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Tuesday, 24 March 2026

मध्य पूर्व में अमेरिकी साम्राज्यवाद का सूर्यास्त: इराक से NATO की भागदौड़ और ईरान की मिसाइलें जो इतिहास बदल रही हैं

मध्य पूर्व में अमेरिकी साम्राज्यवाद का सूर्यास्त: इराक से NATO की भागदौड़ और ईरान की मिसाइलें जो इतिहास बदल रही हैं
-Friday World March 24,2026 
दुनिया के नक्शे पर एक नया अध्याय लिखा जा रहा है। मार्च 2026 के इस हफ्ते, जब NATO ने इराक से अपनी सारी सैन्य सलाहकार मिशन को यूरोप (मुख्यतः इटली के नेपल्स) में स्थानांतरित कर दिया, तो यह कोई साधारण “समायोजन” नहीं था—यह मध्य पूर्व से अमेरिकी प्रभुत्व के अंत की शुरुआत का स्पष्ट संकेत था। सैकड़ों NATO सैनिक, जो इराकी सेना को प्रशिक्षित करने के नाम पर बगदाद के आसपास तैनात थे, अब भाग रहे हैं। कारण? ईरान की मजबूत मिसाइल शक्ति और क्षेत्रीय प्रतिरोध गुटों के हमले, जो ट्रंप प्रशासन के “ईरान में सत्ता परिवर्तन” के सपने को चूर-चूर कर रहे हैं। 

ट्रंप ने फरवरी 2026 में इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर बड़े हमले शुरू किए थे। मकसद साफ था—परमाणु कार्यक्रम खत्म करना, खामेनेई की हत्या और अंततः तेहरान में एक नया, अमेरिका-समर्थित शासन स्थापित करना। उन्होंने खुलेआम कहा था, “ईरान के लोग उठो और अपनी सरकार ले लो।” लेकिन ईरान ने जवाब दिया—न सिर्फ अपनी मिसाइलों से, बल्कि इराक, सीरिया और लेबनान में फैले प्रतिरोध नेटवर्क के जरिए। नतीजा? इराक में अमेरिकी और NATO ठिकानों पर लगातार ड्रोन-मिसाइल हमले। “इस्लामिक रेसिस्टेंस इन इराक” जैसे गुटों ने सैकड़ों हमले किए, जिसके बाद NATO को 24 घंटे का “ट्रूस” मांगना पड़ा ताकि उनके सैनिक सुरक्षित निकल सकें।

 यह दृश्य 2003 के इराक आक्रमण की याद दिलाता है, जब अमेरिका “मुक्ति” के नाम पर कब्जा करने आया था। आज वही अमेरिका और उसके सहयोगी “सुरक्षा” के बहाने भाग रहे हैं। NATO का आधिकारिक बयान “समायोजन” और “अस्थायी स्थानांतरण” कहता है, लेकिन हकीकत अलग है। इराकी सुरक्षा सूत्रों और प्रतिरोध गुटों के अनुसार, यह मजबूरी थी। ईरान ने अपनी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता का प्रदर्शन किया—जो न सिर्फ इजराइल और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रही है, बल्कि इराक को भी “आजाद” करा रही है। इराक अब धीरे-धीरे विदेशी सैन्य ठिकानों से खाली हो रहा है, और यह बदलाव क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को हमेशा के लिए बदल रहा है। 

ट्रंप का ईरान अभियान शुरू से ही विवादास्पद था। उन्होंने “रेजीम चेंज” को अपना लक्ष्य बनाया, लेकिन ईरान की कठोर प्रतिरोध क्षमता ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर किया। मार्च 2026 तक ट्रंप खुद “ऑपरेशन विंड डाउन” की बात कर रहे हैं। उनका सपना कि बमबारी के बाद ईरानी लोग विद्रोह कर देंगे, धराशायी हो गया। इसके बजाय, ईरान ने दिखाया कि वह न सिर्फ टिक सकता है, बल्कि अपने पड़ोसियों को भी प्रभावित कर सकता है। इराक में NATO का पलायन इसी का परिणाम है। 

अब नजर सीरिया पर। मध्य पूर्व में अमेरिका का आखिरी बड़ा ठिकाना वहां बचा है—जहां अहमद अल-शरआ (जिन्हें पहले अबू मोहम्मद अल-जोलानी के नाम से जाना जाता था) की सरकार चल रही है। 2024 में असद शासन के पतन के बाद जोलानी ने सत्ता संभाली। शुरू में वे अल-कायदा से जुड़े रहे, लेकिन अब वे अमेरिका के साथ “साझेदारी” कर रहे हैं। अमेरिका ने सीरिया से भी अपनी सेना निकालनी शुरू कर दी है—अल-तानफ, कासरक और अन्य बेस से सैनिक वापस बुलाए जा रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स कहती हैं कि पूर्ण निकासी कुछ हफ्तों में हो सकती है। 

जोलानी वाला सीरिया आज अमेरिका के लिए “आखिरी सहारा” जैसा है। लेकिन क्या यह टिक पाएगा? ईरान और उसके सहयोगी गुट पहले से ही क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगर इराक से NATO गया, तो सीरिया में भी दबाव बढ़ेगा। जोलानी सरकार को एक तरफ कुर्दों, द्रूज और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ संतुलन बनाना है, दूसरी तरफ तुर्की और इजराइल के हस्तक्षेप से निपटना है। अमेरिका का समर्थन कम होता जा रहा है, तो क्या सीरिया अगला “मुक्त” देश बनेगा—या फिर क्षेत्रीय शक्तियों का नया मैदान?

 यह घटनाक्रम सिर्फ सैन्य नहीं, भू-राजनीतिक भी है। मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति (कुवैत, सऊदी, कतर, जॉर्डन आदि में 40-50 हजार सैनिक) अब कमजोर पड़ रही है। ईरान की मिसाइलें और प्रतिरोध नेटवर्क ने साबित कर दिया कि “अजेय” अमेरिका अब इतना अजेय नहीं रहा। तेल मार्ग, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता सब प्रभावित हो रहे हैं। भारत जैसे देशों के लिए भी यह मायने रखता है—क्योंकि हमारा ऊर्जा आयात और क्षेत्रीय सुरक्षा इससे जुड़ी हुई है। 

ट्रंप का “अमेरिका फर्स्ट” नारा अब मध्य पूर्व में उल्टा पड़ रहा है। जहां वे सत्ता परिवर्तन लाना चाहते थे, वहां खुद की सेनाएं भाग रही हैं। ईरान ने न सिर्फ अपनी रक्षा की, बल्कि इराक को भी विदेशी कब्जे से मुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं—यह वास्तविकता है जो Reuters, CBS, Al Jazeera और अन्य विश्वसनीय स्रोतों से सामने आ रही है। 

भविष्य क्या होगा? अगर NATO और अमेरिका का इराक से पूर्ण पलायन होता है, तो मध्य पूर्व में नई शक्ति व्यवस्था उभरेगी—जिसमें ईरान, सऊदी और अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ी ज्यादा निर्णायक भूमिका निभाएंगे। सीरिया में जोलानी सरकार को चुनौतियां बढ़ेंगी। लेकिन एक बात साफ है: अमेरिकी साम्राज्यवाद का लंबा दौर अब ढलान पर है। इराक से NATO की भागदौड़ उस ढलान की शुरुआत है। 

ईरान की मिसाइलें न सिर्फ ठिकानों को निशाना बना रही हैं, बल्कि एक पुरानी व्यवस्था को भी तोड़ रही हैं। मध्य पूर्व अब बदल रहा है—और यह बदलाव इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा। क्या अमेरिका सीरिया में भी अपना अंतिम मोहरा गंवा देगा? समय बताएगा। लेकिन आज इराक आजाद होने की राह पर है, और दुनिया देख रही है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 24,2026