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Saturday, 6 June 2026

: गुजरात की मिट्टी का वो सपूत जिसने बर्मा में खड़ा किया पेट्रोलियम और चावल का साम्राज्य — सर अब्दुल करीम अब्दुल शकूर जमाल, 'राइस किंग' और 'ऑयल किंग'

: गुजरात की मिट्टी का वो सपूत जिसने बर्मा में खड़ा किया पेट्रोलियम और चावल का साम्राज्य — सर अब्दुल करीम अब्दुल शकूर जमाल, 'राइस किंग' और 'ऑयल किंग'
-Friday World 6 Jun 2026
भारतीय व्यापार इतिहास में कई नाम चमकते हैं, लेकिन कुछ कहानियां इतनी प्रेरक और अनकही होती हैं कि उन्हें दोहराने की जरूरत पड़ती है। जब हम धीरूभाई अंबानी या अन्य आधुनिक उद्योगपतियों की बात करते हैं, तो अक्सर भूल जाते हैं कि 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में गुजरात की धरती ने एक ऐसे दूरदर्शी को जन्म दिया, जिसने विदेशी प्रभुत्व वाले युग में न केवल व्यापार साम्राज्य खड़ा किया, बल्कि राष्ट्रवाद की ज्वाला भी जलाए रखी। उनका नाम था — सर अब्दुल करीम अब्दुल शकूर जमाल, जिन्हें दुनिया 'किंग ऑफ राइस' और 'ऑयल किंग' के नाम से जानती थी।

जड़ें गुजरात में, उड़ान बर्मा में

1862 में काठियावाड़ (आधुनिक जामनगर, गुजरात) में जन्मे अब्दुल करीम जमाल मात्र छह वर्ष की उम्र में अपने पिता के साथ बर्मा (वर्तमान म्यांमार) के रंगून (यांगोन) चले गए। उस समय बर्मा ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था और व्यापारिक अवसरों से भरा पड़ा था। पारंपरिक इस्लामी शिक्षा के साथ-साथ रंगून कॉलेज में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा जमाल ने पिता की छोटी सी फर्म जमाल ब्रदर्स एंड कंपनी में काम शुरू किया।

जल्द ही उनकी व्यावसायिक कुशलता, मेहनत और दूरदर्शिता ने कंपनी को एक विशाल समूह में बदल दिया। चावल, कपास, रबर, चाय, चीनी, लकड़ी, खनन — लगभग हर क्षेत्र में उनकी उपस्थिति दर्ज हो गई। लेकिन चावल का कारोबार ही उनका सबसे बड़ा साम्राज्य साबित हुआ। बर्मा के उपजाऊ खेतों से चावल निर्यात करते हुए उन्होंने बाजार पर ऐसी पकड़ बनाई कि उन्हें "किंग ऑफ राइस' का खिताब मिल गया। उस दौर में एक भारतीय व्यापारी का इतना बड़ा वर्चस्व हासिल करना कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी।

 पेट्रोलियम क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम

चावल के बाद उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान पेट्रोलियम क्षेत्र में आया। उन्होंने **जमाल ऑयल कंपनी लिमिटेड** की स्थापना की, जो 1909 में **इंडो-बर्मा पेट्रोलियम कंपनी लिमिटेड (IBP)** के रूप में विकसित हुई। उस समय जब तेल व्यापार पर ब्रिटिश और अन्य विदेशी कंपनियों का पूरा दबदबा था, तब IBP ने भारतीय पूंजी और उद्यमिता की मजबूत पहचान स्थापित की। यह कंपनी बाद में भारतीय तेल उद्योग की नींव बनी और 2007 में **इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL)** में विलय हो गई — इस प्रकार एक शताब्दी से अधिक पुरानी विरासत आधुनिक भारत की सबसे बड़ी तेल कंपनी का हिस्सा बन गई।

सर जमाल केवल व्यापारी नहीं, बल्कि दूरदर्शी उद्यमी थे। उन्होंने कई क्षेत्रों में विविधीकरण किया, हजारों लोगों को रोजगार दिया और बर्मा के विभिन्न हिस्सों में अपने कारोबार फैलाए। उनकी कंपनियां न केवल मुनाफा कमाती थीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करती थीं।

 जमाल विला: शक्ति और राष्ट्रवाद का केंद्र

रंगून में उनका भव्य निवास जमाल विला सिर्फ एक महल नहीं था — यह सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक चर्चाओं का प्रमुख केंद्र था। यहां महात्मा गांधी, मौलाना मुहम्मद अली, मौलाना शौकत अली, आगा खान, रोमानिया के किंग कैरोल समेत अनेक भारतीय और विदेशी दिग्गज आते-जाते थे। ब्रिटिश अधिकारी, राजकुमार और स्वतंत्रता सेनानी — सभी यहां एक मंच पर मिलते थे।

जमाल विला राष्ट्रवाद की भावना से ओत-प्रोत था। सर जमाल ने स्वदेशी जहाजरानी को बढ़ावा दिया। 1921 में जब स्किंदिया स्टीमशिप कंपनी ने बर्मा के पानी में प्रवेश किया, तो सर जमाल ने ब्रिटिश शिपिंग कंपनियों को छोड़कर भारतीय कंपनी को समर्थन दिया। एक बार तो उन्होंने मात्र तीन दिनों में 6400 टन चावल भारतीय जहाजों से निर्यात किया। पूरे वर्ष में उन्होंने एक लाख टन चावल भारतीय जहाजों पर भेजा। ब्रिटिश सरकार ने धमकियां दीं, लेकिन सर जमाल अडिग रहे। अंततः ब्रिटिशों ने चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर उन्हें आर्थिक नुकसान पहुंचाया, लेकिन उनकी राष्ट्रभक्ति अटूट रही।

 मानवता और राष्ट्र के प्रति समर्पण

व्यापारिक सफलता के साथ सर जमाल की उदारता भी अद्भुत थी। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यों में उन्होंने लाखों रुपये दान किए — उस जमाने में सालाना दान एक मिलियन रुपये से अधिक पहुंचता था। जामनगर में जमाल हॉस्पिटल उनकी देन है। उन्होंने कई स्कूल, औद्योगिक केंद्र और चिकित्सा संस्थान स्थापित किए या सहायता दी।

1920 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नाइटहुड (सर) की उपाधि दी। इससे पहले 1915 में उन्हें CIE (Companion of the Indian Empire) मिल चुका था। लेकिन सम्मान के बावजूद वे सादगी भरा जीवन जीते रहे — साधारण कुर्ता-पजामा, अचकन और पगड़ी उनका परिधान था। वे धार्मिक, विनम्र और सिद्धांतवादी थे।

 विरासत जो आज भी प्रेरित करती है

1924 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। IBP का IOCL में विलय 2007 में हुआ, जो उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण है। रंगून में जमाल एवेन्यू नाम से एक सड़क उनके नाम पर थी (जो बाद में बदली गई)। उनकी कहानी बताती है कि विदेशी शासन में भी भारतीय उद्यमी कैसे विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते थे।

सर अब्दुल करीम जमाल की जीवन गाथा कई सबक देती है:

- दूरदर्शिता: विविधीकरण और नए क्षेत्रों में प्रवेश।

- राष्ट्रभक्ति: विदेशी हितों के खिलाफ स्वदेशी का समर्थन।

- उदारता: सफलता को समाज की भलाई में लगाना।

- सादगी: धन के बावजूद मूल्यों से जुड़े रहना।

आज जब हम 'आत्मनिर्भर भारत' और 'वोकल फॉर लोकल' की बात करते हैं, तब सर जमाल जैसी शख्सियतें हमें याद दिलाती हैं कि यह यात्रा नई नहीं है। गुजरात की मिट्टी ने सदियों से ऐसे योद्धा पैदा किए हैं जो न केवल व्यापार करते हैं, बल्कि इतिहास रचते हैं।

धीरूभाई अंबानी से पहले का यह नाम भारतीय उद्यमिता के स्वर्णिम अध्याय का हिस्सा है। सर अब्दुल करीम अब्दुल शकूर जमाल — एक व्यापारी, राष्ट्रवादी, филан्थ्रोपिस्ट और सच्चे मेमन गौरव। उनकी कहानी हर युवा उद्यमी को प्रेरित करेगी कि मेहनत, ईमानदारी और दूरदृष्टि से कोई भी असंभव को संभव बना सकता है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 6 Jun 2026