापलट ने ईरान में लोकतंत्र को कुचल दिया। मोसद्देग को तीन साल जेल और फिर उम्र भर नजरबंद रखा गया। शाह की क्रूर सत्ता ने धार्मिक कट्टरपंथियों और वामपंथियों को जन्म दिया। 2013 में CIA ने आधिकारिक तौर पर अपनी भूमिका स्वीकार की।
आज जब ईरान-अमेरिका तनाव की बात होती है, तो 1953 का यह घाव सबसे पहले याद आता है। यह घटना साबित करती है कि तेल की भूख ने कैसे एक लोकतंत्र को कुचल दिया और क्षेत्रीय अस्थिरता की नींव रखी।
यह घटना इतिहास का एक काला अध्याय है, जो बताती है कि कैसे महाशक्तियां अपने हितों के लिए दूसरों की सरकारें गिरा देती हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 18,2026