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Tuesday, 29 September 2026

पीएम मोदी की डिग्री विवाद: दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई दिसंबर तक टली, गुजरात हाईकोर्ट ने केजरीवाल की अपील खारिज की

पीएम मोदी की डिग्री विवाद: दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई दिसंबर तक टली, गुजरात हाईकोर्ट ने केजरीवाल की अपील खारिज की
-Friday World September 30,2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षिक योग्यताओं से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद में मंगलवार को दो महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए। दिल्ली उच्च न्यायालय ने डिग्री संबंधी जानकारी मांगे जाने वाली अपीलों पर सुनवाई दिसंबर तक स्थगित कर दी, जबकि गुजरात उच्च न्यायालय ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की अपील को खारिज कर दिया। ये दोनों फैसले आरटीआई अधिनियम, निजी जानकारी की गोपनीयता और सार्वजनिक हित के बीच के जटिल संतुलन को एक बार फिर रेखांकित करते हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट में यह मामला मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध था। कानूनी समाचार वेबसाइट बार एंड बेंच के अनुसार, इन अपीलों पर सुनवाई नहीं हो सकी और इन्हें दिसंबर के लिए टाल दिया गया। ये अपीलें दिल्ली विश्वविद्यालय से संबंधित हैं, जहां प्रधानमंत्री मोदी ने 1978 में बैचलर ऑफ आर्ट्स (पॉलिटिकल साइंस) की डिग्री प्राप्त करने का दावा किया है। 2016 में केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने दिल्ली विश्वविद्यालय को 1978 में बीए परीक्षा पास करने वाले छात्रों के रजिस्टर का निरीक्षण कराने का निर्देश दिया था। अगस्त 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने इस निर्देश को रद्द कर दिया था, यह कहते हुए कि शैक्षणिक विवरण निजी जानकारी की श्रेणी में आते हैं और केवल सार्वजनिक पद पर होने से सारी निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं हो जाती। इस फैसले के खिलाफ आरटीआई कार्यकर्ता नीरज शर्मा, आप नेता संजय सिंह और अधिवक्ता मोहम्मद इरशाद समेत कई याचिकाकर्ताओं ने अपील दायर की थी। अदालत ने देरी की माफी संबंधी मुद्दे पर पहले विचार करने की बात कही थी और दिल्ली विश्वविद्यालय से आपत्तियां मांगी थीं। अब सुनवाई आगे बढ़ गई है।

दूसरी ओर, गुजरात हाईकोर्ट में मंगलवार को एक और महत्वपूर्ण फैसला आया। चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डीएन रे की खंडपीठ ने अरविंद केजरीवाल की अपील खारिज कर दी। लाइव लॉ समेत कई समाचार स्रोतों के अनुसार, केजरीवाल ने उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें गुजरात विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री की एकेडमिक डिग्री बताने के सीआईसी के 2016 के निर्देश को रद्द कर दिया गया था। एकल न्यायाधीश ने मार्च 2023 में सीआईसी का आदेश रद्द करते हुए केजरीवाल पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था और आरटीआई प्रावधानों के दुरुपयोग की आलोचना की थी। खंडपीठ ने कहा कि एकल न्यायाधीश के फैसले में कोई त्रुटि नहीं पाई गई और अपील खारिज की जा रही है। कोई अतिरिक्त लागत नहीं लगाई गई।

यह विवाद सालों पुराना है। प्रधानमंत्री मोदी की ओर से दिल्ली विश्वविद्यालय से 1978 की बीए डिग्री और गुजरात विश्वविद्यालय से 1983 की एमए डिग्री का दावा किया जाता रहा है। विपक्षी दल और कुछ आरटीआई कार्यकर्ता इन दस्तावेजों की सार्वजनिक उपलब्धता की मांग करते रहे हैं। दूसरी ओर, विश्वविद्यालयों और केंद्र की ओर से तर्क दिया जाता रहा है कि शैक्षणिक रिकॉर्ड निजी जानकारी हैं और उन्हें सार्वजनिक करने से गोपनीयता का उल्लंघन होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय ने पहले अदालत में कहा था कि डिग्री कोर्ट को दिखा सकते हैं, लेकिन राजनीतिक मकसद वाले लोगों को नहीं। गुजरात विश्वविद्यालय ने भी रिकॉर्ड की उपलब्धता और आरटीआई के दुरुपयोग का मुद्दा उठाया था।

आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना है, लेकिन अदालतें बार-बार यह याद दिलाती रही हैं कि निजी जानकारी की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की जानकारी में सार्वजनिक हित होना चाहिए। एकल न्यायाधीशों ने दोनों मामलों में यही आधार अपनाया। दिल्ली में देरी का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। अपीलें समय सीमा के बाद दायर की गईं, इसलिए अदालत पहले इस पहलू पर फैसला करना चाहती है।

यह मामला सिर्फ डिग्री का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में पारदर्शिता, व्यक्तिगत गोपनीयता और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच के संतुलन का है। अदालती प्रक्रिया लंबी चल रही है। दिल्ली हाईकोर्ट में अगली सुनवाई दिसंबर में होने वाली है, जबकि गुजरात हाईकोर्ट का फैसला अंतिम रूप ले चुका है। दोनों उच्च न्यायालयों के ये आदेश आरटीआई मामलों में न्यायपालिका की सतर्कता को दर्शाते हैं।

राजनीतिक दलों के बीच यह मुद्दा अक्सर चर्चा का विषय बनता है। आप और अन्य विपक्षी दल पारदर्शिता की मांग करते हैं, जबकि सत्ताधारी दल इसे राजनीतिक सनसनी फैलाने का प्रयास बताते हैं। अदालतें इन दावों से ऊपर उठकर कानूनी सिद्धांतों पर फैसला करती हैं। सीआईसी के 2016 के आदेशों से शुरू हुआ यह सिलसिला अब 2026 में भी जारी है। यह दिखाता है कि कुछ मुद्दे कितने लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में उलझे रह सकते हैं।

नागरिकों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे आरटीआई का सही उपयोग करें। अनावश्यक या राजनीतिक रूप से प्रेरित आवेदनों से प्रणाली पर बोझ पड़ता है। साथ ही, सार्वजनिक पद धारकों की जवाबदेही भी जरूरी है। अदालतों का काम दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना है। दिल्ली हाईकोर्ट में अब देरी की माफी और मूल मुद्दे पर आगे की सुनवाई होगी। गुजरात हाईकोर्ट का फैसला केजरीवाल के लिए निराशाजनक रहा, लेकिन कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।

कुल मिलाकर, ये घटनाक्रम याद दिलाते हैं कि न्यायिक व्यवस्था में धैर्य जरूरी है। फैसले जल्दबाजी में नहीं, बल्कि तथ्यों और कानून के आधार पर आते हैं। प्रधानमंत्री की शैक्षिक पृष्ठभूमि को लेकर उठे सवालों का जवाब अदालतें ही देंगी। फिलहाल दिल्ली में इंतजार दिसंबर तक बढ़ा दिया गया है और गुजरात में एक अध्याय बंद हो गया है। यह विवाद भारतीय लोकतंत्र और न्यायपालिका की परिपक्वता का प्रतीक भी है, जहां बड़े से बड़े मुद्दे पर भी कानूनी प्रक्रिया का पालन होता है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 30,2026

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