Friday World 9 जनवरी 2026
बहुपक्षवाद पर गहरा प्रहार। 7 जनवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक राष्ट्रपति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत संयुक्त राज्य अमेरिका **66 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों**, एजेंसियों और निकायों से तत्काल सदस्यता वापस लेगा। यह फैसला कार्यकारी आदेश 14199 (फरवरी 2025 में जारी) पर आधारित है, जो राज्य विभाग की व्यापक समीक्षा के बाद लिया गया। इस समीक्षा में इन संस्थाओं को "बेकार, अक्षम, हानिकारक या अमेरिकी हितों के विरुद्ध" घोषित किया गया। सूची में 31 संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध निकाय और 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र संगठन शामिल हैं, जो जलवायु परिवर्तन, लैंगिक समानता, प्रवासन, श्रम आदि क्षेत्रों में कार्य करते हैं।
→ व्हाइट हाउस का तर्क: "अमेरिका फर्स्ट" की नीति का क्रियान्वयन।** व्हाइट हाउस के फैक्ट शीट और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के अनुसार, ये संस्थाएं अब अमेरिकी प्राथमिकताओं की सेवा नहीं करतीं। इन पर "प्रोग्रेसिव विचारधारा", "वोक" एजेंडे, दोहराव वाले मिशन, खराब प्रबंधन या अमेरिकी संप्रभुता के विरोधी विदेशी ताकतों के प्रभाव का आरोप है। प्रशासन का कहना है कि अमेरिकी करदाताओं के अरबों डॉलर इन निकायों पर बर्बाद हुए हैं, जबकि कोई ठोस लाभ नहीं मिला। रुबियो ने कहा: "अमेरिकी जनता के पैसे विदेशी हितों पर खर्च करने के दिन अब खत्म हो गए हैं।"
प्रमुख लक्ष्य: जलवायु और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े बड़े निकाय।** सबसे महत्वपूर्ण वापसी संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) से है — वैश्विक जलवायु वार्ताओं का आधारभूत संधि — साथ ही **जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (IPCC), जो दुनिया का प्रमुख वैज्ञानिक निकाय है। अन्य उल्लेखनीय निकासी में UN Women, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA), UN Water और विभिन्न पर्यावरण, विकास एवं मानवाधिकार पैनल शामिल हैं। इस कदम से अमेरिका जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और लैंगिक समानता जैसे मूल मुद्दों पर वैश्विक तंत्रों से बाहर हो गया है।
→ पहले के फैसलों की अगली कड़ी। यह ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" विदेश नीति का अब तक का सबसे बड़ा पीछे हटना है। इससे पहले पेरिस समझौते से दोबारा बाहर होना (27 जनवरी 2026 से प्रभावी), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से निकलना, UNRWA को फंडिंग रोकना, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद** और UNESCO से बाहर होना जैसी कार्रवाइयां हो चुकी हैं। वर्तमान फैसला चयनात्मक अलगाव की इस नीति को और मजबूत करता है, जहां अमेरिका केवल अपने एजेंडे से मेल खाने वाले निकायों का समर्थन करता है।
घरेलू लाभ बनाम अंतर्राष्ट्रीय विरोध। देश के अंदर इस फैसले को वित्तीय जिम्मेदारी और राष्ट्रवाद की जीत बताया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से फंड हटाकर इंफ्रास्ट्रक्चर, सीमा सुरक्षा और सैन्य तैयारियों जैसी घरेलू प्राथमिकताओं पर खर्च बढ़ाने की योजना है — जो ट्रंप के राजनीतिक आधार को मजबूत करती है। हालांकि अमेरिकी आलोचक दीर्घकालिक अलगाव और प्रभाव में कमी की चेतावनी दे रहे हैं।
वैश्विक परिणाम: एक खालीपन जो भरने को तैयार। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस कदम ने भारी आक्रोश पैदा किया है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु प्रमुख **साइमन स्टील** ने UNFCCC से निकासी को "अमेरिका के लिए भारी आत्मघाती कदम" बताया, जो बढ़ते जलवायु संकट के बीच अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाएगा। पर्यावरण समूह इसे प्रदूषकों के लिए तोहफा बता रहे हैं, जबकि सहयोगी देश वाशिंगटन के जलवायु, स्वास्थ्य और मानवाधिकार जैसे साझा चुनौतियों पर नेतृत्व छोड़ने से चिंतित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे एक शक्ति शून्य पैदा होगा, जिसे चीन जैसी प्रतिद्वंद्वी ताकतें भर सकती हैं, जिससे अमेरिका की विश्वसनीयता और वैश्विक मानकों को आकार देने की क्षमता कमजोर होगी।
→ विश्वदृष्टि में मूलभूत बदलाव। ट्रंप का यह आदेश महज प्रशासनिक कदम नहीं है — यह बहुपक्षवाद के प्रति गहरी अस्वीकृति और एकतरफा संप्रभुता की ओर झुकाव है। अल्पकाल में इससे वित्तीय बचत और राष्ट्रवादी अपील बढ़ेगी, लेकिन दीर्घकाल में अमेरिका का अधिक अलगाव, वैश्विक प्रभाव में कमी और उसके भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए खुले मैदान का खतरा है। दुनिया देख रही है कि अमेरिका उन संस्थाओं से पीछे हट रहा है, जिन्हें उसने स्वयं बनाने में मदद की थी — जिससे एक परस्पर जुड़े युग में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के भविष्य पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 9 जनवरी 2026