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Sunday, 15 March 2026

भारत में बेरोजगारी का सवाल: BJP शासित राज्यों की हकीकत और राजनीतिक विपक्ष की विवादास्पद भूमिका

भारत में बेरोजगारी का सवाल: BJP शासित राज्यों की हकीकत और राजनीतिक विपक्ष की विवादास्पद भूमिका-Friday World March 15,3026
भारत में रोजगार का मुद्दा पिछले एक दशक से राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बड़े वादे किए थे – हर साल 2 करोड़ नई नौकरियां। लेकिन EPFO (Employees' Provident Fund Organisation) और NPS (National Pension System) में नए जोड़ दिखे जरूर, पर वार्षिक 2 करोड़ का लक्ष्य कभी पूरा नहीं हुआ। 2022 में प्रधानमंत्री कार्यालय ने 10 लाख सरकारी नौकरियां भरने की बात कही, जबकि मूल वादा इससे कहीं बड़ा था। राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक क्षेत्र में अभी भी लाखों पद खाली पड़े हैं।

 यह स्थिति सिर्फ केंद्र तक सीमित नहीं है। BJP शासित कई राज्यों में भी बेरोजगारी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्य, जो BJP के मजबूत गढ़ माने जाते हैं, वहां भी युवा रोजगार की तलाश में भटकते नजर आते हैं। इन राज्यों में भ्रष्टाचार के मामले भी समय-समय पर सुर्खियां बटोरते रहे हैं, जैसे मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला और गुजरात में मनरेगा से जुड़े हालिया आरोप। साथ ही, कांग्रेस जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टी की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं – क्या वह इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठा पाई है? 

BJP शासित राज्यों में बेरोजगारी: गुजरात और मध्य प्रदेश का उदाहरण 

गुजरात को अक्सर विकास का मॉडल बताया जाता है। राज्य सरकार के आंकड़ों और PLFS (Periodic Labour Force Survey) के अनुसार, 2023-24 में गुजरात में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से काफी कम रही – लगभग 1.1% से 2.2% के बीच। लेकिन यह आंकड़े औपचारिक क्षेत्र पर ज्यादा केंद्रित हैं। ग्रामीण और असंगठित क्षेत्र में स्थिति अलग है। युवा अभी भी सरकारी नौकरियों, ITI जॉब्स और प्राइवेट सेक्टर में अवसरों की कमी से जूझ रहे हैं। 

मध्य प्रदेश में भी स्थिति बेहतर नहीं है। राज्य में औद्योगिक विकास हुआ है, लेकिन बेरोजगारी दर कई बार राष्ट्रीय औसत से ऊपर रही। शिक्षित युवा SSC, पटवारी, पुलिस भर्ती जैसी परीक्षाओं में भाग लेते हैं, लेकिन घोटालों और अनियमितताओं के कारण लाखों प्रभावित होते हैं। 

इन राज्यों में BJP की सरकारें लंबे समय से हैं, फिर भी रोजगार सृजन के बड़े वादे पूरे नहीं हो पाए। केंद्र का 2 करोड़ वार्षिक लक्ष्य अधूरा रहने से राज्यों पर भी दबाव बढ़ा। EPFO में नए सदस्य जुड़े, लेकिन यह मुख्य रूप से संगठित क्षेत्र तक सीमित रहा। असंगठित क्षेत्र, जहां अधिकांश भारतीय काम करते हैं, वहां रोजगार की गुणवत्ता और स्थिरता की कमी बनी हुई है। 

मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला: भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें मध्य प्रदेश का Vyapam (मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल) घोटाला भारतीय इतिहास के सबसे बड़े भ्रष्टाचार कांडों में से एक है। 1990 के दशक से चला यह घोटाला मेडिकल, इंजीनियरिंग, पुलिस और अन्य सरकारी नौकरियों में अनुचित तरीके से प्रवेश और भर्ती से जुड़ा था। मध्यस्थ, अधिकारी, राजनेता और उम्मीदवार मिलकर पैसे लेकर रैंक बदलते थे।

 इस घोटाले की जांच में 2000 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात 23 से 40 (औपचारिक आंकड़े) से ज्यादा 'अप्राकृतिक मौतें' थीं – आरोपी, गवाह, पत्रकार और अधिकारी शामिल। अनौपचारिक अनुमान 100 से ऊपर बताते हैं। इनमें गवाहों की हत्या, सड़क हादसे, आत्महत्या जैसी मौतें शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में सभी मामलों को CBI को सौंप दिया था।

 यह घोटाला युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ का प्रतीक बना। लाखों उम्मीदवारों ने मेहनत की, लेकिन योग्यता के बजाय पैसे और सेटिंग ने फैसला किया। BJP सरकार के समय यह घोटाला उजागर हुआ, लेकिन जांच की गति और मौतों पर सवाल बने रहे। 

कांग्रेस की भूमिका: नजरअंदाज या कमजोर विरोध? व्यापम जैसे बड़े घोटाले में कांग्रेस की भूमिका पर गंभीर सवाल हैं। कांग्रेस ने CBI जांच की मांग की, SIT बनवाई, लेकिन इसे राष्ट्रीय स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने में नाकाम रही। विपक्ष के रूप में कांग्रेस मध्य प्रदेश और केंद्र में मजबूत आवाज नहीं उठा पाई। कई नेता आरोप लगाते रहे, लेकिन ठोस सबूतों के साथ लगातार दबाव बनाने में कमी रही। 

गुजरात में भी कांग्रेस की छवि विवादास्पद रही। BJP के साथ 'सेटिंग' के आरोप आम हैं। पुरानी वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े मामलों से लेकर हाल के मनरेगा घोटाले तक, कांग्रेस ने आरोप लगाए, लेकिन कार्रवाई या जन-जागरण में पीछे रही।

 हाल ही में गुजरात के दाहोद जिले में मनरेगा (MGNREGA) से जुड़े घोटाले के आरोप लगे – एक BJP मंत्री के बेटों की गिरफ्तारी हुई, करोड़ों की हेराफेरी का दावा। कांग्रेस ने मंत्री के इस्तीफे की मांग की, लेकिन इसे बड़ा मुद्दा बनाने में सीमित सफलता मिली। पहले भी मनरेगा में अनियमितताओं के आरोप लगे, लेकिन कांग्रेस मुख्य रूप से 'सेटिंग' तक सीमित रही। 

कांग्रेस को विपक्ष की भूमिका में मजबूत होकर इन मुद्दों को उठाना चाहिए था। राष्ट्रीय स्तर पर व्यापम जैसा मामला उठाकर आम नागरिक का ध्यान खींच सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे विपक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।

आगे की राह: रोजगार संकट का समाधान क्या? 

- **पारदर्शी भर्ती**: SSC, PSC, रेलवे जैसी परीक्षाओं में डिजिटल और CCTV निगरानी बढ़ानी चाहिए। 

- **स्किल डेवलपमेंट**: प्राइवेट सेक्टर में इंडस्ट्री ग्रोथ और स्किल ट्रेनिंग पर फोकस। 

- **असंगठित क्षेत्र**: मनरेगा जैसी योजनाओं में पारदर्शिता, बायोमेट्रिक अटेंडेंस।

 - **विपक्ष की जिम्मेदारी**: सिर्फ आरोप नहीं, ठोस जांच और जन-आंदोलन जरूरी।

 - **सरकार की चुनौती**: 2 करोड़ वाले वादे से आगे बढ़कर वास्तविक रोजगार सृजन। 

भारत के युवा अब जुमलों से नहीं, परिणामों से प्रभावित होते हैं। गुजरात-मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में विकास हुआ है, लेकिन बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की छाया बनी हुई है। विपक्ष को भी अपनी कमजोरियों पर विचार करना होगा। असली बदलाव तब आएगा जब सभी दल मिलकर रोजगार को प्राथमिकता देंगे, न कि राजनीतिक लाभ के लिए। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 15,3026