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Monday, 29 June 2026

"ग़ज़ा से ध्यान भटकाने की साजिश": तुर्किये ने आर्मेनियाई नरसंहार पर इज़राइल की मान्यता को बताया राजनीतिक कवर

"ग़ज़ा से ध्यान भटकाने की साजिश": तुर्किये ने आर्मेनियाई नरसंहार पर इज़राइल की मान्यता को बताया राजनीतिक कवर
-Friday World 29 Jun 2026
अंकारा और तेल अवीव के बीच कूटनीतिक तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। तुर्किये के विदेश मंत्रालय ने इज़राइल द्वारा आर्मेनियाई नरसंहार को आधिकारिक मान्यता देने के फैसले की तीखी निंदा की है। तुर्किये का सीधा आरोप है कि इज़राइल यह कदम ग़ज़ा में जारी अपने सैन्य अभियान और उससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय दबाव से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए उठा रहा है।  

तुर्किये का कड़ा बयान: "कानूनी और ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी"
तुर्की के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को जारी बयान में इज़राइली संसद के इस फैसले को "राजनीति से प्रेरित" करार दिया। मंत्रालय ने कहा कि यह निर्णय न केवल ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करता है बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांतों की भी अनदेखी करता है। तुर्किये 1915 की घटनाओं को "नरसंहार" मानने से लगातार इनकार करता रहा है। अंकारा का पक्ष है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उस्मान साम्राज्य में आर्मेनियाई लोगों की मौतें गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियों और अकाल का नतीजा थीं, न कि योजनाबद्ध नरसंहार।  

बयान में आगे कहा गया कि इज़राइल का यह कदम ऐसे समय आया है जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और कई वरिष्ठ इज़राइली अधिकारियों पर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में फ़िलिस्तीन में मानवता के विरुद्ध अपराधों के आरोपों को लेकर गिरफ़्तारी वारंट जारी हो चुके हैं। तुर्किये ने दावा किया कि तेल अवीव "पूरी दुनिया के सामने ग़ज़ा में किए जा रहे अपने नरसंहार" पर पर्दा डालने के लिए आर्मेनियाई मुद्दे का इस्तेमाल कर रहा है।  

ग़ज़ा का संदर्भ और बढ़ता कूटनीतिक दबाव
तुर्किये और इज़राइल के रिश्ते 7 अक्टूबर 2023 के बाद से लगातार बिगड़े हैं। ग़ज़ा में इज़राइली सैन्य कार्रवाई को लेकर तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन कई बार इज़राइल को "आतंकवादी देश" कह चुके हैं। अंकारा ने ग़ज़ा में तत्काल युद्धविराम की मांग की है और दक्षिण अफ्रीका द्वारा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में इज़राइल के खिलाफ दायर नरसंहार मामले का समर्थन भी किया है।  

तुर्की विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि इज़राइल की मौजूदा सरकार पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और कई मानवाधिकार संगठनों ने ग़ज़ा में नागरिकों की मौत पर चिंता जताई है। ऐसे में तुर्किये का मानना है कि आर्मेनियाई नरसंहार को मान्यता देना इज़राइल की एक "कूटनीतिक चाल" है ताकि वैश्विक नैरेटिव को बदला जा सके।  

"विस्तारवादी नीतियों" के खिलाफ मुहिम जारी रखने का संकल्प
बयान के अंत में तुर्किये ने स्पष्ट किया कि वह क्षेत्र में इज़राइल की "विस्तारवादी और अस्थिरता फैलाने वाली नीतियों" को समाप्त करने के लिए अपने प्रयास जारी रखेगा। अंकारा ने सीरिया, लेबनान और वेस्ट बैंक में इज़राइली कार्रवाइयों का भी हवाला दिया। तुर्किये का कहना है कि वह फ़िलिस्तीनी लोगों के अधिकारों की रक्षा और दो-राज्य समाधान के लिए क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करता रहेगा।  

आर्मेनियाई नरसंहार: विवाद का लंबा इतिहास
1915 से 1917 के बीच उस्मान साम्राज्य में अनुमानित 15 लाख आर्मेनियाई लोगों की मौत हुई थी। आर्मेनिया, फ्रांस, जर्मनी, रूस, कनाडा और अमेरिका समेत 30 से अधिक देश इसे नरसंहार मानते हैं। तुर्किये इस शब्दावली को खारिज करता है और मरने वालों की संख्या को भी कम बताता है। अंकारा का तर्क है कि दोनों तरफ के लोग मारे गए थे और इसे "त्रासदी" कहना उचित है, "नरसंहार" नहीं।  

इज़राइल ने दशकों तक इस मुद्दे पर तटस्थ रुख अपनाए रखा था। इसकी बड़ी वजह तुर्किये के साथ रणनीतिक और सैन्य संबंध थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, खासकर ग़ज़ा युद्ध के बाद, इज़राइली संसद में इसे मान्यता देने की मांग तेज हुई थी। अब इस मान्यता के बाद तुर्किये-इज़राइल रिश्तों में और कड़वाहट आना तय माना जा रहा है।  

क्षेत्रीय समीकरणों पर असर  
विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से मध्य पूर्व में पहले से तनावपूर्ण हालात और जटिल होंगे। तुर्किये नाटो का सदस्य है और क्षेत्र में अहम भूमिका निभाता है। इज़राइल के साथ व्यापारिक रिश्ते पहले ही लगभग ठप हैं। अंकारा ने 2024 में इज़राइल के साथ सभी व्यापारिक संबंध तोड़ दिए थे। अब कूटनीतिक स्तर पर भी दरार गहरी होने के आसार हैं।  

आर्मेनिया ने इज़राइल के फैसले का स्वागत किया है। आर्मेनियाई विदेश मंत्रालय ने कहा कि "ऐतिहासिक सच्चाई को स्वीकार करना भविष्य में ऐसे अपराधों को रोकने की दिशा में कदम है"।  

आगे क्या?
तुर्किये ने संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र और इस्लामिक सहयोग संगठन जैसे मंचों पर उठाएगा। साथ ही ग़ज़ा में युद्धविराम और मानवीय सहायता के लिए अपना दबाव बढ़ाएगा। दूसरी ओर इज़राइल ने अभी तक तुर्किये के बयान पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।  

यह घटनाक्रम बताता है कि ग़ज़ा युद्ध का असर अब सिर्फ इज़राइल-फ़िलिस्तीन तक सीमित नहीं है। यह दशकों पुराने ऐतिहासिक विवादों और कूटनीतिक गठबंधनों को भी नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। आने वाले दिनों में अंकारा और तेल अवीव के बीच बयानबाजी और तेज हो सकती है, जिसका असर पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर पड़ेगा।  

पृष्ठभूमि: तुर्किये-इज़राइल संबंधों का उतार चढ़ाव
1990 के दशक में दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग अपने चरम पर था। 2010 में ग़ज़ा जा रहे तुर्की के मावी मारमारा जहाज पर इज़राइली हमले के बाद रिश्ते खराब हुए। 2016 में संबंध सामान्य हुए, लेकिन 2018 में अमेरिकी दूतावास यरुशलम शिफ्ट होने पर फिर तनाव बढ़ा। 2022 में राजनयिक संबंध पूरी तरह बहाल हुए थे, मगर ग़ज़ा युद्ध ने फिर सब पलट दिया।  

तुर्किये का मौजूदा रुख घरेलू राजनीति से भी जुड़ा है। एर्दोगन की पार्टी को फ़िलिस्तीन मुद्दे पर कड़ा स्टैंड लेने से घरेलू समर्थन मिलता है। ऐसे में इज़राइल पर हमला बोलना अंकारा के लिए रणनीतिक और राजनीतिक दोनों रूप से फायदेमंद है।  

कुल मिलाकर, आर्मेनियाई नरसंहार पर इज़राइल की मान्यता ने एक नया कूटनीतिक मोर्चा खोल दिया है। यह सिर्फ इतिहास का सवाल नहीं रहा, बल्कि मौजूदा भू-राजनीति का सबसे गर्म मुद्दा बन गया है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 29 Jun 2026