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Wednesday, 24 December 2025

रूस में झाड़ू लगाने के लिए 1 लाख रुपये मासिक वेतन: भारतीय इंजीनियर बने सफाईकर्मी– गर्व की बात या खेद का विषय?

रूस में झाड़ू लगाने के लिए 1 लाख रुपये मासिक वेतन: भारतीय इंजीनियर बने सफाईकर्मी– गर्व की बात या खेद का विषय?
सज्जाद अली नायाणी ✍🏼फ्राइडे वर्ल्ड 24/12/2025
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हो रही है, जिसमें एक भारतीय युवक रूस में सफाईकर्मी के रूप में काम करते दिख रहा है। फोटो में लिखा है: "रूस में झाड़ू लगाने का पगार 1 लाख रुपये, भारतीय इंजीनियर रूस में बने सफाई कर्मचारी, समझ नहीं आ रहा।" इस पोस्ट ने लोगों के बीच बहस छेड़ दी है – क्या इसे गर्व की बात मानें या खेद का विषय? 
वास्तविकता क्या है? 
-रूस में आजकल कई भारतीय इंजीनियर और टेक्निशियन बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं। यूक्रेन युद्ध के कारण रूस में कुशल श्रमिकों की भारी कमी है। वहां की कंपनियां भारतीयों को आकर्षित करने के लिए अच्छी सैलरी, आवास, भोजन और मेडिकल सुविधाएं दे रही हैं।
 एक सामान्य सफाई कर्मचारी (क्लीनर) की सैलरी रूस में 80,000 से 1.2 लाख रुपये मासिक तक हो सकती है, जो भारत में कई इंजीनियरों से ज्यादा है। लेकिन ज्यादातर भारतीय वहां इंजीनियरिंग, कंस्ट्रक्शन, ऑयल-गैस, आईटी या मैन्युअल टेक्निकल जॉब्स में काम कर रहे हैं। 
फोटो में दिखने वाला युवक शायद किसी बड़े प्रोजेक्ट साइट पर सफाई का काम कर रहा है, लेकिन उसकी असली योग्यता इंजीनियरिंग हो सकती है। कई भारतीय इंजीनियर शुरू में कम स्तर के काम करके वहां पहुंचते हैं और बाद में बेहतर पोस्ट पर प्रमोशन पाते हैं। 

क्यों जा रहे हैं भारतीय रूस? - भारत में इंजीनियरिंग जॉब्स की भारी कमी और कम सैलरी (शुरुआती 15-30 हजार)। - रूस में 1 लाख+ सैलरी, फ्री आवास-भोजन, और तेजी से विदेशी मुद्रा कमाने का मौका। - कई युवा 2-3 साल में 30-50 लाख रुपये जमा करके भारत लौट आते हैं और अपना बिजनेस या घर बसाते हैं। - रूस की कंपनियां भारतीयों को वीजा, टिकट और ट्रेनिंग सब कुछ फ्री में दे रही हैं। 

गर्व की बात या खेद? यह दोनों ही है। - खेद इसलिए कि भारत में पढ़े-लिखे इंजीनियर को झाड़ू लगानी पड़ रही है

 – यह हमारी शिक्षा व्यवस्था, जॉब क्रिएशन और इकोनॉमी की नाकामी दिखाता है। 

-गर्व- इसलिए कि भारतीय युवा मेहनत से दुनिया के किसी भी कोने में जीविका चला रहा है। वहां की कड़क सर्दी, भाषा की समस्या, युद्ध का माहौल सब झेलकर भी 1 लाख रुपये कमाना कोई छोटी बात नहीं। यह उनकी हिम्मत, अनुकूलन क्षमता और परिवार के प्रति जिम्मेदारी का प्रमाण है। 

निष्कर्ष यह सिर्फ एक फोटो नहीं, बल्कि लाखों भारतीय युवाओं की कहानी है। जब तक भारत में कुशल युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार नहीं बनेगा, तब तक ऐसे दृश्य देखते रहेंगे। लेकिन इन युवाओं को दोष देने के बजाय उन्हें सलाम करना चाहिए – क्योंकि वे न सिर्फ अपना परिवार संभाल रहे हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा भी भेज रहे हैं। 

यह समय है कि हम सोचें – क्या हमारा सिस्टम ऐसे युवाओं को सम्मान दे पा रहा है, या उन्हें विदेश की झाड़ू थमाकर मजबूर कर रहा है?

सज्जाद अली नायाणी ✍🏼
 फ्राइडे वर्ल्ड 24/12/2025