सोमवार की सुबह दुनिया ने एक बार फिर तेल के दामों में आग देखी। अमेरिका और ईरान के बीच बीते सप्ताहांत हुए बड़े पैमाने के मिसाइल हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड 4% से ज्यादा उछलकर 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया।
यह सिर्फ आंकड़ा नहीं है। यह पिछले महीने हुए नाजुक युद्धविराम के टूटने का ऐलान है और इस बात का संकेत है कि मध्य-पूर्व एक बार फिर खुले टकराव की तरफ बढ़ रहा है।
बाजार, सरकारें और आम आदमी - सभी की नजर अब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर है। क्योंकि अगर वहां से तेल का रास्ता रुका तो 80 डॉलर वाला तेल 120 डॉलर भी हो सकता है।
कैसे शुरू हुई नई जंग?
सबकी शुरुआत एक व्यापारिक जहाज से हुई। ईरान ने दावा किया कि उसने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में एक "संदिग्ध" व्यापारिक जहाज को निशाना बनाया जो इजरायल को सपोर्ट कर रहा था।
इसके जवाब में अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई में देर नहीं की। पेंटागन के मुताबिक अमेरिकी सेना ने ईरानी सैन्य बुनियादी ढांचे पर लगभग 140 मिसाइल और ड्रोन हमले किए। निशाने पर ईरान के रडार स्टेशन, मिसाइल डिपो और तटीय रक्षा ठिकाने थे।
ईरान ने भी पलटवार किया, लेकिन इस बार उसने सिर्फ अमेरिका को नहीं, उसके सहयोगियों को भी निशाना बनाया। तेहरान समर्थित बलों ने कतर, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, जॉर्डन और ओमान में अमेरिकी और सहयोगी सुविधाओं पर हमले किए।
इसी के साथ पिछले महीने बना युद्धविराम पूरी तरह ध्वस्त हो गया।
तेल बाजार में भूचाल: 80 डॉलर क्यों महत्वपूर्ण है?
सोमवार को ब्रेंट क्रूड 4.3% उछलकर 79.80 डॉलर पर बंद हुआ। WTI भी 78 डॉलर के पार निकल गया।
3 वजहें हैं जिससे बाजार घबराया हुआ है:
1. होर्मुज़ का डर: दुनिया का करीब 20% तेल यानी रोजाना 20 मिलियन बैरल इसी 33 किलोमीटर चौड़े रास्ते से गुजरता है। अगर यह बंद हुआ तो सप्लाई चेन टूट जाएगी।
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2. जोखिम प्रीमियम: जंग के समय निवेशक तेल में "रिस्क प्रीमियम" जोड़ देते हैं। अभी बाजार में 8-10 डॉलर का प्रीमियम जुड़ चुका है।
3.
3. भंडार कम: अमेरिका और चीन के स्ट्रेटेजिक रिजर्व पहले जैसे भरे हुए नहीं हैं। इसलिए झटका ज्यादा लगेगा।
जेपी मॉर्गन के विश्लेषकों ने कहा, _"अगर होर्मुज़ 1 हफ्ते भी बंद रहा तो तेल 100 डॉलर जाएगा। 1 महीने बंद रहा तो 130 डॉलर तक जा सकता है।"
किन देशों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा?
1. भारत: भारत अपनी 85% तेल जरूरत आयात करता है। 80 डॉलर वाला तेल मतलब पेट्रोल 5-7 रुपये और महंगा। महंगाई, रुपया और राजकोषीय घाटा - तीनों पर दबाव।
2. यूरोप: यूरोप पहले से ही एनर्जी संकट से जूझ रहा है। महंगा तेल मतलब ECB के लिए ब्याज दरें और ऊंची रखना।
3. अमेरिका: बाइडेन प्रशासन के लिए यह चुनावी साल में सबसे बड़ा झटका। महंगा गैसोलिन सीधे वोटर को चोट पहुंचाता है।
4. खाड़ी देश: सऊदी, UAE को फायदा होगा क्योंकि तेल महंगा होगा। लेकिन अगर उनके ठिकाने निशाने पर आए तो उत्पादन भी खतरे में।
बाजार के अलावा और क्या हिलेगा?
- शेयर बाजार: एयरलाइन, शिपिंग और केमिकल कंपनियों के शेयर गिरे। डिफेंस और तेल कंपनियों के शेयर उछले।
- सोना: सेफ हेवन डिमांड से सोना 2400 डॉलर के पार।
- डॉलर: डॉलर इंडेक्स मजबूत हुआ क्योंकि निवेशक सुरक्षित जगह ढूंढ रहे हैं।
- क्रिप्टो: बिटकॉइन में अस्थिरता। रिस्क-ऑफ मूड में क्रिप्टो भी गिरा।
ईरान की रणनीति क्या है?
तेहरान इस बार सीधी जंग नहीं, "लागत बढ़ाने वाली जंग" लड़ रहा है।
ईरान जानता है कि वह अमेरिका से सीधे सैन्य मुकाबले में नहीं टिक सकता। इसलिए उसने 3 हथियार उठाए:
1. होर्मुज़ को धमकाना - दुनिया की अर्थव्यवस्था को बंधक बनाना
2. प्रॉक्सी हमले - क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाकर अमेरिका पर दबाव
3. तेल को हथियार बनाना - महंगाई से अमेरिका और यूरोप की सरकारों पर अंदरूनी दबाव
ईरानी मीडिया का कहना है कि "जब तक प्रतिबंध नहीं हटेंगे, तेल का रास्ता सुरक्षित नहीं होगा।"
अमेरिका के पास कितने विकल्प हैं?
वाशिंगटन के सामने 3 रास्ते हैं:
पहला - और हमले*म: मौजूदा हमलों को और तेज करना। लेकिन इससे तेल और महंगा होगा।
दूसरा - कूटनीति: कतर और ओमान के जरिए बैक-चैनल बातचीत। लेकिन ईरान अभी बात के मूड में नहीं।
तीसरा - होर्मुज़ की सुरक्षा: अमेरिकी नौसेना को तैनात करके जलडमरूमध्य को खुला रखना। लेकिन यह खुद एक बड़े युद्ध को न्योता देगा।
आम आदमी तक कैसे पहुंचेगा असर?
इस जंग का असर सीधे आपकी जेब पर पड़ेगा:
- पेट्रोल-डीजल: हर 10 डॉलर तेल बढ़ने पर भारत में पेट्रोल 2.5 रुपये महंगा
- खाना: ट्रांसपोर्ट महंगा = सब्जी, दूध, अनाज महंगा
- फ्लाइट: एविएशन टरबाइन फ्यूल महंगा = हवाई टिकट महंगे
- EMI: महंगाई रोकने के लिए RBI को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
ऊर्जा विश्लेषक: "अगले 2 हफ्ते निर्णायक हैं। अगर कोई और जहाज निशाना बना तो बाजार पैनिक करेगा।"
भू-राजनीति एक्सपर्ट: "यह 2019 के अबकाईक हमले से बड़ा है। क्योंकि इस बार अमेरिका सीधे शामिल है।"
भारतीय अर्थशास्त्री: "भारत के लिए 85 डॉलर रेड लाइन है। उससे ऊपर गए तो चालू खाते का घाटा और महंगाई दोनों बिगड़ेंगे।"
आगे क्या हो सकता है? - 3 सिनेरियो
सिनेरियो 1: सीमित जंग
हमले रुकते हैं, कूटनीति शुरू होती है। तेल 85 डॉलर तक जाकर स्थिर हो जाता है।
सिनेरियो 2: लंबी घेराबंदी
होर्मुज़ में रुक-रुक कर हमले होते हैं। तेल 100-110 डॉलर। 2026 में ग्लोबल मंदी का खतरा।
सिनेरियो 3: बड़ा युद्ध
अगर ईरान या अमेरिका ने कोई बड़ा ठिकाना तबाह किया तो तेल 130+ डॉलर और स्टॉक मार्केट में 15-20% गिरावट।
फिलहाल बाजार दूसरे सिनेरियो के लिए तैयारी कर रहा है।
बारूद से तय होगी महंगाई
अमेरिका और ईरान के बीच मिसाइलें अब सिर्फ सैन्य ठिकानों पर नहीं गिर रही हैं। वे सीधे ग्लोबल सप्लाई चेन, महंगाई और आपकी रसोई पर गिर रही हैं।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया की आर्थिक धमनी है। उसमें एक गोली भी पूरी दुनिया को बुखार दे सकती है।
तेल 80 डॉलर पर है। अगला पड़ाव 100 डॉलर है या 70 डॉलर - यह तय करेगा कि तेहरान और वाशिंगटन में अगला फोन कॉल कब होता है।
जब तक वह कॉल नहीं होता, तब तक दुनिया को "महंगे तेल" के साथ जीना सीखना होगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World | 13 July 2026