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Tuesday, 24 March 2026

"गुजरात: जहां नकली नोट छापने वाले भी 'योग गुरु' बनकर लोगों की 'भलाई' करते हैं

"गुजरात: जहां नकली नोट छापने वाले भी 'योग गुरु' बनकर लोगों की 'भलाई' करते हैं
-Friday World March 24,2026 
भाई साहब, गुजरात को देखकर लगता है कि यह भूमि कोई साधारण राज्य नहीं, बल्कि उद्यमिता का मंदिर  है। यहां के लोग सिर्फ बैंक से लोन लेकर भागने में माहिर नहीं, बल्कि खुद ही नोट छापने का कारोबार शुरू कर देते हैं। और अब तो स्तर इतना ऊंचा हो गया है कि योग फाउंडेशन के आश्रम में बैठकर AI की मदद से नकली नोट छापे जा रहे हैं। अहमदाबाद-सूरत कनेक्शन में पकड़े गए प्रदीप जोतंगिया उर्फ प्रदीप गुरुजी ने तो कमाल कर दिया। उन्होंने कहा, “पैसे की कमी थी, लोगों की भलाई के लिए कुछ करना था, इसलिए खुद ही नोट छाप लिए।” वाह रे गुजरात! वाह रे उद्यमी भावना! 

कल्पना कीजिए, पूरी दुनिया में जहां लोग टैक्स चोरी करके या घोटालों से पैसा कमाते हैं, वहां गुजरात का एक योग गुरु सीधे-सीधे श्री सत्यम योग फाउंडेशन के नाम पर फैक्ट्री चला रहा था। बेडरूम को प्रिंटिंग यूनिट बना लिया, चीन से स्पेशल पेपर मंगवाया, AI टूल्स (ChatGPT तक!) से डिजाइन तैयार किया, और ₹500 के नोटों के ढेर लगा दिए – कुल फेस वैल्यू ₹2.38 करोड़ से ज्यादा। गाड़ी पर Government of India और Ministry of AYUSH का स्टिकर लगाकर नोट सप्लाई करने का इंतजाम! 

प्रदीप भाई जी ने सोचा होगा कि असली योग तो यही है – आसन नहीं, प्रिंटिंग प्रेस। ध्यान नहीं, डिजाइन। और प्राणायाम की जगह नोट काउंटिंग। जब पूछा गया कि भाई यह सब क्यों? तो जवाब आया – “समाज सेवा के लिए। आश्रम चलाने के लिए, लोगों की भलाई के लिए।” अरे वाह! तो फिर असली नोट क्यों नहीं मांगे? मोदी जी या अमित शाह जी से एक फोन कर देते, गुजरात के व्यापारी भाईयों से कह देते – “भाई, थोड़े असली नोट दे दो, हम भलाई करेंगे।” लेकिन नहीं, प्रदीप गुरुजी को अपना नाम रोशन करना था। दूसरों की मदद लेकर नाम कमाने से क्या फायदा? खुद की काबिलियत दिखानी थी। 

यह है गुजरात की स्पिरिट! यहां टेंडर-ठेका लेकर असली नोट छापने वाले व्यापारी तो रोजाना दूसरे राज्यों में धमाल मचा रहे हैं, लेकिन प्रदीप भाई ने कहा – “नहीं भाई, मैं तो इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट हूं। नकली ही सही, लेकिन खुद की प्रोडक्शन।” 

सोचिए, योग गुरु बनकर क्या-क्या सीखा जाता है। आसन से लेकर नकली नोटों का आसन तक। शिष्य भी साथ थे – मुकेश ठुम्मर, रमेश भालर, दिव्येश राणा, भरतभाई काकड़िया, आशोक मावानी, आरती सेवलिया – सब ‘समाज सेवा’ में जुटे हुए थे। एक ने प्रिंटर चलाया, दूसरे ने कटिंग की, तीसरे ने AI से सिक्योरिटी फीचर्स कॉपी किए। टीम वर्क का बेहतरीन उदाहरण! 

और सबसे मजेदार बात – नोट बेचने का रेट भी कमाल का था। ₹1500 के नकली नोट ₹500 में बेच रहे थे। यानी डिस्काउंट पर ‘भलाई’! पहले डील में ₹66 लाख का सौदा तय हुआ था, लेकिन पुलिस ने बीच में ही पकड़ लिया। वरना शायद आज गुजरात के कई आश्रमों में ‘योग शिविर’ के नाम पर नकली नोट बंट रहे होते। 

गुजरात की इस घटना को देखकर याद आता है कि **विकास का मॉडल** कितना अनोखा है। यहां बैंक लूटने वाले, नोट छापने वाले, घोटाले करने वाले – सबको ‘उद्यमी’ कहा जाता है। लेकिन प्रदीप गुरुजी ने तो नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। योग की आड़ में फेक करेंसी। ध्यान की जगह काउंटरफीट। प्राणायाम की जगह प्रिंटिंग मशीन। अगर यह सफल हो जाता तो शायद अगला स्टेप होता – नकली पासपोर्ट छापकर विदेश भेजना, या नकली डिग्री देकर युवाओं को ‘सशक्त’ बनाना। 

राजनीति में भी यही चलन है ना? बड़े-बड़े घोटाले ‘राष्ट्रीय हित’ या ‘समाज कल्याण’ के नाम पर होते हैं। प्रदीप भाई ने बस उसे आध्यात्मिक स्तर पर ले गए। कहा जाता है कि गुजरात में हर कोई कुछ न कुछ छापता है – कुछ शेयर, कुछ नोट, कुछ वादे। लेकिन गुरुजी ने सीधे नोट छाप दिए। कोई बिचौलिया नहीं, कोई दलाल नहीं, सीधे प्रोडक्शन। मेक इन गुजरात का नया संस्करण! 

अब पुलिस पूछ रही है कि पहले भी नोट बाजार में गए या नहीं। जांच चल रही है कि यह नेटवर्क दूसरे राज्यों तक फैला या नहीं। लेकिन सवाल यह है – जब असली अर्थव्यवस्था में इतने सारे ‘क्रिएटिव’ तरीके से पैसा बन रहा है, तो नकली छापने की जरूरत ही क्यों पड़ी? शायद प्रदीप गुरुजी को लगता था कि असली नोट तो सबके पास हैं, लेकिन नकली नोट में क्रिएटिविटी है। जैसे कोई कलाकार कहे – “मैं ओरिजिनल पेंटिंग नहीं बनाऊंगा, फेक बनाकर अपनी स्टाइल दिखाऊंगा।” 

यह घटना सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि गुजरात मॉडल का प्रतीक है। जहां विकास के नाम पर सब कुछ ‘प्रिंट’ होता है – चाहे नोट हों, वादे हों, या सपने। योग गुरु से लेकर व्यापारी तक, सब अपनी-अपनी ‘भलाई’ कर रहे हैं। और आम आदमी? वह तो बस योगासन करके तनाव कम करता रहे, क्योंकि असली तनाव तो अर्थव्यवस्था का है। 

प्रदीप भाई, आपने साबित कर दिया कि गुजरात में सपने देखने वाले नहीं, बल्कि नोट छापने वाले ही आगे बढ़ते हैं। अगली बार अगर कोई योग शिविर में ‘समृद्धि’ का मंत्र दे तो सावधान रहना। शायद वह मंत्र ₹500 का नकली हो। गुजरात महान है। यहां न सिर्फ सपने बिकते हैं, बल्कि उनके प्रिंटेड वर्जन भी। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 24,2026