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वाशिंगटन/कुवैत सिटी, 15 अप्रैल 2026 – कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) ने कुवैत की सरकार से मांग की है कि अमेरिकी-कुवैती पत्रकार अहमद शिहाब एल-दीन को तुरंत और बिना शर्त रिहा किया जाए। मार्च की शुरुआत से हिरासत में रखे गए इस पत्रकार पर सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध से जुड़ी जानकारी साझा करने का आरोप लगाया गया है। सीपीजे की क्षेत्रीय निदेशक सारा कुदाह ने कहा, “पत्रकारिता अपराध नहीं है। अहमद शिहाब एल-दीन की हिरासत राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों का दुरुपयोग करके स्वतंत्र आवाजों को दबाने का प्रतीक है।”
यह घटना केवल एक पत्रकार की हिरासत तक सीमित नहीं है। अमेरिका-इजरायल के ईरान के खिलाफ चल रहे युद्ध ने पूरे पश्चिम एशिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिए हैं। खाड़ी देशों में राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो शेयरिंग और युद्ध संबंधी रिपोर्टिंग पर सख्त निगरानी और सेंसरशिप बढ़ गई है।
अहमद शिहाब एल-दीन कौन हैं और क्या हुआ?
अहमद शिहाब एल-दीन एक पुरस्कार विजेता पत्रकार हैं, जिन्होंने वाइस, हफपोस्ट, अल जजीरा और अन्य प्रमुख मीडिया संस्थानों के लिए काम किया है। वे अमेरिकी नागरिक भी हैं और कुवैत में परिवार से मिलने गए थे। 2 मार्च 2026 को उन्होंने अपने सबस्टैक अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें अमेरिकी F-15 फाइटर जेट के कुवैत शहर के पास क्रैश होने का दृश्य था। यह वीडियो CNN सहित अन्य स्रोतों से लिया गया था और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध था।
इसके कुछ ही दिन बाद, 3 मार्च को उन्हें कुवैत की सुरक्षा एजेंसियों ने हिरासत में ले लिया। छह सप्ताह बीत चुके हैं, लेकिन उनके खिलाफ सटीक आरोप अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। समझा जाता है कि उन पर “झूठी जानकारी फैलाने”, “राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने” और “मोबाइल फोन के दुरुपयोग” जैसे अस्पष्ट और व्यापक आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों में अधिकतम 10 साल तक की सजा हो सकती है।
सीपीजे ने कहा कि अहमद की आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट 2 मार्च की थी, उसके बाद वे ऑनलाइन या सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए। उनके वकील को भी सीमित पहुंच दी गई है।
ईरान युद्ध ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाया प्रतिबंध
अमेरिका-इजरायल के ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू होने के बाद पूरे क्षेत्र में प्रेस फ्रीडम पर सख्ती बढ़ गई है। कुवैत सहित कई खाड़ी देशों ने युद्ध संबंधी कोई भी सामग्री शेयर करने, वीडियो रिकॉर्ड करने या रिपोर्टिंग करने पर सख्त चेतावनी जारी की है।
- कुवैत की आंतरिक मंत्रालय ने युद्ध से जुड़ी किसी भी तस्वीर या वीडियो को शेयर करने पर पाबंदी लगा दी।
- राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों का इस्तेमाल स्वतंत्र पत्रकारों और सोशल मीडिया यूजर्स को चुप कराने के लिए किया जा रहा है।
- सीपीजे के अनुसार, यह मामला क्षेत्र में बढ़ती सेंसरशिप का हिस्सा है, जहां “राष्ट्रीय सुरक्षा” का बहाना बनाकर स्वतंत्र आवाजों को दबाया जा रहा है।
अहमद शिहाब एल-दीन का मामला इस व्यापक प्रवृत्ति का प्रतीक बन गया है। उन्होंने युद्ध के दौरान सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी शेयर की थी, फिर भी उन्हें हिरासत में लिया गया।
खाड़ी देशों में बढ़ती सेंसरशिप की पृष्ठभूमि
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के कई देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध कड़े हो गए हैं।
- सोशल मीडिया पर युद्ध संबंधी कोई भी पोस्ट, विश्लेषण या वीडियो शेयर करना जोखिम भरा हो गया है।
- कई पत्रकारों और नागरिकों को “झूठी खबर फैलाने” या “राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा” जैसे आरोपों में गिरफ्तार किया गया है।
- सीपीजे और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि युद्ध का बहाना बनाकर प्रेस फ्रीडम को कुचला जा रहा है।
अहमद का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे कुवैत-अमेरिका दोनों के नागरिक हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने-माने पत्रकार हैं। उनकी हिरासत ने अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी सवाल उठाए हैं।
सीपीजे की मांग और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
सीपीजे की क्षेत्रीय निदेशक सारा कुदाह ने स्पष्ट कहा, “हम कुवैत से मांग करते हैं कि अहमद शिहाब एल-दीन को तुरंत रिहा किया जाए और उन पर लगे सभी आरोप हटा दिए जाएं। पत्रकारिता अपराध नहीं है।”
अन्य मानवाधिकार संगठनों और पत्रकारों ने भी इस मामले में आवाज उठाई है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कुवैत जैसे अमेरिका के करीबी सहयोगी देश में इस तरह की हिरासत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक संकेत है।
निष्कर्ष: युद्ध का असर अभिव्यक्ति पर
ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध ने न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी गंभीर चुनौती दी है। कुवैत में अहमद शिहाब एल-दीन की हिरासत इस बात का प्रमाण है कि युद्ध के दौरान कई देश “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर स्वतंत्र पत्रकारिता को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।
सीपीजे की मांग है कि कुवैत तुरंत कार्रवाई करे और अहमद को रिहा करे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी इस मामले पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि आज एक पत्रकार की हिरासत कल पूरे क्षेत्र में प्रेस फ्रीडम के लिए खतरा बन सकती है।
युद्ध की छाया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना न केवल पत्रकारों का अधिकार है, बल्कि लोकतंत्र और पारदर्शिता की रक्षा भी है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 15,2026