-Friday World September 12,2026
पश्चिम एशिया की तपती रेत और लाल सागर की बेचैन लहरें आज एक नए युग की गवाह बन रही हैं। दशकों तक जिस अमेरिका ने अपनी गनबोट डिप्लोमेसी, सैन्य अड्डों और आर्थिक प्रतिबंधों के दम पर पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में रखा, आज उसी महाशक्ति के पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आ रही है। यह कहानी सिर्फ एक बंदरगाह शहर की नहीं, बल्कि एक पूरी व्यवस्था के पतन की है।
1. मोखा पर नियंत्रण: अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नब्ज पर चोट
यमन के अंसार अल्लाह आंदोलन द्वारा ऐतिहासिक बंदरगाह शहर मोखा पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना केवल एक सामरिक बढ़त नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार के मानचित्र को बदलने वाली घटना है।
विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक, बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का लगभग 10 से 12 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और 30 प्रतिशत कंटेनर ट्रैफिक गुजरता है, आज प्रतिरोध की निगरानी में है। इस मार्ग पर शिकंजा कसने का अर्थ है पश्चिमी दुनिया की आर्थिक धमनियों पर सीधा दबाव।
विशेषज्ञों के अनुसार पेरीम द्वीप और यमनी तट पर पकड़ मजबूत होने के बाद सऊदी अरब के पश्चिमी तट - जेद्दा और यानबू जैसे बंदरगाहों से होने वाला तेल निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कभी इसी समुद्री मार्ग से पश्चिमी कंपनियां पश्चिम एशिया के संसाधनों को औने-पौने दाम पर लूट कर ले जाती थीं, आज वही मार्ग उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है। यह उपनिवेशवादी लूट के रास्तों पर ताला लगने जैसा है।
2. 'टैंकर वार' में टूटा अमेरिकी सैन्य अहंकार
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका का सबसे बड़ा दावा यही रहा है कि उसके विमानवाहक पोत और लड़ाकू बेड़े दुनिया के किसी भी समुद्र में निर्विरोध राज कर सकते हैं। लाल सागर और फारस की खाड़ी में यह मिथक टूट कर बिखर गया है।
रिपोर्टों के अनुसार जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ईरानी तेल टैंकरों को रोकने और जब्त करने की कोशिश की, तो ईरान ने उसे सीधी चुनौती के रूप में लिया। जवाबी कार्रवाई में खाड़ी में अमेरिकी नौसैनिक संपत्तियों को सटीक हमलों का सामना करना पड़ा।
सबसे बड़ा झटका जोर्डन में मौजूद अमेरिकी ठिकानों - मुवफ्फक साल्टी एयरबेस और अल-अज़रक बेस पर लगे। इन बेसों को अमेरिका अपने क्षेत्रीय सुरक्षा नेटवर्क का सबसे मजबूत स्तंभ मानता था। लेकिन कम लागत वाले, स्वदेशी तकनीक से बने सटीक बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन के सामने अरबों डॉलर के अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम नाकाम साबित हुए। A-10 थंडरबोल्ट II और F-15E स्ट्राइक ईगल जैसे विमानों को हुए नुकसान ने एक बात साफ कर दी है कि अब युद्ध का चेहरा बदल चुका है। महंगी पश्चिमी तकनीक अब सस्ते और प्रभावी प्रतिरोधी हथियारों के आगे लाचार है।
3. तेल अवीव के बोझ तले बिखरता यूरोप
अमेरिका के पतन की तीसरी और सबसे अहम वजह उसका इजराइल को दिया जा रहा अंधा समर्थन है। गाजा में जारी हिंसा पर वाशिंगटन के एकतरफा रुख ने खुद पश्चिमी खेमे में गहरी दरार पैदा कर दी है।
कभी अमेरिका के हर फैसले पर सिर हिलाने वाला यूरोप अब बगावत पर है। स्पेन, आयरलैंड, बेल्जियम, स्लोवेनिया और नॉर्वे जैसे देशों ने खुलकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के आदेशों का सम्मान करने, फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता देने और UNRWA को फंडिंग जारी रखने का ऐलान किया है। यह वाशिंगटन के कूटनीतिक एकाधिकार के अंत का संकेत है।
यूरोप की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब भी इस बदलाव का बड़ा कारण है। लंदन, पेरिस, बर्लिन और मैड्रिड में लाखों लोग फिलिस्तीन के समर्थन में उतर रहे हैं। इस जनदबाव के कारण कई यूरोपीय सरकारों को इजराइल को हथियारों की आपूर्ति रोकनी पड़ी है। नतीजा यह है कि अमेरिका और इजराइल आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहले से कहीं ज्यादा अलग-थलग पड़ गए हैं।
4. सप्लाई चेन का संकट और एकध्रुवीय दुनिया का अंत
अमेरिकी वर्चस्व के पतन की सबसे स्पष्ट तस्वीर वैश्विक अर्थव्यवस्था में दिख रही है। लाल सागर में असुरक्षा के कारण दुनिया की बड़ी शिपिंग कंपनियों को अपना रास्ता बदलना पड़ा है। जहाजों को अब स्वेज नहर की बजाय अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर 14 दिन का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है।
इसका सीधा असर बाजार पर पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतें फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं, शिपिंग लागत में 300 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है और यूरोप-अमेरिका में महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।
लेकिन सबसे बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव खाड़ी देशों के शाही महलों में हो रहा है। जो खाड़ी के शासक कभी अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह वाशिंगटन पर निर्भर थे, वे अब खुलेआम कह रहे हैं कि अमेरिकी नौसेना उन्हें सुरक्षित नहीं रख सकती। सऊदी अरब और यूएई अब अपनी सुरक्षा गारंटी के लिए सीधे ईरान और यमन के साथ बातचीत कर रहे हैं। यह उस दौर का अंत है जब अमेरिका खाड़ी को अपनी जागीर समझता था।
निष्कर्ष साफ है। मोखा का पतन कोई छोटी घटना नहीं, बल्कि इतिहास का एक टर्निंग पॉइंट है। यह इस बात का ऐलान है कि पश्चिम की गनबोट डिप्लोमेसी का समय खत्म हो चुका है। पश्चिम एशिया के प्रतिरोध ने यह दिखा दिया है कि दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं रही। वाशिंगटन के आदेश पर चलने वाली दुनिया अब अतीत की बात है, और नए बहुध्रुवीय विश्व का उदय लाल सागर के पानी से ही हो रहा है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 12,2026
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