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Wednesday, 31 December 2025

"कांग्रेस की देन थी बंगाल की समृद्धि, कम्युनिस्टों ने की बर्बादी"– अमित शाह के बयान ने कोंग्रेस की सच्चाई को उजागर किया"

"कांग्रेस की देन थी बंगाल की समृद्धि, कम्युनिस्टों ने की बर्बादी"– अमित शाह के बयान ने कोंग्रेस की सच्चाई को उजागर किया"
फ्राइडे वर्ल्ड 31,12,2025
30 दिसंबर 2025 को कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की आर्थिक स्थिति पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा

“TMC और Left की सरकारों से पहले पश्चिम बंगाल देश में प्रति व्यक्ति आय में सबसे आगे था।”

 यह बयान 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया। विपक्षी दलों, खासकर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस ने इसे राजनीतिक प्रचार करार दिया, लेकिन आंकड़े क्या कहते हैं? क्या सच में बंगाल कभी देश का सबसे समृद्ध राज्य था, और उसकी गिरावट कब शुरू हुई? 

1960 का दशक: बंगाल की सुनहरी चमक स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में पश्चिम बंगाल भारत की औद्योगिक राजधानी माना जाता था। कोलकाता (तब कलकत्ता) ब्रिटिश काल से ही व्यापार, जूट, चाय, इस्पात और इंजीनियरिंग उद्योग का केंद्र था। 1960-61 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 127.5% अधिक थी—यानी औसत भारतीय से 27.5% ज्यादा। उस समय बंगाल तीसरे सबसे अमीर राज्य में शुमार था (महाराष्ट्र और गुजरात के बाद)। 

यह दौर मुख्य रूप से कांग्रेस शासन का था। 1947 से 1967 तक कांग्रेस ने राज्य में लंबे समय तक सरकार चलाई। 1967 में अस्थिरता शुरू हुई, लेकिन 1972-1977 तक फिर कांग्रेस (सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में) सत्ता में रही। इस अवधि में बंगाल औद्योगिक उत्पादन में अग्रणी था, बंदरगाह मजबूत था, और पूंजी निवेश आकर्षित होता था। 

गिरावट की शुरुआत: 1960 के अंत से 1970 का दशक 1960 के अंत में ही गिरावट के संकेत दिखने लगे। नक्सलबाड़ी आंदोलन, हिंसक ट्रेड यूनियनवाद, घेराव (Gherao) जैसी रणनीतियां, और औद्योगिक अशांति ने निवेशकों को दूर किया। 1960-61 में 127.5% से 1980-81 तक प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से नीचे (96.9%) आ गई। यह "डेथ क्रॉस" था—जब बंगाल का औसत नागरिक राष्ट्रीय औसत से गरीब हो गया। 

यह गिरावट कांग्रेस शासन के अंतिम वर्षों और अस्थिर सरकारों के दौर में शुरू हुई। 1977 में लेफ्ट फ्रंट (सीपीआई(एम) के नेतृत्व में) सत्ता में आया, और 34 साल (2011 तक) शासन किया। इस दौरान गिरावट और तेज हुई—उद्योग भागे, पूंजी निवेश रुका, और राज्य की जीडीपी हिस्सेदारी 1960-61 के 10.5% से घटकर आज 5.6%** रह गई। 

आंकड़ों की सच्चाई: कौन जिम्मेदार?

 - 1960-61: प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का **127.5%** (कांग्रेस दौर)।

 - 1980-81: 96.9% (लेफ्ट फ्रंट के शुरुआती वर्ष)। 

- 1990 के दशक: रैंक 7वें स्थान पर। 

- 2023-24: 83.7% (TMC शासन में), राजस्थान और ओडिशा से भी नीचे।

 ईएसी-पीएम (Economic Advisory Council to the PM) की 2024 रिपोर्ट स्पष्ट कहती है: बंगाल की प्रति व्यक्ति आय 1960 के दशक में राष्ट्रीय औसत से ऊपर थी, लेकिन विकास दर राष्ट्रीय ट्रेंड से नहीं चल पाई। गिरावट की जड़ें 1960 के अंत में हैं—ट्रेड यूनियन हिंसा, राजनीतिक अस्थिरता, और पूंजी पलायन। लेफ्ट फ्रंट ने भूमि सुधार और पंचायती राज जैसे कदम उठाए, लेकिन औद्योगिक पुनरुद्धार में नाकाम रहा। TMC के 15 सालों में भी सुधार सीमित रहा—अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर पर निर्भरता बढ़ी, और राजस्व संग्रह कमजोर रहा।

 इतिहास सबक देता है अमित शाह का बयान बिल्कुल 
रूप से सही है—TMC और Left से पहले (यानी कांग्रेस के दौर में) बंगाल प्रति व्यक्ति आय में शीर्ष पर था। लेकिन गिरावट की शुरुआत कांग्रेस के अंतिम वर्षों में हुई, और लेफ्ट फ्रंट के लंबे शासन ने इसे और गहरा किया। TMC ने भी इसे उबारने में पूरी सफलता नहीं पाई।

 सवाल यह नहीं कि कौन जिम्मेदार है—सवाल यह है कि बंगाल को फिर से समृद्ध कैसे बनाया जाए? 2026 के चुनाव में मतदाता तय करेंगे कि कौन सा रास्ता अपनाया जाए—पिछले दशकों की गलतियों से सबक लेकर, या पुरानी राजनीति को दोहराकर।

 बंगाल की समृद्धि की कहानी हमें याद दिलाती है: राजनीतिक स्थिरता, औद्योगिक नीतियां और निवेशक-अनुकूल माहौल ही विकास की कुंजी हैं। बिना इनके कोई भी सरकार—चाहे कांग्रेस, Left या TMC—राज्य को पुरानी गौरवशाली स्थिति में नहीं लौटा सकती।
सज्जाद अली नायाणी✍🏼
फ्राइडे वर्ल्ड 31,12,2025