- Friday World 29 Jun 2026
ताइवान से अरुणाचल तक जमीन हड़पने की साजिश के बाद अब नदियों पर कब्जे की तैयारी, भारत के लिए क्यों है सबसे बड़ा खतरा?
ताइवान से अरुणाचल तक जमीन हड़पने की साजिश के बाद अब नदियों पर कब्जे की तैयारी, भारत के लिए क्यों है सबसे बड़ा खतरा?
नई दिल्ली। दुनिया के सामने खुद को "शांतिप्रिय सुपरपावर" बताने वाला चीन असल में अपने पड़ोसियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। ताइवान को धमकाना, दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बनाकर कब्जा जमाना, पूर्वी चीन सागर में जापान से उलझना और भारत के लद्दाख से अरुणाचल तक जमीन पर दावा ठोकना - ये ड्रैगन की पुरानी आदत है।
लेकिन अब खेल सिर्फ जमीन का नहीं रहा। भारत के जाने-माने रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और लेखक ब्रह्मा चेलानी ने चीन की सबसे खतरनाक चाल को लेकर नई चेतावनी दी है। चेलानी का कहना है कि तिब्बत पर कब्जे के बाद चीन अब "वॉटर वेपन" यानी पानी को हथियार बनाकर हिमालय के इस पार अपना दबदबा कायम करना चाहता है।
चीन की 'सलामी स्लाइसिंग' रणनीति क्या है?
चीन सीधे युद्ध नहीं करता। वो "सलामी स्लाइसिंग" करता है - मतलब सलामी की तरह टुकड़ा-टुकड़ा करके पड़ोसी का इलाका काटना।
1. ताइवान: हर हफ्ते फाइटर जेट भेजकर एयरस्पेस में घुसना। "वन चाइना" के नाम पर धमकी देना।
2. दक्षिण चीन सागर: 90% समुद्र पर "नाइन-डैश लाइन" खींचकर दावा। वहां रेत भरकर मिलिट्री बेस बना दिए। फिलीपींस, वियतनाम के मछुआरों को भगाता है।
3. भारत: 1962 में अक्साई चिन हड़पा। 2020 में गलवान में धोखे से हमला। अरुणाचल प्रदेश को "दक्षिण तिब्बत" बताकर नक्शे में शामिल करता है।
अब इस लिस्ट में नया हथियार जुड़ा है - पानी।
तिब्बत: चीन का 'वॉटर टावर' और भारत की चिंता
ब्रह्मा चेलानी सालों से कहते आ रहे हैं कि तिब्बत पर चीन का कब्जा सिर्फ जमीन का मसला नहीं है। तिब्बत का पठार एशिया का "वॉटर टावर" है। दुनिया की 10 बड़ी नदियां यहीं से निकलती हैं - ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज, मेकांग, यांग्त्ज़ी, येलो रिवर।
इनमें से ब्रह्मपुत्र और सतलुज सीधे भारत में आती हैं। ब्रह्मपुत्र अकेले भारत की 30% फ्रेशवाटर सप्लाई और 40% हाइड्रोपावर क्षमता देती है। असम और अरुणाचल की पूरी खेती-किसानी इसी पर टिकी है।
चीन ने तिब्बत में 1950 में कब्जा किया। उसके बाद से वो वहां 11 बड़े बांध बना चुका है। सबसे खतरनाक है "ग्रेट बेंड" पर बन रहा 60,000 मेगावाट का मेगा डैम। ये दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रो प्रोजेक्ट होगा - तीन गोर्जेस डैम से भी तीन गुना बड़ा।
"वॉटर बम' कैसे फटेगा?
चेलानी की चेतावनी के 3 मतलब हैं:
1. पानी रोक देना: चीन चाहे तो गर्मी में ब्रह्मपुत्र का पानी रोककर असम-अरुणाचल को सूखा दे सकता है। 2021 में चीन ने ब्रह्मपुत्र का डेटा देना बंद कर दिया था। बाढ़ का अलर्ट नहीं मिला तो नॉर्थ-ईस्ट में तबाही मच सकती है।
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2. अचानक पानी छोड़ना: मॉनसून में बिना बताए डैम से पानी छोड़ दे तो असम में "मानव-निर्मित सुनामी" आ जाएगी। 2000 में ऐसा हो चुका है जब अरुणाचल में अचानक बाढ़ से 30 लोग मरे थे।
3. पानी मोड़ देना: चीन "साउथ-नॉर्थ वॉटर डायवर्जन" प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। यानी ब्रह्मपुत्र का पानी मोड़कर अपने सूखे उत्तरी इलाकों में ले जाना। अगर ये हुआ तो भारत-बांग्लादेश रेगिस्तान बन जाएंगे।
यही है चीन की "वॉटर बम" कूटनीति। बिना गोली चलाए दुश्मन को घुटनों पर ला दो।
भारत के पास क्या विकल्प हैं?
भारत हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है।
1. अपने डैम: अरुणाचल में भारत 160 से ज्यादा हाइड्रो प्रोजेक्ट बना रहा है। मकसद है कि अगर चीन पानी रोके तो हमारा स्टोरेज काम आए। "अपर सियांग डैम" 11,000 मेगावाट का होगा - चीन के डैम का जवाब।
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2. कूटनीति: भारत ने 2002 में चीन से ब्रह्मपुत्र का डेटा शेयरिंग समझौता किया था। पर चीन भरोसेमंद नहीं है। अब भारत "इंटरनेशनल वॉटर लॉ" का हवाला देकर दबाव बना रहा है।
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3. मिलिट्री तैयारी: LAC पर 50,000 अतिरिक्त जवान, S-400 मिसाइल, राफेल की तैनाती। संदेश साफ है - पानी रोका तो जवाब सीमा पर मिलेगा।
सिर्फ भारत नहीं, पूरा एशिया परेशान
चीन की नदी वाली दादागिरी से 1.8 अरब लोग प्रभावित हैं। मेकांग नदी पर चीन के 11 डैम से थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम में सूखा पड़ता है। वियतनाम के "चावल के कटोरे" मेकांग डेल्टा में समुद्र का खारा पानी घुस रहा है क्योंकि नदी में फ्लो नहीं है।
यानी चीन ने तिब्बत को सिर्फ मिलिट्री बेस नहीं, "वॉटर बम" का ट्रिगर बना दिया है।
चेलानी क्यों बार-बार चेताते हैं?
ब्रह्मा चेलानी "वॉटर: एशियाज न्यू बैटलग्राउंड" किताब के लेखक हैं। उनका कहना है कि 21वीं सदी में लड़ाई तेल के लिए नहीं, पानी के लिए होगी। और चीन ने इसकी तैयारी 1950 से शुरू कर दी थी जब उसने तिब्बत हड़पा।
तिब्बत पर नियंत्रण = हिमालय पर नियंत्रण = एशिया की नदियों पर नियंत्रण। ये है चीन का "थ्री स्टेप प्लान"।
भारत के लिए सबक
1. जागना होगा: चीन की हरकतों को "बॉर्डर इश्यू" समझने की गलती अब नहीं चलेगी। ये इकोनॉमिक और इकोलॉजिकल वारफेयर है।
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2. स्पीड बढ़ानी होगी: चीन 5 साल में डैम बना देता है, हम 15 साल NGT क्लियरेंस में लगा देते हैं। अरुणाचल के प्रोजेक्ट तेज करने होंगे।
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3. दुनिया को बताना होगा: चीन पर्यावरण का दुश्मन है। तिब्बत में डैम से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, भूकंप का खतरा बढ़ रहा है। इसे ग्लोबल इश्यू बनाना होगा।
आखिरी बात
ड्रैगन सिर्फ जमीन नहीं हड़पता, वो हवा, पानी और डेटा भी हड़पना चाहता है। ताइवान पर फाइटर जेट, साउथ चाइना सी में जहाज, LAC पर सैनिक और तिब्बत में डैम - ये सब एक ही ग्रैंड स्ट्रैटेजी का हिस्सा हैं: "एशिया का बॉस बनना"।
ब्रह्मा चेलानी की चेतावनी को हल्के में लेना गलती होगी। क्योंकि जब पड़ोसी के पास आपकी नदियों का स्विच हो, तो आप कभी चैन से सो नहीं सकते।
भारत के पास दो रास्ते हैं - या तो चीन की दादागिरी सहते रहो, या फिर पानी से लेकर पहाड़ तक हर मोर्चे पर तैयारी करो। 2020 गलवान ने बता दिया कि ड्रैगन बातों से नहीं, सिर्फ ताकत की भाषा समझता है।
Sajjadali Nayani ✍
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