अहमदाबाद: हाल ही में सुरेंद्रनगर जिले में पुलिस हिरासत में एक आरोपी की संदिग्ध मौत ने गुजरात पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की ताजा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि गुजरात देश में कस्टोडियल मौतों के मामले में सबसे ऊपर है। पिछले छह वर्षों में पुलिस हिरासत में ही 95 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं, जो मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन का संकेत देती हैं।
यह स्थिति न केवल पुलिस की भूमिका को संदेह के घेरे में लाती है, बल्कि राज्य सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाती है। सुरेंद्रनगर जिले के पटड़ी तहसील के जिनजुवाड़ा गांव के निवासी 25 वर्षीय गजेंद्रसिंह जाला की मौत 4 दिसंबर 2025 को पुलिस लॉकअप में हुई। वह मोटरसाइकिल चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का दावा है कि जाला ने पूछताछ के दौरान कई चोरियां कबूल कीं और सुबह लॉकअप में अपनी शर्ट से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली।
लेकिन परिवार ने इसे हिरासत में यातना का परिणाम बताते हुए जांच की मांग की है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार है, लेकिन यह घटना गुजरात में बढ़ती कस्टोडियल मौतों की कड़ी का हिस्सा बन गई है।
NHRC की रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 से 2022-23 तक गुजरात में कुल 80 कस्टोडियल मौतें हुईं, जो देशभर में सबसे अधिक हैं।
वर्षवार आंकड़े चिंताजनक हैं: 2017-18 में 14, 2018-19 में 13, 2019-20 में 12, 2021-22 में 24 और 2022-23 में 15 मौतें। 2022 और 2023 में ही 28 मौतें पुलिस हिरासत में दर्ज हुईं, जबकि जेल हिरासत में 145। NHRC ने 201 मामलों में मुआवजे की सिफारिश की, लेकिन केवल एक मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई।
यह आंकड़े दर्शाते हैं कि हिरासत में अमानवीय व्यवहार, यातना और समय पर चिकित्सा सुविधा न मिलने से मौतें हो रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी पालन नहीं हो रहा। 2018 में शफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस स्टेशनों, सीबीआई, ईडी और अन्य जांच एजेंसियों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था ताकि मानवाधिकार उल्लंघन रोका जा सके।
दिसंबर 2020 में परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में कोर्ट ने इसे और सख्त किया – सभी स्टेशनों में नाइट विजन और ऑडियो रिकॉर्डिंग वाले सीसीटीवी लगाने, 18 महीने तक फुटेज स्टोर करने और ओवरसाइट कमेटियां गठित करने के निर्देश दिए।
लेकिन गुजरात में आज भी कई पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी न लगे हैं या वे बंद पड़े हैं। सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी खामियों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए एक PIL दर्ज की, जिसमें हाल के महीनों में 11 कस्टोडियल मौतों का जिक्र किया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि पारदर्शिता की कमी और स्वतंत्र जांच का अभाव ही इन मौतों का मुख्य कारण है।
NHRC डेटा से पता चलता है कि 2009 से 2023 तक देशभर में 28,258 कस्टोडियल मौतें हुईं, जिनमें से अधिकांश न्यायिक हिरासत में। लेकिन पुलिस हिरासत वाली मौतें यातना का स्पष्ट प्रमाण हैं।
गुजरात में जेलों की क्षमता 13,999 कैदियों की है, लेकिन 2,598 अतिरिक्त कैदी भरे पड़े हैं, जो सुविधाओं पर दबाव डालता है। कांग्रेस नेता हिरेन बanker ने कहा, "गांधी-सारदार की गुजरात में बढ़ती कस्टोडियल मौतें राज्य के लिए शर्मिंदगी का विषय हैं।"
अब सवाल यह है कि पुलिस निष्पक्षता से कर्तव्य निभा रही है तो रोजाना कस्टोडियल मौतें क्यों हो रही हैं? जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों गायब है?
NHRC ने सभी राज्यों को निर्देश दिए हैं कि हिरासत मौतों की 24 घंटे में रिपोर्ट करें, लेकिन अमल कमजोर है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राजस्थान सरकार को भी फटकार लगाई, जहां पूछताछ कक्षों में सीसीटीवी न होने पर सवाल उठे। गुजरात सरकार को अब ठोस कदम उठाने होंगे
– सीसीटीवी अपग्रेड, स्वतंत्र जांच और पुलिस ट्रेनिंग। अन्यथा, यह मानवाधिकारों का सतत उल्लंघन बना रहेगा।
क्या गुजरात में न्याय की उम्मीद बाकी है? या कस्टोडियल मौतें अब 'सामान्य' हो गई हैं? समय रहते सुधार जरूरी है, वरना संवैधानिक अधिकारों का मजाक बनेगा।
सज्जाद अली नायाणी✍