Friday World January 6, 2026
3 जनवरी 2026 की रात, अमेरिकी सेना ने काराकास में एक आश्चर्यजनक सैन्य ऑपरेशन चलाया। इस ऑपरेशन में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर लिया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे "ड्रग्स और हथियारों से जुड़े अपराधों" के खिलाफ कानून प्रवर्तन कार्रवाई बताया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर का घोर उल्लंघन और संप्रभुता पर हमला करार दिया। ट्रम्प ने घोषणा की कि अमेरिका अब वेनेज़ुएला को "चलाएगा" और तेल संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करेगा। इस घटना ने लैटिन अमेरिका में तनाव बढ़ा दिया, जहां कई देशों ने इसे "साम्राज्यवादी आक्रमण" कहा।
फ्रांस में इस हमले पर प्रतिक्रियाएं बंट गईं। राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने शुरुआत में एक पोस्ट में लिखा कि वेनेज़ुएला के लोग "मादुरो की तानाशाही" से मुक्त होने पर "खुश हो सकते हैं" और उन्होंने एक शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक संक्रमण की बात की। लेकिन उन्होंने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की निंदा नहीं की, न ही अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का जिक्र किया। यह चुप्पी फ्रांस के भीतर भारी आलोचना का कारण बन गई। फ्रांस की वामपंथी, कम्युनिस्ट और पर्यावरणवादी पार्टियां मैक्रों पर "दोहरे मापदंड" और "अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ समझौता" का आरोप लगा रही हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के नेता फेबियन रूसेल ने इसे "अंतिम अपमान" बताया और कहा कि फ्रांस अब अमेरिका का "51वां राज्य" बन गया है। पूर्व प्रधानमंत्री डोमिनिक डे विलपिन ने चेतावनी दी कि मैक्रों का यह रुख फ्रांस की ऐतिहासिक कूटनीति से विचलन है, जो 2003 में इराक युद्ध के समय बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून का समर्थन करता था।
आलोचकों का कहना है कि मुद्दा मादुरो सरकार का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि बल प्रयोग द्वारा शासन परिवर्तन का सिद्धांत है। इराक और लीबिया में ऐसे हस्तक्षेपों ने अस्थिरता, आतंकवाद और मानवीय संकट पैदा किए थे। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बारोट ने कहा कि यह कार्रवाई "बल के प्रयोग पर प्रतिबंध" के सिद्धांत का उल्लंघन है, लेकिन मैक्रों की प्रारंभिक प्रतिक्रिया ने इसे कमजोर कर दिया।
इस घटना को "बलवान का अधिकार" (might makes right) के तर्क के रूप में देखा जा रहा है, जहां अमेरिका लैटिन अमेरिका में अपने प्रभाव क्षेत्र को फिर से परिभाषित कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि असली मकसद वेनेज़ुएला के विशाल तेल भंडार पर नियंत्रण है, जो दुनिया के सबसे बड़े क्रूड ऑयल रिजर्व में से एक है। ट्रम्प ने स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिकी कंपनियां तेल क्षेत्र में निवेश करेंगी और "मुआवजा" लेंगी।
फ्रांस की घरेलू राजनीति में यह विवाद मैक्रों की छवि पर असर डाल रहा है। लेफ्ट विंग पार्टियां इसे "अंतरराष्ट्रीय कानून की अवहेलना" बता रही हैं, जबकि दक्षिणपंथी नेता **जॉर्डन बार्डेला** (RN) ने ट्रम्प से दूरी बनाई। कई विश्लेषकों का कहना है कि मैक्रों की चुप्पी यूक्रेन संकट में ट्रम्प के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश हो सकती है, लेकिन यह फ्रांस की स्वतंत्र कूटनीति को कमजोर कर रही है।
यह घटना यूरोप के लिए एक बड़ा सबक है। अगर यूरोपीय देश अमेरिकी एकतरफावाद के सामने चुप रहते हैं, तो वे खुद को निष्क्रिय खिलाड़ी बना देंगे। फ्रांस और यूरोप को अब स्पष्ट रूप से संप्रभुता, सामूहिक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था की रक्षा करनी होगी। अन्यथा, "बल के प्रयोग" का यह नया युग न केवल लैटिन अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा बन सकता है।
वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमला सिर्फ एक देश का मुद्दा नहीं—यह वैश्विक व्यवस्था का परीक्षण है। मैक्रों की चुप्पी ने फ्रांस में बहस छेड़ दी है कि क्या यूरोप अब भी स्वतंत्र आवाज रख सकता है, या वह अमेरिकी नीतियों का अनुचर बनकर रह जाएगा?
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 6, 2026