Friday World January 7,2026
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले कुछ दिनों में जो घटनाक्रम सामने आया है, वह सत्ता की राजनीति की असलियत को बेनकाब कर रहा है। जहां एक तरफ हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के नारे बुलंद किए जाते हैं, वहीं स्थानीय स्तर पर सत्ता हासिल करने के लिए विरोधी दलों से हाथ मिलाना आम हो गया है। अकोला जिले के अकोट नगर परिषद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के साथ अप्रत्यक्ष समर्थन या गठजोड़ का मामला सामने आया है। यह घटना न सिर्फ स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी, बल्कि पूरे राज्य में बड़े सवाल खड़े कर रही है।
चुनाव परिणाम और बहुमत का गणित अकोट नगर परिषद (कुल 35 सदस्यीय) में हाल ही में हुए चुनावों में 33 सीटों पर मतदान हुआ (2 सीटें लंबित)। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन उसे महज 11 सीटें मिलीं। मेयर पद पर भाजपा की माया धुले ने जीत दर्ज की, लेकिन स्पष्ट बहुमत (करीब 17-18 सीटों) न होने से सत्ता बनाना चुनौतीपूर्ण था।
सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा ने 'अकोट विकास मंच' नाम से एक नया मोर्चा बनाया। इस मोर्चे में शामिल या समर्थन देने वाले:
- AIMIM: 5 सीटें (दूसरी सबसे बड़ी पार्टी)
- प्रहार जनशक्ति पार्टी (बच्चू कडू): 3 सीटें
- शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट): 2 सीटें
- अजीत पवार की NCP: 2 सीटें
- शरद पवार की NCP: 1 सीट
- शिवसेना (शिंदे गुट): 1 सीट
इससे गठबंधन की ताकत 25 सदस्यों तक पहुंच गई, जबकि कांग्रेस (6 सीटें) और वंचित बहुजन अघाड़ी (2 सीटें) विपक्ष में रह गईं। इस मोर्चे को अकोला जिला प्रशासन के पास औपचारिक रूप से पंजीकृत कराया गया। भाजपा के रवि ठाकुर को ग्रुप लीडर बनाया गया और सभी सदस्यों को व्हिप जारी किया गया।
AIMIM का इनकार और पार्टी में फूट खबर फैलते ही AIMIM के वरिष्ठ नेता इम्तियाज जलील ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी का रुख भाजपा के खिलाफ है और किसी भी कीमत पर गठबंधन नहीं होगा। जलील ने स्थानीय नेताओं से स्पष्टीकरण मांगा और कहा कि अगर ऐसा हुआ है तो सख्त कार्रवाई होगी। पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी भाजपा से दूरी बनाए रखने की बात दोहराई।
हालांकि, कुछ रिपोर्टों के मुताबिक AIMIM के 5 में से 4 पार्षदों ने पार्टी छोड़कर या अलग होकर इस विकास मंच का समर्थन किया। यह AIMIM के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि पार्टी हमेशा भाजपा-विरोधी छवि पर जोर देती आई है। स्थानीय स्तर पर 'विकास' के नाम पर यह बदलाव हुआ, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व इसे मान्यता नहीं दे रहा।
संजय राउत का तीखा हमला शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के सांसद संजय राउत ने इस पूरे मामले पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने भाजपा को "अवसरवादी" बताते हुए कहा कि अंबरनाथ में कांग्रेस से हाथ मिलाने के बाद अब अकोट में AIMIM का समर्थन! राउत ने भाजपा और AIMIM दोनों को "दोमुंहे केंचुए" (बेमुंहे अळसी) कहा और आरोप लगाया कि सत्ता के लिए वैचारिक मतभेदों को कुचला जा रहा है। उन्होंने कहा, "जनता सब देख रही है, महाराष्ट्र में कहीं खुली तो कहीं छिपी युति चल रही है।"
फडणवीस का सोफट रुख: गठबंधन तोड़ो, कार्रवाई होगी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस स्थानीय स्तर के गठजोड़ पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कांग्रेस या AIMIM के साथ कोई गठबंधन स्वीकार्य नहीं है। "अगर स्थानीय नेताओं ने खुद से ऐसा किया है, तो यह अनुशासनहीनता है। ऐसे गठबंधनों को तुरंत तोड़ने के निर्देश दिए गए हैं और दोषियों पर कार्रवाई होगी।" फडणवीस ने अंबरनाथ (कांग्रेस से युति) और अकोट दोनों मामलों में हस्तक्षेप किया।
यह घटना BMC जैसे बड़े नगर निगम चुनावों (15 जनवरी 2026 को मतदान) से ठीक पहले हुई है, जिससे भाजपा के लिए असुविधा बढ़ गई है।
सत्ता पहले या विचारधारा? अकोट का यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया ट्रेंड दिखा रहा है – जहां 'पार्टी विद डिफरेंस' का दावा सत्ता की मजबूरी के आगे धराशायी हो जाता है। अंबरनाथ में कांग्रेस से हाथ मिलाना और अकोट में AIMIM का अप्रत्यक्ष समर्थन – ये दोनों उदाहरण बताते हैं कि स्थानीय स्तर पर विकास और सत्ता के नाम पर सब कुछ संभव है।
लेकिन सवाल यह है: क्या विचारधारा सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित है? जनता इस बदलाव को कैसे देख रही है? आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाएगा, क्योंकि महाराष्ट्र की सियासत अब 'सत्ता पहले, विचारधारा बाद में' के दौर में तेजी से बढ़ रही है।
Sajjadali Nayani ✍
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