Friday World January 3,2026
यमन के लंबे समय से चले आ रहे गृहयुद्ध में एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के रक्षा मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर घोषणा की है कि यमन से उसके सभी सशस्त्र बलों की वापसी पूरी हो चुकी है। यह कदम सऊदी अरब के साथ बढ़ते तनाव और दिसंबर 2025 के अंत में हुए विवादास्पद घटनाक्रम के ठीक बाद उठाया गया है, जो खाड़ी क्षेत्र की दो सबसे ताकतवर शक्तियों के बीच दरार को उजागर करता है।
यूएई के रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में स्पष्ट किया, "यूएई के सशस्त्र बलों की यमन से संपूर्ण वापसी पूरी हो गई है। यह पहले से घोषित फैसले के तहत किया गया, जिसमें आतंकवाद-विरोधी टीमों के बचे हुए कार्यों को समाप्त करने का प्रावधान था। वापसी प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित ढंग से पूरी की गई और सभी संबंधित अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ समन्वय बनाए रखा गया।"
यह घोषणा 3 जनवरी 2026 को आई, जबकि दिसंबर 2025 के अंत में स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई थी। सब कुछ तब शुरू हुआ जब सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के दक्षिणी बंदरगाह शहर मुकल्ला पर हवाई हमला किया। सऊदी पक्ष का दावा था कि यह हमला यूएई से आए हथियारों और सैन्य वाहनों की खेप को निशाना बनाने के लिए था, जो यूएई समर्थित **साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC)** के अलगाववादी लड़ाकों के लिए भेजी गई थी।
STC, जो दक्षिणी यमन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में पुनर्स्थापित करने की मांग करता है, लंबे समय से यूएई का प्रमुख समर्थक रहा है। दिसंबर 2025 में STC ने हद्रामौत और महरा जैसे तेल-समृद्ध प्रांतों पर कब्जा कर लिया था, जिससे सऊदी अरब समर्थित यमनी सरकार और उसकी सेनाओं के साथ सीधा टकराव हो गया। सऊदी अरब ने इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए "रेड लाइन" करार दिया और आरोप लगाया कि यूएई अलगाववादियों को सीमा की ओर बढ़ने के लिए उकसा रहा है।
हमले के तुरंत बाद यमन की सऊदी समर्थित प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल (PLC) ने यूएई के साथ रक्षा समझौता रद्द कर दिया और 24 घंटे के अंदर सभी अमीराती बलों को देश छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया। यूएई ने शुरुआत में आरोपों का खंडन किया और कहा कि खेप में हथियार नहीं, बल्कि उसके अपने सैनिकों के लिए वाहन थे। हालांकि, तनाव कम करने के लिए यूएई ने तुरंत अपनी बची हुई "आतंकवाद-विरोधी इकाइयों" की वापसी की घोषणा कर दी थी।
2015 में शुरू हुए यमन युद्ध में सऊदी अरब और यूएई दोनों ने शुरू में हूती विद्रोहियों के खिलाफ संयुक्त गठबंधन बनाया था। लेकिन 2019 के बाद यूएई ने अपनी मुख्य सेना वापस बुला ली थी और केवल सीमित आतंकवाद-विरोधी दस्तों को बनाए रखा था। इस दौरान दोनों देशों के हित अलग-अलग दिशाओं में चले गए—सऊदी अरब एकजुट यमन चाहता है, जबकि यूएई दक्षिणी यमन में मजबूत प्रभाव और STC के माध्यम से रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखना चाहता है।
यह तनाव खाड़ी क्षेत्र में पहले से ही मौजूद प्रतिस्पर्धा को और गहरा करता है। दोनों देश तेल उत्पादन, क्षेत्रीय प्रभाव और यहां तक कि वैश्विक राजनीति में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई की पूर्ण वापसी से फिलहाल सैन्य टकराव की आशंका कम हुई है, लेकिन STC और सऊदी समर्थित ताकतों के बीच संघर्ष जारी रह सकता है।
यमन का गृहयुद्ध अब और जटिल हो गया है। उत्तर में ईरान समर्थित हूती मजबूत हैं, दक्षिण में अलगाववादी और सरकार समर्थक गुट आपस में भिड़ रहे हैं। इस बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर अमेरिका, ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने सऊदी और यूएई के विदेश मंत्रियों से बातचीत की, लेकिन स्थायी समाधान अभी दूर दिखता है।
यूएई की इस वापसी से यमन में शक्ति संतुलन बदल सकता है। STC अब बिना प्रत्यक्ष अमीराती सैन्य समर्थन के सऊदी दबाव का सामना कर रहा है। वहीं, सऊदी अरब ने दक्षिणी गुटों को रियाद में संवाद के लिए आमंत्रित किया है, ताकि "दक्षिणी मुद्दे" का न्यायपूर्ण समाधान निकाला जा सके।
यह घटनाक्रम खाड़ी की राजनीति में एक बड़ा सबक है—कभी सहयोगी रहे देश भी हितों के टकराव में दुश्मन बन सकते हैं। यमन के लोगों के लिए यह और इंतजार का दौर है, जहां शांति अभी भी दूर की कौड़ी लगती है।
Friday World January 3,2026
Sajjadali Nayani ✍