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नई दिल्ली, 24 मार्च 2026– मध्य पूर्व में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक दिया है। ईरान की मिसाइलें और ड्रोन हमले जारी हैं, होर्मुज स्ट्रेट पर खतरा मंडरा रहा है और हवाई क्षेत्र लगभग बंद हो चुके हैं। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता उन लाखों-करोड़ों विदेशी नागरिकों की है जो खाड़ी देशों, इजरायल, ईरान और आसपास के इलाकों में काम कर रहे हैं।
भारत के करीब 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय नागरिक मध्य पूर्व में रहते और काम करते हैं। यह संख्या इजरायल की कुल आबादी (लगभग 95 लाख) से भी ज्यादा है। अगर संघर्ष और बढ़ा तो इन करोड़ों लोगों का भविष्य क्या होगा? क्या भारत इजरायल जितने या उससे ज्यादा नागरिकों को सुरक्षित निकाल पाएगा? और दूसरे देशों (पाकिस्तान, फिलीपींस, बांग्लादेश, नेपाल आदि) के करोड़ों मजदूरों का क्या होगा?
मध्य पूर्व में विदेशी नागरिकों की भारी संख्या मध्य पूर्व, खासकर गल्फ देश (UAE, सऊदी अरब, कुवैत, कतर, ओमान, बहरीन) में विदेशी मजदूरों की संख्या बहुत बड़ी है। अनुमान के मुताबिक:
- भारत: 90 लाख से 1 करोड़ से ज्यादा (UAE में 35-42 लाख, सऊदी में 27 लाख, कुवैत-कतर-ओमान में बाकी)।
- पाकिस्तान: 30-40 लाख।
- फिलीपींस: 10-15 लाख।
- बांग्लादेश, नेपाल, इंडोनेशिया, श्रीलंका: कुल मिलाकर 50-60 लाख।
- कुल विदेशी मजदूर: 3.5 से 4 करोड़ के आसपास।
ये लोग मुख्य रूप से निर्माण, तेल उद्योग, स्वास्थ्य सेवा, घरेलू काम और सेवा क्षेत्र में काम करते हैं। गल्फ अर्थव्यवस्थाएं इन पर निर्भर हैं।
इजरायल में भी करीब 18-20 हजार भारतीय हैं (छात्र, व्यावसायी और कार्यकर्ता)। ईरान में कुछ हजार भारतीय छात्र और कर्मचारी हैं।
अगर हमले जारी रहे तो क्या होगा? युद्ध बढ़ने पर सबसे बड़ा खतरा **होर्मुज स्ट्रेट** बंद होने, हवाई क्षेत्र बंद होने और हवाई हमलों से है।
- तत्काल खतरा: मिसाइल-ड्रोन हमलों में नागरिक इलाके प्रभावित हो सकते हैं। पहले ही कुछ विदेशी मजदूरों (पाकिस्तानी, फिलीपींस आदि) की मौत की खबरें आई हैं।
- लंबा संघर्ष: हवाई क्षेत्र बंद, बंदरगाह प्रभावित, सप्लाई चेन टूटना – इससे रोजगार प्रभावित होगा। कंपनियां काम बंद कर सकती हैं।
- काफाला सिस्टम: गल्फ में मजदूरों का वीजा नियोक्ता पर निर्भर होता है। युद्ध में नियोक्ता भाग जाएं या कंपनी बंद हो तो मजदूर फंस सकते हैं।
भारत के लिए चुनौती: इजरायल जितने या उससे ज्यादा रेस्क्यू संभव? भारत पहले ही **ऑपरेशन सिंधु** (ईरान से) और अन्य ऑपरेशनों के तहत हजारों भारतीयों को निकाल चुका है। अब तक 2 लाख से ज्यादा भारतीय गल्फ से लौट चुके हैं। लेकिन पूरे 1 करोड़ को निकालना लगभग असंभव है।
- लॉजिस्टिकल असंभव: इतने बड़े पैमाने पर हवाई जहाज, जहाज और लैंड रूट की व्यवस्था करना मुश्किल। हवाई क्षेत्र बंद होने पर लैंड रूट (जॉर्डन, आर्मेनिया आदि) पर निर्भर रहना पड़ेगा।
- आर्थिक प्रभाव: गल्फ से आने वाली रेमिटेंस (हर साल 3.7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा) बंद हो जाएगी। भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा झटका।
- व्यावहारिकता: ज्यादातर भारतीय मजदूर वहां स्थायी रूप से बस चुके हैं। वे तुरंत नहीं लौटना चाहते। सरकार ने सलाह दी है कि जरूरी न हो तो न लौटें।
भारत ने पहले ही हेल्पलाइन, काउंसलर टीमें और वैकल्पिक रूट (समुद्री या लैंड) तैयार किए हैं। लेकिन पूर्ण निकासी की बजाय चरणबद्ध और जरूरी मामलों में रेस्क्यू पर फोकस है। लेकिन हेल्पलाइन नंबर पर कोई रिस्पॉन्स नही मिलता सिर्फ सुरक्षित रहो इतना ही जवाब मिलता हे एसा अभी बहरीन से आए बडोदा के प्रवासी ने कहा!
दूसरे देशों के नागरिकों का भविष्य?
- पाकिस्तान: 30-40 लाख। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था रेमिटेंस पर निर्भर है। निकासी क्षमता भारत से कम।
- फिलीपींस: 10-15 लाख। फिलीपींस सरकार ने पहले ही शेल्टर-इन-प्लेस और निकासी प्लान तैयार किए हैं।
- बांग्लादेश, नेपाल: लाखों मजदूर। इन देशों की क्षमता सीमित है।
- पश्चिमी देश (अमेरिका, यूरोप): अपनी नागरिकों को पहले निकाल रहे हैं। अमेरिका ने चार्टर फ्लाइट्स और सैन्य मदद शुरू की है।
कुल मिलाकर 3.5-4 करोड़ विदेशी नागरिकों को निकालना किसी भी देश के लिए असंभव है। ज्यादातर सरकारें शेल्टर-इन-प्लेस, काउंसलर मदद और आंशिक निकासी पर जोर दे रही हैं।
भारत की तैयारी और भविष्य की रणनीति भारत सरकार ने स्थिति पर नजर रखी हुई है। विदेश मंत्रालय, MEA की हेल्पलाइन और भारतीय दूतावास सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
संभावित परिदृश्य:
- छोटे पैमाने पर निकासी जारी रहेगी (जो जरूरी हो)।
- वैकल्पिक रूट (समुद्री, थर्ड कंट्री via) का इस्तेमाल।
- गल्फ देशों के साथ कूटनीतिक संपर्क बढ़ाना ताकि मजदूरों को सुरक्षित रखा जा सके।
- अगर युद्ध लंबा चला तो रेमिटेंस घटेगा, लेकिन पूर्ण निकासी नहीं होगी।
मध्य पूर्व में अगर अमेरिका-इजरायल के हमले और ईरान के जवाबी हमले जारी रहे तो करोड़ों विदेशी नागरिकों का भविष्य अनिश्चित हो जाएगा। भारत के लिए 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती है, लेकिन इजरायल जितनी (या उससे ज्यादा) पूर्ण निकासी व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
अन्य देश भी इसी दबाव में हैं। समाधान कूटनीति, संयम और शांति वार्ता में है। फिलहाल सरकारें नागरिकों को सतर्क रहने, सुरक्षित स्थानों में रहने और जरूरी मामलों में ही निकासी की सलाह दे रही हैं।
यह संकट न सिर्फ मानवीय है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, रेमिटेंस और श्रम बाजार के लिए भी बड़ा खतरा है। भारत समेत सभी प्रभावित देशों को मिलकर काम करना होगा ताकि लाखों परिवारों का भविष्य सुरक्षित रहे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 24,2026