24 मार्च 2026। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बैठे हैं—मेम्फिस, टेनेसी में सेफ्टी टास्क फोर्स का राउंडटेबल। उनके बगल में बैठे हैं डिफेंस सेक्रेटरी पेटे हेगसेथ। ट्रंप अचानक मुड़कर हेगसेथ की ओर इशारा करते हैं और कहते हैं: “पेटे, मुझे लगता है तुम पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कहा—‘चलो कर देते हैं’, क्योंकि उन्हें परमाणु हथियार नहीं मिलने देना चाहिए।”
यह वाक्य सिर्फ एक याद नहीं, बल्कि युद्ध के चौथे सप्ताह में ट्रंप प्रशासन के अंदरूनी कलह और दोषारोपण की नई मिसाल बन गया। जब ईरान के साथ चल रहा संघर्ष न सिर्फ लंबा खिंच रहा है, बल्कि अमेरिका और उसके सहयोगियों को भारी नुकसान पहुंचा रहा है, तब ट्रंप खुद को “शांतिदूत” बताते हुए पूरा श्रेय (या कहें दोष) अपने रक्षा सचिव पर डाल रहे हैं।
फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए इस अभियान को ट्रंप ने शुरू में “स्विफ्ट एंड डिसाइसिव” बताया था। मकसद था—ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना, खामेनेई परिवार को निशाना बनाना और अंततः तेहरान में रेजीम चेंज लाना। लेकिन अब, जब ईरान की मिसाइलें इजराइल, अमेरिकी ठिकानों और क्षेत्रीय सहयोगियों पर बरस रही हैं, जब इराक से NATO सैनिक भाग रहे हैं और तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, तब ट्रंप का सुर बदल गया है। “मैंने युद्ध शुरू नहीं किया”—यह उनका नया मंत्र है।
ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा: “मैंने पेटे को फोन किया, जनरल डेन केन को फोन किया… और पेटे पहले थे जिन्होंने कहा—‘लेट्स डू इट’।” हेगसेथ वहीं बैठे थे, चुपचाप सुन रहे थे। यह दृश्य कई राजनीतिक विश्लेषकों को याद दिला रहा है कि ट्रंप अक्सर असफलताओं का दोष दूसरों पर डालते रहे हैं। चाहे 2020 का चुनाव हो या अफगानिस्तान निकासी, ट्रंप का पैटर्न एक सा रहा—“मेरी गलती नहीं”।
लेकिन हकीकत कुछ और है। ट्रंप ने खुद कई बार ईरान पर हमले की धमकी दी थी। उन्होंने खुलेआम कहा था कि “ईरानी लोग उठो और अपनी सरकार ले लो”। इजराइल के साथ मिलकर शुरू किए गए हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर और कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत की खबरें आईं। ट्रंप ने इसे “बहुत गंभीर रेजीम चेंज” बताया। लेकिन अब जब ईरान की प्रतिक्रिया ने पूरे मध्य पूर्व को हिला दिया, जब इराक में NATO मिशन के सैकड़ों सैनिकों को यूरोप (मुख्यतः इटली) में स्थानांतरित करना पड़ा, तब ट्रंप का सुर बदल गया।
हेगसेथ खुद पहले कह चुके हैं कि “हमने युद्ध शुरू नहीं किया, लेकिन ट्रंप के नेतृत्व में इसे खत्म कर रहे हैं”। उन्होंने ईरान पर 47 साल से आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया। लेकिन अब ट्रंप उन्हें ही “पहला आवाज” बता रहे हैं। यह विरोधाभास स्पष्ट है। एक तरफ ट्रंप “अमेरिका फर्स्ट” का नारा देते हैं, दूसरी तरफ जब युद्ध महंगा और लंबा पड़ता दिख रहा है, तो दोष दूसरे के सिर पर।
यह घटनाक्रम सिर्फ व्यक्तिगत दोषारोपण नहीं, बल्कि बड़े भू-राजनीतिक बदलाव का हिस्सा है। इराक से NATO का पलायन कोई छोटी खबर नहीं। सैकड़ों सैनिक, जो इराकी सेना को ट्रेनिंग देने के नाम पर तैनात थे, अब सुरक्षा कारणों से वापस बुलाए जा रहे हैं। ईरान समर्थित प्रतिरोध गुटों के हमलों ने अमेरिकी और NATO ठिकानों को निशाना बनाया। इराक अब धीरे-धीरे विदेशी सैन्य उपस्थिति से मुक्त हो रहा है—जिसे कई लोग ईरान की मिसाइल शक्ति का परिणाम मान रहे हैं।
ट्रंप का “रेजीम चेंज” सपना भी धराशायी होता दिख रहा है। शुरू में वे कहते थे कि बमबारी के बाद ईरानी लोग विद्रोह कर देंगे। लेकिन ईरान ने न सिर्फ टिका, बल्कि जवाबी हमलों से क्षेत्र को अस्थिर कर दिया। अब ट्रंप “प्रोडक्टिव टॉक्स” की बात कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि ईरान से बातचीत हो रही है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जल्द खुल सकता है। लेकिन तेहरान इन बातों को सिरे से खारिज कर रहा है। ईरान कह रहा है कि कोई बातचीत नहीं हो रही और ट्रंप की धमकियां “धोखा” हैं।
मध्य पूर्व में अमेरिकी प्रभुत्व की नींव हिल रही है। सीरिया में जोलानी सरकार अब अमेरिका के लिए आखिरी सहारा बची है, लेकिन वहां भी दबाव बढ़ रहा है। पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की जैसे देश मध्यस्थता की पेशकश कर रहे हैं। तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। भारत जैसे देशों के लिए भी यह चिंता का विषय है—हमारा ऊर्जा आयात और क्षेत्रीय सुरक्षा इससे जुड़ी हुई है।
ट्रंप का यह बयान उनकी “युद्ध-उन्मादी” छवि को और उजागर करता है। वे खुद को मजबूत नेता बताते हैं, लेकिन जब नतीजे अनुकूल नहीं होते, तो दोष अपने ही मंत्रिमंडल पर डाल देते हैं। हेगसेथ को “सेक्रेटरी ऑफ वॉर” कहकर पुकारने वाले ट्रंप अब उन्हें ही युद्ध शुरू करने का श्रेय दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे “स्केपगोट” रणनीति बता रहे हैं—असफलता का बोझ दूसरे के कंधों पर लादना।
पूरी दुनिया देख रही है कि मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन बदल रहा है। ईरान ने साबित किया कि वह अकेले खड़ा हो सकता है। इराक में विदेशी सेनाओं का पलायन उसकी मिसाइल शक्ति और प्रतिरोध नेटवर्क की जीत है। ट्रंप का “मैंने शुरू नहीं किया” कहना इस तथ्य को नहीं बदल सकता कि अभियान उनके आदेश पर शुरू हुआ था।
अब सवाल यह है—क्या ट्रंप वाकई युद्ध समाप्त करना चाहते हैं, या यह सिर्फ घरेलू राजनीति के लिए दोषारोपण का खेल है? क्या हेगसेथ इस आरोप को चुपचाप स्वीकार करेंगे, या प्रशासन के अंदर दरार और गहरी होगी?
एक बात निश्चित है—ट्रंप का युद्ध-उन्माद मध्य पूर्व को नया रूप दे रहा है। जहां वे सत्ता परिवर्तन लाना चाहते थे, वहां खुद की नीतियां उल्टी पड़ रही हैं। इराक आजाद होने की राह पर है, NATO भाग रहा है, और ईरान मजबूती से खड़ा है। ट्रंप का दोषारोपण इस सच्चाई को छिपा नहीं सकता।
यह युद्ध न सिर्फ सैन्य है, बल्कि नैतिक और राजनीतिक भी। जब नेता अपनी गलतियों का जिम्मेदार दूसरे पर डालते हैं, तो इतिहास उन्हें याद रखता है—न कि उनके बहानों को। ट्रंप का यह बयान उसी इतिहास का एक और अध्याय है, जहां युद्ध शुरू करने वाले बाद में “मैंने नहीं किया” कहकर बच निकलने की कोशिश करते हैं।
मध्य पूर्व अब बदल रहा है। अमेरिकी साम्राज्यवाद का सूर्यास्त हो रहा है। ट्रंप चाहे जितना दोषारोपण करें, हकीकत यही है कि इस युद्ध की शुरुआत उनके फैसले से हुई और अब इसका खामियाजा पूरा क्षेत्र भुगत रहा है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 24,2026