-Friday World March 20,2026
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फरवरी 2026 के अंत में ईरान पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया था, जिसे 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' या इसी तरह के नाम से जाना गया। इस युद्ध की शुरुआत में अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त रूप से ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या कर दी, साथ ही टॉप कमांडरों और कई उच्च पदाधिकारियों को निशाना बनाया। ट्रंप का दावा था कि यह हमला ईरान की न्यूक्लियर महत्वाकांक्षा को कुचलने और सत्ता परिवर्तन लाने के लिए है। उन्होंने बार-बार कहा था कि ईरानी जनता अपनी सरकार से नाराज है और हमले के बाद विद्रोह कर देगी। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट निकली।
युद्ध शुरू हुए अभी सिर्फ 10-11 दिन ही हुए थे (28 फरवरी 2026 से शुरू), लेकिन ट्रंप अब खुद समाधान और डी-एस्केलेशन के रास्ते तलाश रहे हैं। उनके सलाहकारों ने चेतावनी दी है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचा तो अमेरिका को आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक रूप से भारी नुकसान होगा। वॉल स्ट्रीट जर्नल और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप के करीबी सलाहकार अब 'एग्जिट प्लान' की बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि युद्ध से कोई स्पष्ट आर्थिक या सैन्य लाभ नहीं मिल रहा है, बल्कि तेल-गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, जो अमेरिकी जनता को परेशान कर रही हैं।
अमेरिका के बैकफुट पर आने के प्रमुख 4 कारण
1. **सत्ता परिवर्तन का प्लान फेल**: ट्रंप ने युद्ध की शुरुआत में खामेनेई की हत्या और टॉप-40 कमांडरों को मार गिराने का दावा किया था। उनका मानना था कि इससे ईरान में अराजकता फैलेगी और जनता सड़कों पर उतर आएगी। लेकिन ईरानी जनता ने खामेनेई की मौत पर शोक मनाया, विरोध नहीं किया। एसोसिएटेड प्रेस और अन्य रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईरान की जनता अमेरिकी हमलों के खिलाफ एकजुट हो गई है। नया सुप्रीम लीडर और सरकार मजबूती से टिकी हुई है। ट्रंप का 'रिजीम चेंज' का सपना चूर-चूर हो गया।
2. **अमेरिकी जनता का विरोध**: क्विनिपियाक यूनिवर्सिटी के सर्वे के मुताबिक, 53% अमेरिकी नागरिक ईरान पर हमले के खिलाफ हैं। 44% का मानना है कि अमेरिका इजराइल का अंधा समर्थन कर रहा है। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी स्वीकार किया कि इजराइल के कारण ही यह युद्ध शुरू हुआ। जनता में गुस्सा बढ़ रहा है, क्योंकि गैस की कीमतें बढ़ रही हैं और अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ रहा है।
3. **भारी आर्थिक खर्च**: युद्ध के पहले 10 दिनों में अमेरिका ने 10 बिलियन डॉलर (करीब 85,000 करोड़ रुपये) से ज्यादा खर्च कर दिए हैं। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती दो दिनों में ही 5.6 बिलियन डॉलर का गोला-बारूद इस्तेमाल हुआ। तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गई हैं, यूरोप में गैस की कीमतें 24-35% तक बढ़ी हैं। ट्रंप को लग रहा है कि यह युद्ध 'क्विक विक्ट्री' नहीं रहा, बल्कि लंबा संकट बन गया है।
4. **राजनीतिक दबाव और मिडटर्म चुनाव**: 2026 में अमेरिका में मिडटर्म चुनाव होने हैं (3 नवंबर 2026 को)। रिपब्लिकन पार्टी के कोर वोटर और कई सांसद अब ट्रंप के खिलाफ हैं। सलाहकारों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा चला तो पार्टी को भारी नुकसान होगा। ट्रंप के कई सलाहकार अब डी-एस्केलेशन की बात कर रहे हैं, ताकि चुनावों से पहले स्थिति संभाली जा सके। ट्रंप खुद मिक्स्ड मैसेज दे रहे हैं – कभी कहते हैं युद्ध 'जल्द खत्म' हो जाएगा, कभी धमकी देते हैं कि और सख्ती होगी।
ईरान का प्रहार और ट्रंप का बैकफुट ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कहा है कि अमेरिका का प्लान पूरी तरह फेल हो गया है। उन्होंने कहा, "ट्रंप को भ्रम था कि हमला होते ही सत्ता पलट जाएगी, लेकिन वे फेल हो गए। अब उन्हें अपनी सत्ता बचाने की चिंता सता रही है।" ईरान ने जवाबी हमलों में इजराइल और अमेरिकी बेस पर प्रहार किए, साथ ही ऊर्जा साइट्स पर हमले किए, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया। ट्रंप अब इजराइल को चेतावनी दे रहे हैं कि तेल-गैस साइट्स पर हमले न दोहराए जाएं।
ट्रंप ने जापान के पीएम से मुलाकात में कहा कि वे ग्राउंड ट्रूप्स नहीं भेजेंगे और आर्थिक प्रभाव को 'जितना सोचा था उससे कम' बता रहे हैं। लेकिन अंदरूनी रिपोर्ट्स बताती हैं कि उनके सलाहकार 'बायर्स रिमोर्स' महसूस कर रहे हैं। कई अधिकारी मानते हैं कि ईरान को अंडरएस्टिमेट किया गया था। ईरान लंबी लड़ाई के लिए तैयार है और कोई सीजफायर की गुहार नहीं लगा रहा।
ट्रंप की गलती और वैश्विक प्रभाव ट्रंप का यह युद्ध 'क्विक एंड डिसिसिव' होने की बजाय एक लंबे संकट में बदल गया है। अमेरिका अब डी-एस्केलेशन के रास्ते तलाश रहा है, लेकिन ईरान पीछे नहीं हट रहा। यह युद्ध न सिर्फ मध्य पूर्व को अस्थिर कर रहा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका दे रहा है। तेल-गैस की कीमतें बढ़ने से भारत जैसे देशों पर भी असर पड़ रहा है।
ट्रंप की यह 'बड़ी गलती' अब उनकी राजनीतिक विरासत पर सवाल उठा रही है। अमेरिकी जनता नाराज है, पार्टी में बगावत की आशंका है और मिडटर्म चुनावों में रिपब्लिकन्स को बड़ा झटका लग सकता है। दुनिया देख रही है कि कैसे एक 'तेज जीत' का सपना अब 'समाधान की तलाश' में बदल गया है। क्या ट्रंप इस जाल से निकल पाएंगे? समय बताएगा, लेकिन फिलहाल युद्ध का बोझ अमेरिका पर भारी पड़ रहा है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 20,2026