-Friday World Oct 3,2026
1 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली का भारत मंडपम। मौका था UPSC के 100 साल पूरे होने के शताब्दी समारोह का। देश भर के नौकरशाह, टॉपर और इतिहास के जानकार मौजूद थे। इसी मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐतिहासिक किस्सा सुनाया और देखते ही देखते वह किस्सा विवाद का विषय बन गया।
पीएम मोदी ने कहा कि 1920 में जब सुभाष चंद्र बोस ने ICS (Indian Civil Service) की परीक्षा दी थी, तब उस परीक्षा में संस्कृत का पेपर होता था और नेताजी ने वह पेपर संस्कृत में लिखा था। उनका आशय यह था कि भारतीय भाषाओं में भी प्रशासनिक क्षमता है, और सुभाष बाबू जैसे मेधावी छात्र ने हमारी प्राचीन भाषा को गर्व के साथ अपनाया।
भाषण खत्म होते ही विवाद शुरू हो गया।
प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस की आपत्ति
सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र और खुद भाजपा से जुड़े रहे चंद्र कुमार बोस ने इस बयान पर सार्वजनिक आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, "नेताजी कई भाषाओं के जानकार थे, इसमें कोई शक नहीं। वो बांग्ला, अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत सब जानते थे। लेकिन ICS परीक्षा की भाषा अंग्रेजी थी। प्रधानमंत्री को यह जानकारी किस स्रोत से मिली, यह स्पष्ट होना चाहिए।"
चंद्र कुमार बोस ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए और नेताजी के बारे में कोई भी तथ्य पूरी रिसर्च के साथ रखना चाहिए।
इतिहास के पन्नों में सच्चाई क्या है?
अब असली सवाल यह है कि 1920 की ICS परीक्षा का फॉर्मेट क्या था?
ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि सुभाष चंद्र बोस ने 1920 में लंदन में हुई ICS की प्रतियोगी परीक्षा में चौथा स्थान हासिल किया था। यह परीक्षा ब्रिटिश सरकार कराती थी और इसकी मुख्य भाषा अंग्रेजी ही थी।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उस समय ICS के ऑप्शनल विषयों की लिस्ट में संस्कृत भी शामिल थी। खुद चंद्र कुमार बोस की अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर नेताजी के परीक्षा-विषयों की लिस्ट में English और Sanskrit दोनों का उल्लेख है। यानी अंग्रेजी अनिवार्य थी, और संस्कृत एक वैकल्पिक विषय के रूप में थी।
कुछ इतिहासकारों का कहना है कि सुभाष बाबू ने संस्कृत को वैकल्पिक विषय के रूप में चुना था और उसमें बहुत अच्छे अंक लाए थे। लेकिन यह कहना कि "पूरी परीक्षा संस्कृत में थी" या "उन्होंने पूरा पेपर संस्कृत में लिखा", तथ्यात्मक रूप से सही नहीं लगता।
यहीं पर विवाद का मुख्य बिंदु है - क्या पीएम मोदी का आशय था कि एक पेपर संस्कृत का था जिसे नेताजी ने संस्कृत में लिखा, या पूरी ICS परीक्षा ही संस्कृत में थी?
दो नजरिए
सरकार समर्थक इतिहासकारों का तर्क है कि पीएम मोदी का उद्देश्य संस्कृत के गौरव को बताना था। अगर नेताजी ने संस्कृत विषय का पेपर संस्कृत भाषा में लिखा तो यह गर्व की बात है और इसे तोड़-मरोड़ कर नहीं देखना चाहिए।
वहीं आलोचकों का कहना है कि प्रधानमंत्री जैसे बड़े पद पर बोले गए हर ऐतिहासिक तथ्य का रिकॉर्ड सही होना चाहिए। ICS जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा की भाषा को लेकर भ्रम नहीं फैलना चाहिए।
UPSC के मंच से यह बहस क्यों महत्वपूर्ण है?
यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह UPSC के मंच से उठी है। UPSC आज भी भाषा को लेकर जूझ रहा है। क्या सिविल सेवा परीक्षा भारतीय भाषाओं में होनी चाहिए? क्या अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म होनी चाहिए? पीएम मोदी का बयान इसी संदर्भ में था कि 100 साल पहले भी भारतीय भाषा में क्षमता थी।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ICS में चौथा स्थान लाने के बाद भी नौकरी छोड़ दी थी और देश की आजादी के लिए अपना जीवन लगा दिया। उनका त्याग किसी एक पेपर की भाषा से बड़ा है।
अब जरूरत है कि PMO या संस्कृति मंत्रालय इस पर अपना स्रोत स्पष्ट करे, ताकि इतिहास के छात्र भ्रमित न हों। चंद्र कुमार बोस ने जो सवाल उठाया है, वह परिवार के सदस्य के नाते जायज है, और इसका जवाब तथ्यों के साथ आना चाहिए, राजनीति के साथ नहीं।
क्योंकि सुभाष बोस सिर्फ एक परिवार के नहीं, पूरे देश के नेताजी हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 3,2026
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