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Monday, 16 February 2026

"जुली के. ब्राउन: जेफरी एप्स्टीन के काले राज़ उजागर करने वाली साहसी पत्रकार, जिसने शक्तिशाली लोगों की दुनिया हिला दी"

"जुली के. ब्राउन: जेफरी एप्स्टीन के काले राज़ उजागर करने वाली साहसी पत्रकार, जिसने शक्तिशाली लोगों की दुनिया हिला दी"-Friday World 17th Feb 2026
जेफरी एप्स्टीन का नाम आज भी दुनिया भर में यौन शोषण, मानव तस्करी और शक्तिशाली लोगों के काले नेटवर्क का पर्याय बन चुका है। यह एक ऐसा कांड था जिसमें नाबालिग लड़कियों का शोषण, अमीर-ग़रीब की कोई सीमा नहीं थी, और जिसमें कई बड़े नाम जुड़े होने के आरोप लगे। लेकिन इस अंधेरे सच को दुनिया के सामने लाने का श्रेय मुख्य रूप से एक बहादुर अमेरिकी पत्रकार जुली के. ब्राउन को जाता है। उन्होंने वर्षों की मेहनत, जोखिम और लगन से इस घिनौने नेटवर्क को बेनकाब किया, जिसने न केवल अमेरिकी न्याय व्यवस्था को झकझोरा, बल्कि पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया कि सत्ता और पैसे के आगे सत्य कितना कमजोर हो सकता है। 

एप्स्टीन कांड: एक भयावह सच्चाई जेफरी एप्स्टीन एक अमेरिकी वित्तीय कारोबारी था, जो अमीरों और प्रभावशाली लोगों का दोस्त बन चुका था। उसने 1990 के दशक से 2000 के दशक तक नाबालिग लड़कियों को लालच, धमकी और जबरदस्ती से यौन शोषण के लिए इस्तेमाल किया। उसके प्राइवेट द्वीप, न्यूयॉर्क का महल और फ्लोरिडा का घर – ये सभी जगहें शोषण का केंद्र बनीं। एप्स्टीन ने इन अपराधों को छिपाने के लिए शक्तिशाली लोगों के साथ संबंध बनाए, ताकि कानून उस तक न पहुंच सके।

 2008 में एप्स्टीन को गिरफ्तार किया गया, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उसे बहुत नरम सजा मिली – सिर्फ 13 महीने की जेल, जिसमें से ज्यादातर समय वह वर्क रिलीज पर बाहर रहा। यह सौदा इतना विवादास्पद था कि इसे "स sweet deal" कहा गया। लेकिन 2019 में फिर से जांच शुरू हुई, और एप्स्टीन को फिर गिरफ्तार किया गया। जेल में उसकी मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई, जिसने कई सवाल खड़े किए। उसकी साथी गिस्लेन मैक्सवेल को बाद में दोषी ठहराया गया और लंबी सजा सुनाई गई। 

 जुली के. ब्राउन: सत्य की योद्धा जब ज्यादातर मीडिया इस मामले को भूल चुका था, तब मियामी हेराल्ड की जांच पत्रकार जुली के. ब्राउन ने 2017-2018 में "Perversion of Justice" नामक एक शक्तिशाली सीरीज प्रकाशित की। उन्होंने 60 से ज्यादा पीड़िताओं से बात की, जिनमें से कई सालों से चुप थीं। उन्होंने कोर्ट के हजारों पन्नों के दस्तावेज़ खंगाले, पुलिस रिपोर्ट्स की जांच की और दिखाया कि कैसे एप्स्टीन को 2008 में विशेष छूट मिली थी। 

जुली की रिपोर्ट ने दिखाया कि फ्लोरिडा के तत्कालीन अभियोजक अलेक्जेंडर एकोस्टा (जो बाद में ट्रंप प्रशासन में लेबर सेक्रेटरी बने) ने एप्स्टीन के साथ गुप्त समझौता किया था। इस समझौते में पीड़िताओं को सूचित भी नहीं किया गया था। जुली की मेहनत से यह मामला फिर से खुला, नए सबूत आए, और 2019 में एप्स्टीन की गिरफ्तारी हुई।

 उनकी रिपोर्ट ने #MeToo आंदोलन को नई ताकत दी और दिखाया कि पत्रकारिता कितनी शक्तिशाली हो सकती है। जुली ने लिखा, "यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं था, बल्कि एक पूरी व्यवस्था का था जो अमीरों को बचाती है।" 

भारतीय संदर्भ में विवाद और मीडिया की भूमिका हाल ही में एप्स्टीन फाइलों की नई खेप जारी होने से दुनिया भर में हलचल मची। इनमें कई बड़े नामों का जिक्र आया, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कुछ अन्य भारतीय व्यक्तियों के नाम भी शामिल बताए गए। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि एप्स्टीन के ईमेल में मोदी का जिक्र है, जैसे उनकी इज़राइल यात्रा या अन्य संदर्भों में। हालांकि, भारतीय पक्ष ने इन दावों को सिरे से खारिज किया और कहा कि ये सिर्फ एप्स्टीन की खुद की बातें हैं, कोई ठोस सबूत या अपराध से जुड़ाव नहीं है। कई फैक्ट-चेक और आधिकारिक बयानों में स्पष्ट किया गया कि मोदी या किसी भारतीय मंत्री का नाम क्लाइंट लिस्ट या अपराध से जुड़े रूप में नहीं है – यह ज्यादातर एप्स्टीन के नाम ड्रॉपिंग का मामला लगता है।

 फिर भी, भारत में इस पर राजनीतिक बहस छिड़ गई। कुछ लोग कहते हैं कि भारतीय मीडिया ने इस पर चुप्पी साध रखी है या इसे दबाने की कोशिश की, जबकि विपक्ष पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया जा रहा है। यह सवाल उठता है कि क्या मीडिया सत्य को पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से पेश कर रहा है? एप्स्टीन जैसे मामले में जहां शक्तिशाली लोग शामिल हों, वहां मीडिया की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है – न कि पक्षपातपूर्ण, बल्कि सच्चाई उजागर करने वाली। 

सत्य की जीत और प्रेरणा एप्स्टीन कांड ने दिखाया कि कितने भी बड़े नाम क्यों न हों, सत्य अंततः सामने आता है। जुली के. ब्राउन जैसी पत्रकारों ने साबित किया कि एक व्यक्ति की हिम्मत पूरी व्यवस्था को चुनौती दे सकती है। उन्होंने पीड़िताओं को आवाज दी, न्याय की मांग को मजबूत किया और दुनिया को याद दिलाया कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तभी है जब वह सत्य के लिए खड़ी हो। 

आज जब दुनिया भर में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जुली की कहानी प्रेरणा देती है। सत्य को दबाया जा सकता है, लेकिन कभी खत्म नहीं किया जा सकता। सलाम है उस बहादुर महिला को, जिसने अंधेरे के सामने रोशनी जलाकर दिखाया कि न्याय की लड़ाई कभी हारी नहीं जाती। सत्यमेव जयते – सत्य की हमेशा जीत होती है।

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 17th Feb 2026