-Friday World Oct 7,2026
जल ही जीवन है। जब आसमान से पानी बरसना बंद हो जाता है, तो सिर्फ खेत ही नहीं सूखते, बल्कि इंसानों का स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग और पूरा अर्थव्यवस्था भी थम-सा जाता है। साल 2026 में भारत के दो महत्वपूर्ण राज्य—महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश—गंभीर जलसंकट और सूखे की चपेट में हैं। कमजोर मानसून ने खेतों को सूखा दिया है, जलाशयों के तल दिखने लगे हैं और लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित हो गई है। यह सूखा सिर्फ कृषि तक सीमित नहीं है। यह स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग और पूरे आर्थिक ढांचे पर भारी पड़ रहा है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इसकी वजह क्या है, स्थिति कितनी गंभीर है और इससे हमें क्या सबक मिलते हैं।
सूखे का मुख्य कारण: अल नीनो और कमजोर मानसून इस साल के भीषण सूखे के पीछे सबसे बड़ा कारक अल नीनो (El Niño) है। यह एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के पानी का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। इससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में देशभर में सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम बारिश हुई है। यह 2015 के बाद का सबसे कमजोर मानसून है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, विदर्भ और पश्चिमी महाराष्ट्र के कई जिलों में तथा आंध्र प्रदेश के रायलसीमा और तटीय क्षेत्रों में बारिश की भारी कमी दर्ज की गई। कई जगहों पर जून से सितंबर के बीच सामान्य बारिश का आधा भी नहीं हुआ। नदियां सूखने लगीं, बांधों का जलस्तर खतरनाक स्तर तक गिर गया और भूजल स्तर भी तेजी से नीचे चला गया। जलवायु परिवर्तन ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम के पैटर्न बदल रहे हैं। कभी अतिवृष्टि तो कभी सूखा—यह चक्र तेज हो रहा है। वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं रोका गया तो ऐसे सूखे और अधिक बार तथा अधिक तीव्रता से आएंगे।
स्थिति कितनी गंभीर है? महाराष्ट्र में कई जिलों को सूखा प्रभावित घोषित किया जा चुका है। सोलापुर, बीड, लातूर, उस्मानाबाद, अमरावती और यवतमाल जैसे क्षेत्रों में किसानों की फसलें लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। कपास, सोयाबीन, तूर, ज्वार और गन्ने की फसलें सूखकर रह गईं। आंध्र प्रदेश में भी अनंतपुर, कडपा, कुरनूल और चित्तूर जिलों में हालात बदतर हैं। कई गांवों में पीने का पानी टैंकरों से पहुंचाया जा रहा है। स्कूलों में मिड-डे मील प्रभावित हो रहा है क्योंकि पानी की कमी से रसोई नहीं चल पा रही। पशुओं के लिए चारे और पानी की भारी किल्लत है, जिससे कई जगहों पर पशुओं की मौतें भी हो रही हैं। स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। पानी की कमी से स्वच्छता प्रभावित हो रही है। दस्त, त्वचा संक्रमण और अन्य बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं। महिलाओं और बच्चों को पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है, जिससे उनका स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
अर्थव्यवस्था और रोजगार पर बड़ा झटका महाराष्ट्र भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग 14 प्रतिशत का योगदान देता है। पानी की कमी ने उद्योगों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। कई फैक्टरियों को 30 प्रतिशत पानी रीसायकल करने के आदेश दिए गए हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ रही है। तेल और दाल मिलें तथा चीनी मिलें धीमी गति से चल रही हैं। सोयाबीन और तूर की कमी के कारण खाद्य तेल और दालों के भाव आसमान छू सकते हैं, जिससे आम आदमी पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा। आंध्र प्रदेश में छोटे व्यापारी, खेतिहर मजदूर और परिवहन से जुड़े लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उनकी आय घट गई है। कई परिवार पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। सरकारों को हजारों करोड़ रुपये के राहत पैकेज घोषित करने पड़े हैं—फसल ऋण माफी, बिजली बिल में राहत, मुफ्त या सस्ता चारा और पानी टैंकर जैसी व्यवस्था। इन राहत उपायों से सरकारी खजाने पर भारी दबाव पड़ा है। कृषि क्षेत्र में रोजगार का बड़ा नुकसान हुआ है। खेतिहर मजदूरों को काम नहीं मिल रहा। महिलाओं की आय खासकर प्रभावित हुई है क्योंकि कई कृषि कार्य उनके हाथ में होते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ने के कगार पर है।
जलवायु परिवर्तन का सबक और आगे का रास्ता यह सूखा हमें साफ संदेश दे रहा है कि जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि आज की हकीकत है। हमें दीर्घकालिक समाधान अपनाने होंगे। जल संरक्षण सबसे जरूरी है। वर्षा जल संचयन, तालाबों और कुओं का पुनर्जीवन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकें बड़े पैमाने पर अपनानी होंगी। फसल पैटर्न बदलने की जरूरत है—कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना होगा। वन क्षेत्र बढ़ाने और मिट्टी की नमी बनाए रखने वाले उपायों पर जोर देना होगा। सरकारों को जलवायु अनुकूल कृषि नीतियां बनानी होंगी। किसानों को मौसम पूर्वानुमान, बीमा और नई तकनीकों की ट्रेनिंग देनी होगी। उद्योगों को जल कुशल बनाना होगा। नागरिक स्तर पर भी पानी बचाने की आदत डालनी होगी। हर बूंद कीमती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को जलवायु न्याय की मांग मजबूती से करनी चाहिए। विकसित देश जो ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन के जिम्मेदार हैं, उन्हें विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देनी चाहिए।
महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश का वर्तमान सूखा सिर्फ मौसम की मार नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ चेतावनी है। अगर हम अभी ठोस कदम नहीं उठाए तो आने वाले सालों में ऐसे संकट और बढ़ेंगे। जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि और जलवायु अनुकूल विकास ही इसका समाधान है। हमें याद रखना होगा—जल ही जीवन है। इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। समय रहते कार्रवाई करें, वरना आने वाली पीढ़ियों को और भी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 7,2026
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