दक्षिण एशिया की भू-राजनीति तेजी से बदल रही है। बांग्लादेश के मोंगला पोर्ट के आसपास 110 एकड़ भूमि पर भारतीय आर्थिक क्षेत्र परियोजना को रद्द कर चीन को सौंप दिए जाने की घटना केवल एक व्यापारिक फैसला नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। भारत के तट से महज 80 किलोमीटर दूर स्थित इस रणनीतिक बंदरगाह पर चीन की बढ़ती पहुंच ने नई दिल्ली में सुरक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है।
यह घटनाक्रम बांग्लादेश में 2024 के सत्ता परिवर्तन के बाद की नई वास्तविकताओं को उजागर करता है। आइए इस पूरे विकासक्रम, इसके अंतर्राष्ट्रीय मायनों और भारत के लिए निहितार्थों को विस्तार से समझते हैं।
पृष्ठभूमि: मोंगला पोर्ट परियोजना का सफर
2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच समझौता हुआ था, जिसमें मोंगला और चटगांव पोर्ट क्षेत्रों में आर्थिक क्षेत्र विकसित करने की बात शामिल थी। भारतीय वित्तीय सहायता से मोंगला पोर्ट को खुलना से जोड़ने वाली रेलवे लाइन भी बनी। 2018 में भारत सरकार ने हीरानंदानी ग्रुप को ठेका दिया और 2022 में BEZA (बांग्लादेश इकोनॉमिक जोन अथॉरिटी) के साथ औपचारिक समझौता हुआ।
अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद राजनीतिक परिदृश्य बदल गया। अंतरिम सरकार (मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व) के दौर में भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव बढ़ा। फरवरी 2026 में BNP की जीत के साथ तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने। BEZA ने दावा किया कि भारतीय कंपनी ने तय समयसीमा में काम शुरू नहीं किया, जिसके चलते अक्टूबर 2025 में परियोजना रद्द कर दी गई।
जून 2025 में चीन ने आर्थिक क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव दिया। 25 जून 2026 को तारिक रहमान के चीन दौरे के दौरान BEZA और चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (CCECC) के बीच 110 एकड़ पर चीन-बांग्लादेश मोंगला पोर्ट इकोनॉमिक जोन का समझौता हो गया। इसके अलावा, मोंगला पोर्ट के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए $370 मिलियन का अलग प्रोजेक्ट भी चीन के पास है, जिसमें ऑटोमैटिक क्रेन और कंटेनर जेटी शामिल हैं। इससे पोर्ट की क्षमता ढाई गुना बढ़ सकती है।
सामरिक महत्व: क्यों है मोंगला पोर्ट इतना अहम?
मोंगला पोर्ट बंगाल की खाड़ी में स्थित है और बांग्लादेश के दक्षिण-पश्चिमी तट पर है। यह गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना डेल्टा क्षेत्र से जुड़ा है और भारत के पूर्वी तट (विशेषकर पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों) के निकट है। पोर्ट का विकास बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका सामरिक मूल्य और भी ज्यादा है।
मलक्का डिलेमा का विकल्प: चीन का समुद्री व्यापार मुख्य रूप से मलक्का जलडमरूमध्य पर निर्भर है। यदि किसी संघर्ष में यह रूट ब्लॉक हो जाए, तो मोंगला जैसे बंदरगाह बंगाल की खाड़ी के रास्ते वैकल्पिक आपूर्ति लाइन प्रदान कर सकते हैं। इससे चीन को भारत और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाने का मौका मिलता है।
स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का विस्तार: चीन की 'मोतियों की माला' रणनीति के तहत श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट पहले से चीनी प्रभाव में है। मोंगला के साथ बंगाल की खाड़ी में चीन की उपस्थिति मजबूत हो रही है। Cox's Bazar में पहले से चीनी सहायता से पनडुब्बी बेस जैसी सुविधाएं विकसित हो चुकी हैं।
सैन्यीकरण की आशंका: चीन अक्सर आर्थिक परियोजनाओं को बाद में सैन्य उपयोग के लिए अनुकूलित करता है। हंबनटोटा में चीनी युद्धपोतों की आवाजाही इसका उदाहरण है। मोंगला पर स्वचालित सिस्टम और बढ़ी हुई क्षमता PLA Navy के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट प्रदान कर सकती है।
बांग्लादेश की नई विदेश नीति: चीन की ओर झुकाव
तारिक रहमान सरकार के सत्ता में आने के बाद बांग्लादेश की विदेश नीति में स्पष्ट बदलाव दिख रहा है। भारत के साथ संबंधों में तनाव (सीमा मुद्दे, जल बंटवारा, अल्पसंख्यक सुरक्षा आदि) के बीच चीन आर्थिक निवेश और तेज कार्यान्वयन का विकल्प प्रस्तुत कर रहा है। बांग्लादेश पर पहले से $6.2 बिलियन का चीनी कर्ज है, लेकिन तेज विकास की जरूरत चीन को आकर्षक पार्टनर बनाती है।
चीनी कंपनियां फंडिंग और निर्माण में तेजी दिखाती हैं, जबकि भारतीय परियोजनाएं कभी-कभी देरी का शिकार होती हैं। Teesta River प्रबंधन पर भी चीन की भूमिका बढ़ रही है, जो भारत के लिए और चिंता का विषय है।
भारत के लिए चुनौतियाँ और संभावित प्रतिक्रियाएँ
1. सुरक्षा दृष्टिकोण: मोंगला पर चीन की उपस्थिति भारत के पूर्वी तट और पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। बंगाल की खाड़ी में नौसैनिक गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं।
2. आर्थिक और कनेक्टिविटी: भारत बांग्लादेश के रास्ते पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था। इस परियोजना के चले जाने से अवसर सीमित हो सकते हैं।
3. क्षेत्रीय प्रभाव: पड़ोसी देशों (श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार) में चीन की बढ़ती पैठ 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के लिए चुनौती है।
भारत क्या कर सकता है?
- कूटनीतिक प्रयासों से बांग्लादेश के साथ विश्वास बहाली।
- अन्य बंदरगाहों (जैसे चटगांव) और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स पर फोकस।
- Quad और Indo-Pacific रणनीति के तहत सहयोगियों (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) के साथ समन्वय।
- घरेलू स्तर पर पूर्वोत्तर विकास और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना।
व्यापक परिप्रेक्ष्य: हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन
यह घटना केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक है। अमेरिका और उसके सहयोगी Indo-Pacific में चीन की चुनौती का मुकाबला कर रहे हैं। बांग्लादेश जैसे देश 'बैलेंसिंग एक्ट' खेल रहे हैं – विकास के लिए चीन का आर्थिक सहयोग और सुरक्षा के लिए भारत/पश्चिम के साथ संबंध।
चीन की Belt and Road Initiative (BRI) के तहत ऐसे प्रोजेक्ट कर्ज के जाल (debt trap) की आशंकाएँ भी पैदा करते हैं, जैसा श्रीलंका में देखा गया। बांग्लादेश को सतर्क रहना होगा कि दीर्घकालिक संप्रभुता प्रभावित न हो।
अवसर या खतरा?
मोंगला पोर्ट का यह बदलाव दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन के बदलाव का प्रतीक है। भारत के लिए यह 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति की परीक्षा है। हालांकि, चुनौतियाँ अवसर भी पैदा करती हैं – मजबूत कूटनीति, आर्थिक निवेश और क्षेत्रीय सहयोग से भारत अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
बांग्लादेश की संप्रभुता का सम्मान करते हुए, दोनों देशों को पारस्परिक लाभ वाले संबंध विकसित करने चाहिए। चीन की बढ़ती उपस्थिति पूरे हिंद-प्रशांत की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करेगी। भविष्य में क्षेत्रीय स्थिरता के लिए संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है।
साझा करें और चर्चा करें: क्या यह बदलाव भारत की रणनीति में सुधार का मौका है या क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा? आपके विचार कमेंट में जरूर बताएं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 30 Jun 2026