ठेकेदार की शिकायत के बाद विजिलेंस जांच में खुलासा - पत्नी के नाम 120 कट्ठा जमीन, खातों में लाखों का लेनदेन
छपरा/पटना। बिहार में सरकारी नौकरी का क्रेज़ किसी से छुपा नहीं है। स्टेबिलिटी, सम्मान और सुविधाओं के लिए लाखों युवा BPSC, SSC की तैयारी में सालों खपा देते हैं। मगर जब उसी कुर्सी पर बैठा अफसर 33 महीने में करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन जाए, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे सिस्टम पर उठते हैं।
सारण जिले के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) अजीत कुमार हरिजन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने एक बार फिर यही बहस छेड़ दी है। अप्रैल 2026 में एक ठेकेदार की शिकायत से शुरू हुआ यह मामला अब आय से अधिक संपत्ति, बेनामी जमीन और डिजिटल लेनदेन की जांच तक पहुंच गया है।
क्या है पूरा मामला?
शिकायतकर्ता रवि कुमार राम शिक्षा विभाग में ठेकेदारी का काम करते थे। उनकी मुलाकात DPO अजीत कुमार हरिजन से हुई। रवि के आरोप के मुताबिक, DPO ने उन्हें "जिला स्तर पर बड़ा काम" दिलाने का भरोसा दिया और बदले में 12.5 लाख रुपये की मांग की।
रवि का दावा है कि उन्होंने विश्वास करके तीन किस्तों में 10.70 लाख रुपये नकद दिए। इसके अलावा DPO के परिवार और रिश्तेदारों के मोबाइल नंबर/खातों पर 1.03 लाख रुपये डिजिटल तरीके से ट्रांसफर किए। काम न मिलने पर जब उन्होंने तकादा किया तो आरोप है कि DPO ने उन्हें ब्लैकलिस्ट करने की धमकी दी।
हताश होकर रवि ने जिला लोक शिकायत कोषांग में अप्रैल 2026 में शिकायत दर्ज कराई। यहीं से जांच का पहिया घूमा।
जांच रिपोर्ट ने चौंकाया
विजिलेंस की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में जो तथ्य सामने आए, वे हैरान करने वाले हैं:
1. 2.5 करोड़ की संपत्ति: मात्र 33 महीने की सेवा में DPO और उनके परिवार के पास 2.5 करोड़ रुपये से अधिक की चल-अचल संपत्ति मिली।
2. 120 कट्ठा जमीन: DPO की पत्नी पूजा कुमारी के नाम पर 41.5 लाख रुपये में 6 बीघा 9 कट्ठा 8 धूर जमीन खरीदी गई। यह जमीन भी सेवा के दौरान ही खरीदी गई।
3. बैंक खातों में संदिग्ध लेनदेन: DPO, उनकी पत्नी और रिश्तेदारों के खातों में बड़ी रकम का लेनदेन पाया गया। जांच एजेंसियों ने माना कि यह राशि उनकी ज्ञात आय के स्रोतों से मेल नहीं खाती।
4. डिजिटल सबूत: ठेकेदार रवि कुमार द्वारा किए गए 1.53 लाख रुपये के डिजिटल भुगतान का रिकॉर्ड भी जांच में सामने आया।
जांच अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि "अजीत कुमार हरिजन द्वारा आय से अधिक संपत्ति अर्जित की गई है"। इसके बाद DPO, उनकी पत्नी और परिवार के सदस्यों के नाम पर अन्य बैंकों में संचालित खातों और खरीदी गई जमीन की गहन जांच की अनुशंसा की गई है।
"ऊपर की कमाई" का कल्चर या सिस्टम की नाकामी?
बिहार में अक्सर कहा जाता है कि यहां सरकारी नौकरी का मतलब सिर्फ तनख्वाह नहीं, "ऊपर की कमाई" भी है। सारण DPO का यह कथित मामला इसी धारणा को हवा देता है।
मगर यहां दो पहलू हैं। पहला, अगर आरोप सही हैं तो यह सीधे-सीधे भ्रष्टाचार का मामला है। एक अधिकारी जिस पर जिले में ICDS जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी है, अगर वही कमीशनखोरी में लिप्त हो जाए तो योजनाओं का हाल क्या होगा, यह समझा जा सकता है।
दूसरा पहलू सिस्टम का है। ठेकेदार ने हिम्मत करके शिकायत की। लोक शिकायत कोषांग ने उसे सुना। विजिलेंस ने जांच की और प्रारंभिक सबूत जुटाए। इसका मतलब है कि सिस्टम में चेक एंड बैलेंस अभी जिंदा हैं। पिछले कुछ महीनों में ही बिहार में पंचायती राज पदाधिकारी 12 हजार रिश्वत लेते, ICDS DPO अनीता कुमारी 50 हजार लेते रंगे हाथ पकड़ी गईं। यानी कार्रवाई भी हो रही है।
हर सरकारी नौकरी एक जैसी नहीं
इस एक मामले से पूरी सरकारी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना गलत होगा। बिहार में ही हजारों शिक्षक, डॉक्टर, पुलिसकर्मी और क्लर्क सीमित संसाधनों में ईमानदारी से काम कर रहे हैं। चुनाव हो या बाढ़, सबसे पहले ड्यूटी सरकारी कर्मचारी की ही लगती है। छुट्टियां रद्द होती हैं, वेतन देर से आता है, फिर भी वे सिस्टम को चलाते हैं।
समस्या तब होती है जब एक भ्रष्ट अधिकारी की वजह से पूरी बिरादरी बदनाम होती है। जनता के मन में यह धारणा बैठ जाती है कि "बिना चढ़ावे के फाइल आगे नहीं बढ़ती"। इसका खामियाजा ईमानदार अफसरों को भी भुगतना पड़ता है।
आगे क्या?
फिलहाल यह मामला जांच के दायरे में है। विजिलेंस की टीम DPO के परिवार के बैंक खातों, संपत्ति के दस्तावेजों और बेनामी लेनदेन की तह तक जा रही है। अगर आरोप साबित होते हैं तो अजीत कुमार हरिजन के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलेगा। दोषी पाए जाने पर नौकरी से बर्खास्तगी के साथ-साथ जेल की सजा भी हो सकती है।
यहां यह याद रखना जरूरी है कि भारतीय कानून में "जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक आरोपी निर्दोष है" का सिद्धांत लागू होता है। इसलिए अंतिम फैसला कोर्ट का ही होगा।
सबक क्या है?
1. युवाओं के लिए: सरकारी नौकरी का मतलब सिर्फ "आराम और पैसा" नहीं है। यह जिम्मेदारी है। एक गलती पूरा करियर और इज्जत दोनों ले डूबती है। NPS के दौर में अब पुरानी पेंशन वाली "सुरक्षा" भी नहीं रही।
2. सिस्टम के लिए: शिकायत निवारण तंत्र को और मजबूत करना होगा। अगर रवि कुमार जैसे लोग आवाज नहीं उठाएंगे, तो भ्रष्टाचार का यह खेल चलता रहेगा। डिजिटल पेमेंट ने सबूत जुटाना आसान किया है, इसका इस्तेमाल बढ़ना चाहिए।
3. समाज के लिए: हमें "ऊपर की कमाई" को स्टेटस सिंबल मानना बंद करना होगा। जिस दिन समाज भ्रष्ट अफसर का सामाजिक बहिष्कार करने लगेगा, उस दिन कुर्सी पर बैठने वाला दस बार सोचेगा।
अंतिम बात
सरकारी नौकरी आज भी लाखों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है। यह स्टेबिलिटी देती है, सम्मान देती है। मगर जब उसी कुर्सी का इस्तेमाल निजी तिजोरी भरने के लिए हो, तो वह उम्मीद टूटती है। सारण DPO का मामला एक चेतावनी है - सिस्टम के लिए भी और उस कुर्सी का सपना देखने वाले हर युवा के लिए भी।
भ्रष्टाचार का कोई "कैडर" नहीं होता। न वो सिर्फ सरकारी है, न सिर्फ प्राइवेट। वो एक सोच है। और सोच बदलने की शुरुआत एक्सपोज़र से होती है, छुपाने से नहीं।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जांच रिपोर्ट और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। मामले में अंतिम निर्णय न्यायालय का होगा। किसी भी व्यक्ति को दोषी करार देने का उद्देश्य नहीं है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 29 Jun 2026