प्रधानमंत्री जी, अब आप ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम्’ को आपस में लड़वा रहे हैं। रवींद्रनाथ टैगोर को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय से भिड़वा रहे हैं। यह सिर्फ़ दो गीतों का विवाद नहीं, यह उन लाखों स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति का अपमान है जिन्होंने जेलों में, फाँसी के तख्तों पर और अंडमान की कोठरियों में “वंदे मातरम्” का जयघोष किया था।
150 साल बाद आज जब ‘वंदे मातरम्’ पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो इसका मतलब सिर्फ़ पंडित नेहरू पर सवाल नहीं – बल्कि रवींद्रनाथ टैगोर, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद… उन तमाम क्रांतिकारियों की देशभक्ति पर सवाल है जिनके ख़ून से यह आज़ादी लिखी गई।
सचाई यह है कि ‘वंदे मातरम्’ का पहला सार्वजनिक गायन 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में हुआ था – और उसे गाया था स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर ने। उसके बाद हर कांग्रेस अधिवेशन में यह गीत अनिवार्य रूप से गाया जाता रहा। 1905 के बंगाल विभाजन-विरोधी आंदोलन में यह नारा बना। क्रांतिकारी संगठनों ने इसे अपना युद्ध-घोष बनाया। जेलों में बंद कैदी सुबह-शाम इसे गाते थे। ब्रिटिश सरकार ने इसे गाने पर पाबंदी लगाई थी – फिर भी यह गूँजता रहा।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिन संगठनों के लोग आज तिरंगे और ‘वंदे मातरम्’ के सबसे बड़े ठेकेदार बने फिर रहे हैं, उन्हीं के पूर्वजों ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कभी “वंदे मातरम्” नहीं कहा। न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविरों में, न जनसंघ के मंचों पर, न हिन्दू महासभा के सम्मेलनों में – कहीं भी इस गीत का उच्चारण नहीं हुआ। मुस्लिम लीग ने भी इसे नहीं अपनाया। सिर्फ़ कांग्रेस और क्रांतिकारी धारा ही थी जिसने इसे जीवंत रखा।
आज जब संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रीय गान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया, तो उस प्रस्ताव को सरदार पटेल ने ही रखा था और सर्वसम्मति से पास हुआ था। टैगोर, नेहरू, पटेल, आज़ाद – सब एक मंच पर थे। उस एकता को आज तोड़ने की कोशिश हो रही है।
वंदे मातरम् कोई सांप्रदायिक नारा नहीं था। यह मातृभूमि का आह्वान था – जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब शामिल थे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, अल्लामा इक़बाल तक ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया था।
आज जब चुनावी मौसम में ‘वंदे मातरम्’ को हथियार बनाया जा रहा है, तो यह उन सभी शहीदों का अपमान है जिन्होंने इसके लिए प्राण दिए। यह पाखंड है – जो आज़ादी की लड़ाई से दूर रहे, वे आज उसके सबसे बड़े वारिस बनने का दावा कर रहे हैं।
देश को बाँटने की नहीं, जोड़ने की ज़रूरत है। ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम्’ दोनों हमारे हैं। दोनों को गले लगाइए, किसी को नीचा मत दिखाइए। यही हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का सपना था – एक अखंड, समावेशी, प्रेम और सद्भावना वाला भारत। वंदे मातरम्! जय हिंद!
सज्जाद अली नायाणी✍🏼