-Friday World 22 February 2026
2014 में भाजपा की सत्ता में वापसी के साथ भारतीय राजनीति में एक मौलिक बदलाव आया। यह बदलाव सिर्फ सत्ताधारी दल का नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक मैदान की नियमावली का था। जहां कांग्रेस जैसी पारंपरिक पार्टियाँ सत्ता से बाहर हुईं, लेकिन उनका सामाजिक आधार बरकरार रहा, वहीं बहुजन समाज—OBC, SC, ST और अल्पसंख्यक—की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज़ को व्यवस्थित रूप से दबाया गया।
यह रणनीति दो स्तरों पर काम करती रही: एक ओर सत्ता, एजेंसियों और संसाधनों का दबाव, दूसरी ओर बहुजन समाज के भीतर भ्रम, डर और विभाजन पैदा करना। भाजपा ने सफलतापूर्वक यह नैरेटिव गढ़ा कि बहुजन समाज की अलग राजनीति 'अनावश्यक' है। नतीजा? बहुजन पार्टियाँ—जैसे BSP, SP, RJD—न सिर्फ चुनावी ताकत खो रही हैं, बल्कि अपने ही आधार में राजनीतिक भरोसा भी गंवा रही हैं।
बहुजन पार्टियों का दोहरा हमला: क्यों बनीं सबसे बड़ा निशाना?
कांग्रेस सत्ता खोकर भी अपने को 'राष्ट्रीय पार्टी' के रूप में बनाए रख सकी, लेकिन बहुजन नेतृत्व वाली पार्टियाँ सीधे निशाने पर रहीं। 2014 के बाद उत्तर भारत में भाजपा ने 'सामाजिक इंजीनियरिंग' के जरिए गैर-प्रभुत्वशाली जातियों को अपने पाले में लाया। उदाहरणस्वरूप, उत्तर प्रदेश में गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलितों को लक्षित किया गया। BSP और SP के वोट बैंक में सेंध लगाई गई, जिससे इन पार्टियों का आधार सिकुड़ता चला गया।
यह सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं थी—यह वैचारिक स्तर पर बहुजन समाज को यह विश्वास दिलाने की कोशिश थी कि उनकी अपनी राजनीति 'विभाजनकारी' है, जबकि 'राष्ट्रवाद' और 'विकास' सबके लिए एक ही रास्ता है। परिणामस्वरूप, बहुजन समाज में हताशा फैली: "अब कुछ हो नहीं सकता" वाली भावना सत्ता का सबसे मजबूत हथियार बन गई।
"देश के 90% त्रस्त हैं"—फिर सत्ता क्यों अडिग? बेरोजगारी, महंगाई, किसानों-श्रमिकों की बदहाली, शिक्षा-स्वास्थ्य का निजीकरण, आरक्षण पर हमले—ये सब मौजूद हैं। फिर भी सत्ता डगमगाती क्यों नहीं? क्योंकि यह अब 'प्रबंधित लोकतंत्र' (managed democracy) से चल रही है। साम, दाम, दंड, भेद—ये अब चुनावी कार्यशैली का हिस्सा हैं।
इस्तीफा अब नैतिकता का प्रतीक नहीं, कमजोरी का प्रतीक बन गया है। पहले बड़े घोटाले या नैतिक संकट पर इस्तीफा राजनीतिक दबाव होता था। अब इसे 'अपराध स्वीकार' की तरह प्रचारित किया जाता है। नतीजा? कानूनी-नैतिक संकटों के बावजूद मंत्री नहीं हटते, व्यवस्था नहीं हिलती। यह जवाबदेही के ढांचे का टूटना है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना में भारत का परिदृश्य और गहरा है। कई देशों में नैतिक संकट पर नेता इस्तीफा देते हैं। लेकिन यहां सवाल उठाना ही 'देशद्रोह' बन जाता है। लोकतंत्र राष्ट्रवाद के शोर में दब जाता है।
बहुजन राजनीति की सबसे बड़ी हार: मनोवैज्ञानिक स्तर पर सबसे खतरनाक नुकसान वैचारिक है। बहुजन समाज में अब BJP की ताकत से ज्यादा डर यह है कि "विकल्प नहीं है"। OBC, SC/ST पार्टियाँ चुनाव हार रही हैं, लेकिन असली हार उनके समाज में राजनीतिक भरोसे की है।
भविष्य में सत्ता परिवर्तन 'लगभग नामुमकिन' लगने लगा है—सिवाय जनविद्रोह के। लेकिन जनविद्रोह अचानक नहीं फूटता। यह लंबे दमन, अपमान और संगठित चेतना से पैदा होता है। आज असंतोष बहुत है, लेकिन वह बहुजन संगठनों से नहीं जुड़ पा रहा।
असली सवाल: बहुजन राजनीति का पुनर्जीवन BJP को हटाना अब पर्याप्त नहीं। असली चुनौती बहुजन राजनीति को फिर से खड़ा करने की है। क्या OBC, SC/ST और अल्पसंख्यक नेतृत्व वाली पार्टियाँ शिक्षा, आरक्षण, बैकलॉग, निजीकरण, प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर साझा वैचारिक भाषा बना पा रही हैं?
आज बहुजन राजनीति की सबसे बड़ी विफलता चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता के विरुद्ध सुसंगत वैचारिक विकल्प न खड़ा कर पाना है। 2014 के बाद सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त हुआ कांग्रेस नहीं—बल्कि बहुजन समाज की स्वतंत्र राजनीतिक संभावना है।
अगर यह संभावना दोबारा नहीं गढ़ी गई, तो सत्ता परिवर्तन का रास्ता और कठिन होता जाएगा। समय है कि बहुजन समाज अपनी आवाज़ को फिर से संगठित करे—न सिर्फ विरोध में, बल्कि एक मजबूत, वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टि के साथ। क्योंकि लोकतंत्र तभी बचता है, जब हर वर्ग की राजनीतिक संभावना जीवित रहती है।
2014 के बाद भारत में सत्ता की संरचना ने बहुजन समाज की स्वतंत्र राजनीतिक संभावना को सबसे गहरा नुकसान पहुँचाया है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का परिणाम है, जिसने OBC, SC और ST नेतृत्व वाली पार्टियों और आंदोलनों को कमजोर किया।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 22 February 2026